
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। यह नोटिस हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा से जुड़े महाभियोग और जांच समिति के गठन को लेकर भेजा गया है। मौजूदा समय में संसद का सत्र चल रहा है, ऐसे में यह घटनाक्रम राजनीतिक और संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामला क्या है?
यह पूरा मामला हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई से जुड़ा है। उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष द्वारा तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया था। इसी समिति की वैधता को लेकर जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
याचिका में यह दलील दी गई है कि
- जज को हटाने से जुड़ा महाभियोग प्रस्ताव
- दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) की संयुक्त प्रक्रिया से आगे बढ़ना चाहिए
- केवल लोकसभा द्वारा जांच समिति का गठन करना संविधान और कानून के अनुरूप नहीं है
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए. जी. मसीह की पीठ ने
- लोकसभा स्पीकर कार्यालय
- लोकसभा और राज्यसभा के महासचिवों
से इस मामले में जवाब मांगा है।
सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठाया गया कि यदि राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिली थी, तो केवल लोकसभा द्वारा जांच समिति का गठन कैसे किया गया।
1968 का जज जांच अधिनियम और विवाद
लोकसभा अध्यक्ष ने जज जांच अधिनियम, 1968 के तहत जांच समिति बनाई थी। याचिका में कहा गया है कि:
- अधिनियम की व्याख्या संविधान के अनुरूप नहीं की गई
- समिति का गठन असंवैधानिक प्रक्रिया से हुआ
इसी आधार पर 12 अगस्त 2025 को की गई लोकसभा अध्यक्ष की कार्रवाई को रद्द करने की मांग की गई है।
अब तक की प्रमुख घटनाएं
- जज यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच
- तीन हाईकोर्ट जजों की आंतरिक समिति द्वारा रिपोर्ट
- सरकार द्वारा संसद में महाभियोग प्रस्ताव
- लोकसभा में प्रस्ताव को सांसदों का समर्थन
- जांच समिति का गठन
- इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दाखिल
इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी 2026 को निर्धारित की गई है।
आगे क्या हो सकता है?
अब सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद:
- लोकसभा अध्यक्ष को अपना पक्ष रखना होगा
- कानूनी बहस के बाद कोर्ट तय करेगा किजांच समिति का गठन वैध था या नहींमहाभियोग प्रक्रिया को दोबारा दोनों सदनों में लाने की आवश्यकता है या नहीं
फिलहाल यह मामला न्यायिक विचाराधीन है और अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही सामने आएगा।
निष्कर्ष
यह मामला न केवल एक जज के खिलाफ कार्रवाई से जुड़ा है, बल्कि संसद और संविधान के तहत शक्तियों के संतुलन से भी संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट का नोटिस इस पूरे घटनाक्रम को एक नई दिशा दे सकता है। अब सबकी निगाहें जनवरी 2026 में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
