
साल था 1989। इंडिया पाकिस्तान के एक मैच के दौरान जब पाकिस्तान के तेज गेंदबाजों ने मैच को इंडिया से छीन ही लिया था तब बैटिंग करने आया एक 16 साल का लड़का और शुरुआत की बॉल पर ही अपनी नाक तुड़वा बैठा। पिच पर डॉक्टर्स आए और उस बच्चे से
कहने लगे कि चलो तुम जख्मी हो चुके हो। अब तुम्हें आराम करना होगा। लेकिन उस बच्चे ने जो कहा वो इतिहास में दर्ज हो गया। मैं खेलेगा। इतनी सी उम्र में जिसके अंदर क्रिकेट को लेकर ऐसा जज्बा हो वही बन सकता है भारतीय क्रिकेट इतिहास का सबसे अच्छा बैट्समैन
सचिन तेंदुलकर। सचिन का जन्म 24 अप्रैल 1973 को मुंबई के एक मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता एक लेखक थे और उनकी मां एक इंश्योरेंस कंपनी में काम करती थी। सचिन बचपन से ही बहुत शरारती थे। स्कूल में पढ़ाई लिखाई से ज्यादा वो खेलकूद में दिलचस्पी
लिया करते थे। कभी अपनी बॉल से किसी के घर का कांच तोड़ दिया तो कभी किसी की दीवार गंदी कर दी। लेकिन सचिन की जिंदगी का असली मोड़ उस वक्त आया जब उनके बड़े भाई अजीत ने उन्हें क्रिकेट खेलते देखा। शायद उन्होंने सचिन के अंदर छुपे हुनर को पहचाना
और वह सचिन को शिवाजी पार्क ले गए। जहां कोच रमाकांत आचरेकर नेट्स लगवाया करते थे। आचरेकर ने पहली ही बार सचिन की आंखों में वह चमक देख ली। वो जुनून जो किसी भी खिलाड़ी को महान बना सकता है। उन्होंने सचिन से कहा अगर तू दिल से खेलेगा तो एक दिन देश का नाम रोशन कर सकता है।
और उस वक्त सचिन ने मान लिया कि अब से क्रिकेट ही उनकी जिंदगी है। उस दिन से उनकी सुबह शुरू होती बल्ले से और रात खत्म होती बल्लेबाज बनने के सपने से। धूप में झुलसते, बारिश में फिसलते, क्रिकेट पिच पर गिरते लेकिन कभी रुकते नहीं। कई बार सचिन ट्रेन छूटने के डर से स्कूल का बैग तक छोड़ देते
लेकिन कभी प्रैक्टिस मिस नहीं करते और इसी तरह सचिन की बैटिंग और बेहतरीन होती गई और उनका इंडियन टीम में सिलेक्शन हो गया और फिर आया साल 1989 जब सिर्फ 16 साल की उम्र में सचिन तेंदुलकर ने पाकिस्तान के खिलाफ अपना डेब्यू किया। उनके सामने थे वसीम अकरम, इमरान खान और वकार यूनुस जैसे गेंदबाज। हर बॉल जैसे आग उगल रही थी। लेकिन उस नन्हे से चेहरे में एक
आत्मविश्वास था और उस मैच में बुरी तरह घायल होने के बाद भी 16 साल के बच्चे ने उस हारे हुए मैच को ड्रॉ करा कर इंडिया को बचाया। धीरे-धीरे यह बच्चा बढ़ता गया और दुनिया झुकती गई। उसका हर शॉट एक जवाब था। हर रन एक अलग कहानी थी। वो सिर्फ बल्लेबाज नहीं था। वो इंडिया के लिए एक उम्मीद बन गया था। 1990 में एक सीरीज से लौटते हुए
एयरपोर्ट पर सचिन की मुलाकात हुई अंजलि से और यहीं से सचिन को अपनी जीवन साथी मिल गई। 1995 में सचिन ने अंजलि से शादी की। 1998 का साल आया और सचिन बन गए शारजा के रेगिस्तान का सम्राट ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी डेजर्ट स्टॉर्म इनिंग्स आज भी इतिहास में दर्ज है। रेत उड़ रही थी। आसमान से बिजली गिर रही थी। लेकिन उस वक्त सचिन की बैटिंग ने तूफान को भी मात दे दी थी।
उन्होंने अकेले अपने दम पर इंडिया को जीत दिलाई और दुनिया ने कहा यह सिर्फ एक बैट्समैन नहीं है। यह क्रिकेट का चमत्कार है। लेकिन सचिन की जिंदगी हमेशा आसान नहीं थी। 2000 के दशक की शुरुआत में उन्हें लगातार इंजरीज होती गई। कभी बैक पेन, कभी टेनिस एल्बो। कई लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि अब उनका समय खत्म हो गया। लेकिन सचिन जानते थे कि अब उनके और
मेहनत करने का समय आ गया है। वो लौटे और ऐसा लौटे कि इतिहास लिख दिया। 2010 में उन्होंने वो किया जो किसी ने नहीं किया था। वन डे में डबल सेंचुरी लगाने वाले फर्स्ट क्रिकेटर बने। पूरा इंडिया झूम उठा और पूरा क्रिकेट इतिहास बदल गया और फिर आया 2011 वर्ल्ड कप। हर खिलाड़ी की आंखों में एक ही सपना था। सचिन के लिए वर्ल्ड कप। मुंबई का वानखेड़े स्टेडियम सचिन के नारों से गूंज उठा।
इंडिया ने वर्ल्ड कप जीता और सचिन की आंखों में वह आंसू थे जो एक सदी की मेहनत का प्रतीक थे। सचिन ने 24 इयर्स तक क्रिकेट खेला। 200 टेस्ट, 100 सेंचुरी, 34,000 प्लस रंस। लेकिन असली रन उन्होंने लोगों के दिलों में बनाए। जब उन्होंने वानखेड़े स्टेडियम में आखिरी बार अपना बल्ला घुमाया तो पूरा इंडिया रो पड़ा। उन्होंने अपना सिर झुका कर
कहा, “मेरा सपना सिर्फ मेरा नहीं था। यह पूरे इंडिया का सपना था।” रिटायरमेंट के बाद भी सचिन रुके नहीं। वह आज भी युवाओं को प्रेरित करते हैं। समाज सेवा करते हैं और अपने काम से सिखाते हैं कि टैलेंट ईश्वर देता है। लेकिन महानता मेहनत से बनती है। सचिन तेंदुलकर सिर्फ एक नाम नहीं एक युग है।
उन्होंने हमें सिखाया कद छोटा होना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन तुम्हारा सपना और तुम्हारा विश्वास बड़ा होना चाहिए।
