बिहार चुनाव जीतने के बाद कुछ लोगों ने मीडिया के कुछ मोदी प्रेमियों ने फिर से यह कहना शुरू किया है भाजपा मोदी हमेशा 24/7 इलेक्शन बोर्ड में ही रहते हैं। मैं समझता हूं चुनाव जीतने के लिए इलेक्शन मोड नहीं 24ों घंटे इलेक्शन मोड में रहना जरूरी होता है।
इमोशनल मोड में रहना जरूरी होता है। इलेक्शन मोड में नहीं। जब मन के भीतर एक बेचैनी सी रहती है कि एक मिनट भी घमाना नहीं है। गरीब के जीवन से मुश्किलें कम करने के लिए, गरीब को रोजगार के लिए, गरीब को इलाज के लिए, मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बस मेहनत करते रहना है। इस इमोशन के साथ इस भावना के साथ सरकार लगातार जुटी रहती
है। तो उसके नतीजे हमें चुनाव परिणाम के दिन दिखाई देते हैं। बिहार में भी हमने अभी-अभी यही होते देखा है। साथियों, रामनाथ जी से जुड़े एक और किस्से का मुझसे किसी ने जिक्र किया था। यह बात तब की है जब रामनाथ जी को विदिशा से जनसंघ का टिकट मिला था। उस समय नानाजी देशमुख जी ने उनकी इस बात पर चर्चा हो रही थी कि यह संगठन महत्वपूर्ण होता है या
चेहरा। तो नाना जी देशमुख ने रामनाथ जी से कहा था कि आप सिर्फ नामांकन करने के लिए आएंगे और फिर चुनाव जीतने के बाद अपना सर्टिफिकेट लेने के लिए आ जाइएगा। फिर नाना जी ने पार्टी कार्यकर्ताओं के बल पर रामनाथ जी का चुनाव लड़ा और उन्हें जीता कर दिखाया। वैसे यह किस्सा बताने के पीछे है। मेरा यह मतलब नहीं है कि उम्मीदवार सिर्फ नामांकन करने आए। मेरा मकसद है भाजपा के अनगिनत कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं के समर्पण की ओर आपका ध्यान
आकर्षित करना है। साथियों, भारतीय जनता पार्टी के लाखों करोड़ों कार्यकर्ताओं ने अपने पसीने से भाजपा की जड़ों को सींचा है और आज भी सींच रहे हैं। और इतना ही नहीं केरला, पश्चिम बंगाल, जम्मू कश्मीर ऐसे कुछ राज्यों में हमारे सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने अपने खून
से भी भाजपा की जड़ों को सींचा है। जिस पार्टी के पास ऐसे समर्पित कार्यकर्ता हो उनके लिए सिर्फ चुनाव जितनात धेय नहीं होता बल्कि वो जनता का दिल जीतने के लिए सेवा भाव से उनके लिए निरंतर काम करते हैं।
एक ऐसा लड़का जो जिंदगी से हार चुका था जो आत्महत्या करने के लिए फांसी के फंदे को गले लगाने वाला था। वो कैसे एक आईएएस ऑफिसर बना और जवाब दिया उन लोगों को जिसने उसे दर्द पहुंचाया। आइए जानते हैं अर्जुन की कहानी। दिल्ली के एक मिडिल क्लास घर में रहता था अर्जुन। पढ़ाई में वो ज्यादा अच्छा नहीं था, लेकिन अपने मां-बाप का
लाडला था। अर्जुन के पिता एक दुकान चलाते थे और उसकी मां ग्रहणी थी। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब अर्जुन कॉलेज जाने लगा था। अर्जुन हमेशा से बस यही सोचता कि पढ़ाई करके कोई छोटी-मोटी सरकारी नौकरी मिल जाए तो जिंदगी बन जाएगी। लेकिन वो यह नहीं जानता था कि जिंदगी ने उसके लिए कुछ और ही सोच रखा है। अर्जुन को कॉलेज
जाते हुए कई महीने बीत चुके थे और एक दिन उसकी मुलाकात हुई अनन्या से। अनन्या अर्जुन की ही क्लास में थी। लेकिन आज उसने उसे पहली बार देखा था। दोनों को साहित्य और कविताओं में बहुत ज्यादा इंटरेस्ट था। धीरे-धीरे उन दोनों के बीच बातें बढ़ने लगी और देखते ही देखते वक्त पंख लगाकर उड़ गया। एक दिन लाइब्रेरी में अनन्या ने कहा, “अर्जुन, मैं
