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साधु का भरोसा टूटा… लेकिन इंसानियत जीत गई | Moral Story in Hindi

जिस तरह एक माँ को अपने बेटे को देखकर सुकून और खुशी मिलती है, ठीक उसी तरह बाबा भारती को अपने घोड़े को देखकर आत्मिक आनंद मिलता था। भगवान की पूजा और भजन के बाद जो भी समय बचता, वह पूरा अपने घोड़े के लिए समर्पित कर देते थे।

वह घोड़ा असाधारण रूप से सुंदर, शक्तिशाली और तेज़ था। पूरे इलाके में उसके जैसा दूसरा कोई घोड़ा नहीं था। बाबा भारती प्यार से उसे “सुल्तान” कहकर पुकारते थे। अपने हाथों से उसकी सेवा करते, खुद उसे चारा खिलाते और रोज़ उसकी साफ-सफाई करते।

बाबा भारती गाँव से कुछ दूरी पर एक छोटे से मंदिर में रहते थे। सुल्तान से उनका लगाव इतना गहरा था कि वे कहते थे— “अगर सुल्तान मुझसे अलग हो गया, तो शायद मैं जीवित नहीं रह पाऊँगा।”

हर शाम वे सुल्तान पर सवार होकर आठ-दस मील की सैर करते, तब जाकर उनके मन को शांति मिलती।

डाकू की नज़र सुल्तान पर

उसी इलाके में खड़क सिंह नाम का एक कुख्यात डाकू रहता था। लोग उसका नाम सुनकर डर जाते थे। एक दिन सुल्तान की प्रशंसा उसके कानों तक पहुँची। उसका मन घोड़े को देखने के लिए बेचैन हो उठा।

एक दोपहर वह बाबा भारती के पास पहुँचा। बाबा ने शांत स्वर में पूछा, “आओ खड़क सिंह, कैसे आना हुआ?”

खड़क सिंह ने सिर झुकाकर कहा, “आपकी कृपा से सब ठीक है। सुल्तान को देखने की इच्छा मुझे यहाँ खींच लाई।”

बाबा मुस्कुराए और बोले, “जो सुल्तान को एक बार देख ले, वह उसे कभी भूल नहीं सकता।”

वे उसे अस्तबल में ले गए। बाबा के चेहरे पर गर्व झलक रहा था। खड़क सिंह ने सुल्तान को देखा और दंग रह गया। उसने जीवन में कई घोड़े देखे थे, लेकिन ऐसा अनुपम घोड़ा कभी नहीं।

उसके मन में लालच जाग उठा— “ऐसा घोड़ा तो मेरे पास होना चाहिए। इस साधु को इसकी क्या ज़रूरत?”

उसने कहा, “बाबा जी, अगर इसकी चाल न देखी तो क्या देखा?”

धमकी और डर

बाबा खुशी-खुशी सुल्तान को बाहर लाए, उसकी पीठ थपथपाई और उस पर सवार हो गए। सुल्तान बिजली की तरह दौड़ पड़ा। उसकी रफ्तार देखकर खड़क सिंह के दिल में जलन भर गई।

जाते-जाते उसने कहा, “बाबा जी, यह घोड़ा ज़्यादा दिन आपके पास नहीं रहेगा।”

यह सुनकर बाबा भारती भयभीत हो गए। कई रातों तक वे सो नहीं पाए। हर समय सुल्तान की रखवाली करते रहे। लेकिन महीने बीत गए, खड़क सिंह नहीं आया। धीरे-धीरे बाबा का डर कम हो गया।

विश्वास की परीक्षा

एक शाम बाबा भारती सुल्तान पर सवार होकर घूमने निकले। तभी रास्ते में करुण स्वर सुनाई दिया— “बाबा… इस गरीब पर दया करो…”

उन्होंने देखा, एक अपाहिज व्यक्ति ज़मीन पर पड़ा था। उसने विनती की, “मुझे सामने वाले गाँव पहुँचा दीजिए। भगवान आपका भला करेगा।”

बिना सोचे बाबा घोड़े से उतर गए और उस व्यक्ति को सुल्तान पर बैठा दिया। वे खुद लगाम पकड़कर चलने लगे।

अचानक एक झटका लगा— लगाम उनके हाथ से छूट गई।

उन्होंने देखा, वह अपाहिज सुल्तान को तेज़ी से दौड़ाए जा रहा था। वह और कोई नहीं, खड़क सिंह था।

साधु का महान हृदय

बाबा भारती कुछ क्षण शांत रहे, फिर ऊँची आवाज़ में बोले, “ठहरो! एक बात सुनते जाओ।”

खड़क सिंह रुका। बाबा ने कहा, “घोड़ा अब तुम्हारा है। मैं इसे वापस नहीं माँगूँगा। बस एक प्रार्थना है—इस घटना के बारे में किसी को मत बताना।”

खड़क सिंह स्तब्ध रह गया। उसने पूछा, “बाबा जी, आपको यह डर क्यों है?”

बाबा ने उत्तर दिया, “अगर लोगों को यह पता चल गया, तो वे किसी गरीब पर विश्वास करना छोड़ देंगे।”

इतना कहकर बाबा वहाँ से चले गए।

डाकू का हृदय परिवर्तन

उन शब्दों ने खड़क सिंह को भीतर तक झकझोर दिया। जिस घोड़े के बिना बाबा जी जीने की बात करते थे, उसी घोड़े को उन्होंने इंसानियत के लिए त्याग दिया।

रात के अंधेरे में खड़क सिंह मंदिर पहुँचा। सुल्तान की लगाम उसके हाथ में थी। वह चुपचाप अस्तबल में गया, सुल्तान को उसकी जगह बाँधा और लौट गया। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थे।

इंसानियत की जीत

सुबह बाबा भारती स्नान के बाद अस्तबल की ओर बढ़े। सुल्तान की आवाज़ सुनते ही वे दौड़ पड़े। अपने घोड़े को देखकर वे भावुक हो गए। उसे गले लगाकर रो पड़े।

उन्होंने कहा, “अब कोई भी गरीबों की मदद से मुँह नहीं मोड़ेगा।”

उनकी आँखों से बहते आँसू इस बात के गवाह थे कि सच्चा भरोसा कभी व्यर्थ नहीं जाता।

🌼 शिक्षा (Moral)

जब इंसान स्वार्थ से ऊपर उठकर विश्वास करता है, तो सबसे कठोर दिल भी बदल सकता है।

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