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दो भाइयों की कहानी // Life Changing Story

अन्याय का जवाब आइये जानते है

इस सच्ची कहानी में

पूरा राज

बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गांव में दो भाई रहते थे। मोहन और सोहन दोनों ही बेहद मेहनती थे और अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का सपना देखते थे। गांव में रोजगार के अवसर बहुत कम थे। इसलिए दोनों ने तय किया कि अब उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए शहर जाना होगा। शहर पहुंचकर दोनों

भाइयों ने मिलकर कालीन बुनाई का काम शुरू किया। छोटा भाई सोहन अच्छे कालीन बुना करता था। वो दिन रात मेहनत करके खूबसूरत कालीन तैयार करता और उसका बड़ा भाई मोहन उन कालीनों को अपने घोड़े पर लादकर शहर के बाजार में बेचकर आता था। शाम को लौटकर मोहन अपनी कमाई थोन के साथ बांटता। धीरे-धीरे उनका काम अच्छा चल निकला और वह दोनों भाई

खुशी से रहने लगे। लेकिन एक दिन एक ऐसी घटना घटी जिसने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। उस दिन मोहन हमेशा की तरह अपने कालीन बेचकर लौट रहा था। घोड़े की काटी पर उसने एक हल्की सी पोटली बांधी हुई थी जिसमें उसने सोने के सिक्के रखे हुए थे। रास्ते में बाजार से कुछ सामान खरीदते समय एक दुकानदार मोहन के पास आकर बोला, “अरे भाई, मैं

तुम्हारा घोड़ा खरीदना चाहता हूं। बताओ कितने में बेचोगे?” मोहन कुछ सोच ही रहा था कि दुकानदार ने कहा, “मैं पांच सिक्के दूंगा।” यह सुनकर मोहन अंदर ही अंदर मुस्कुराने लगा। उस समय घोड़े की कीमत सिर्फ एक सिक्का हुआ करती थी और यह दुकानदार पांच सिक्के देने को तैयार था। मोहन ने खुशी-खुशी हामी भर दी और बोला जी बिल्कुल मैं घोड़ा आपको बेचने को

तैयार हूं। दुकानदार ने तुरंत अपनी जेब से पांच सिक्के निकाले और मोहन के हाथ में रखकर बोला, अब यह पूरा घोड़ा मेरा हुआ। मोहन ने सिक्के लेते हुए कहा, “जी हां, यह पूरा घोड़ा आपका है। मोहन घोड़े की काठी से अपनी पोटली निकालने लगा। लेकिन उसी वक्त दुकानदार ने उसे धक्का देते हुए कहा, नहीं यह पोटली भी अब मेरी है। तुमने पांच सिक्कों के बदले पूरा घोड़ा मुझे बेच दिया है। काटी हो या पोटली यह सब कुछ मेरा है। मोहन हैरान रह गया और उसने कहा, “अरे यह तो

गलत है। मैंने तुम्हें घोड़ा भेजा है ना कि मेरी पोटली?” लेकिन दुकानदार चालाकी से बोला नहीं तुमने अभी सबके सामने मुझे कहा था कि पूरा घोड़ा तुम्हारा है। अब यह सब मेरी संपत्ति है। आसपास खड़े लोग भी दुकानदार की तरफदारी करने लगे। मोहन लाचार और उदास होकर अपने घर लौट आया। उसने रोते हुए सारी कहानी सोहन को बताई। सोहन ने धैर्यपूर्वक मोहन की बात सुनी और फिर बोला, परेशान मत हो भैया। जैसा उसने हमारे साथ किया, अब हम भी वैसा ही करेंगे।

कुछ दिनों के बाद सोहन उस दुकानदार की दुकान पर गया। दुकान सचमुच सुंदर थी और पूरी तरह ग्राहकों से भरी हुई थी। सोहन ने दुकानदार से कहा, “अरे भाई, आपकी दुकान तो बहुत अच्छी है। मैं इसे 1000 सोने के सिक्कों में खरीदना चाहता हूं।” दुकानदार यह सुनकर अंदर ही अंदर झूं उठा। उसकी दुकान की असली कीमत सिर्फ 800 सोने की सिक्के थी और कोई उसे 1000 सोने के सिक्के दे रहा था। उसने तुरंत हामी भर दी और

बोला, “जी हां बिल्कुल। अब यह दुकान आपकी है। सोन ने अपनी जेब से पोटली निकाली और 1000 सिक्के दुकानदार को थमाते हुए बोला, “अब यह पूरी दुकान मेरी है।” दुकानदार बोला, “जी हां बिल्कुल। यह पूरी दुकान आपकी है।” दुकानदार अपनी दुकान के अंदर जाकर अपना सामान समेटने लगा। लेकिन उसी वक्त सोहन ने उसे रोकते हुए कहा, रुको। अब यह सामान

तुम नहीं ले जा सकते। आपने अभी सबके सामने कहा है कि पूरी दुकान मेरी है। यह सामान भी अब मेरा हो चुका है। दुकानदार गुस्से से लाल हो गया। उसने चिल्लाकर कहा, “यह क्या मजाक है? यह तो मेरी मेहनत की कमाई है।” सोहन ने भी उसी तरह चालाकी की जिस तरह दुकानदार ने मोहन के साथ की थी। उसने आसपास खड़े ग्राहकों से गवाही दिलाई और इस बार

सब ने सोहन का साथ दिया। अब दुकानदार बेबस होकर रोने लगा। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया। उसने समझ लिया कि धोखा देकर कभी भी किसी का भला नहीं होता। जो जैसा करता है उसे वैसा ही फल मिलता है। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में कभी भी किसी के साथ अन्याय नहीं करना चाहिए। क्योंकि जैसा हम दूसरों के साथ करते हैं, वैसा ही हमारे साथ लौट कर आता है।

आपका साथ

आपका ईमान

फिर मिलते है

नेस्ट बार

राधे राधे

जय हिन्द

🇮🇳

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