बचपन से आईपीएस अफसर बनने का सपना देखती आई हूं।” विवेक मुस्कुराया और बोला, वाह, बहुत ही बड़ा सपना है। अनन्या ने जवाब दिया और तुम्हारा सपना? अर्जुन ने हंसते हुए कहा, “अभी तक तो कोई नहीं है।” अनन्या बोली, तो फिर आज से तुम्हारा सपना मेरा साथ देना होगा। तुम्हें भी यूपीएससी की तैयारी करनी चाहिए। अर्जुन अनन्या ने जिस तरह
अर्जुन को यूपीएससी की तैयारी करने के लिए बोला था, अर्जुन बिल्कुल मना नहीं कर पाया। अर्जुन को उसका आत्मविश्वास अच्छा लगा और उसने भी मन बना लिया कि अब उसका लक्ष्य यूपीएससी पास करके अफसर बनना है। लेकिन वो यह नहीं जानता था कि यूपीएससी की परीक्षा उसकी जिंदगी की सबसे मुश्किल परीक्षा होने वाली है। दोनों ने एक साथ पढ़ाई शुरू की। लाइब्रेरी में दिन रात एक कर
दिए। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती एक अच्छे रिश्ते में बदल गई। और एक दिन अर्जुन ने हिम्मत जुटाकर अनन्या से कहा, “न्या, मुझे तुमसे प्यार हो गया है।” अनन्या मुस्कुराई। उसकी आंखों में भी वही फीलिंग्स थी जो अर्जुन की आंखों में थी। दोनों का रिश्ता अब सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उनके सपनों तक फैल गया। कॉलेज खत्म हुआ। अर्जुन और अनन्या दोनों उस कॉलेज के टॉप स्टूडेंट रहे। बस अब उनकी एक मंजिल थी यूपीएससी। उन्होंने तीनों
एग्जाम्स, प्रीलिम्स, मेंस और इंटरव्यू की तैयारी एक साथ की। दिनरा पढ़ते, नोट्स बनाते और एक दूसरे का हौसला बढ़ाते। तीनों एग्जाम हो चुके थे। अर्जुन को पूरा विश्वास था कि अनन्या एक बार में ही यह एग्जाम क्लियर कर देगी और इसी विश्वास के बीच वो अपने आप पर विश्वास करना भूल गया था। रिजल्ट का दिन आया। दोनों के दिल जोर से धड़क रहे थे और हाथ कांप रहे थे। पर किस्मत का खेल देखिए। अनन्या ने टॉप रैंक हासिल की और अर्जुन कुछ नंबर से फेल हो गया। वो पल अर्जुन के लिए सबसे भारी था। लेकिन अनन्या ने उसका हाथ पकड़ कर कहा,
अर्जुन एक बार की हार से कुछ नहीं होता। तुम्हें एक बात और कोशिश करनी चाहिए। मैं हूं तुम्हारे साथ। यह शब्द अर्जुन के अंदर आग की तरह उतर गए। उसने मन बना लिया कि अब उसे या तो मर जाना है या यूपीएससी क्लियर करना है। अर्जुन अपनी पढ़ाई में और डूब गया। दुनिया से यहां तक कि अनन्या से भी दूर हो गया। वह दिन रात बस किताबों में घुल
गया। उसे नहीं पता था कि अब जिंदगी एक और इम्तिहान लेने वाली है। कुछ महीनों बाद अर्जुन ने सोचा कि अब मुझे अनन्या से मिलना चाहिए। वो उसके घर पहुंचा। दिल में खुशी थी कि अब दोनों एक साथ बैठकर आगे की तैयारी पर बात करेंगे। लेकिन अर्जुन यह नहीं जानता था कि उसकी जिंदगी कोई और मोड़ लेने वाली है। जब वो अनन्या के घर पहुंचा, वहां जो उसे पता चला वो सुनकर वह जैसे पत्थर बन गया। अनन्या के माता-पिता ने बताया कि 2 महीने
बाद अनन्या की शादी है। अर्जुन के पैरों तले जैसे जमीन ही खिसक गई। वो भागता हुआ अनन्या के कमरे में पहुंचा। अनन्या वहीं थी। पर उसकी आंखों में अब वो चमक नहीं थी जो कभी हुआ करती थी। अर्जुन ने कांपती आवाज में उससे पूछा, “यह सब क्या है अनन्या? शादी?” अनन्या ने शांत आवाज में कहा, हां अर्जुन, मैं अरुण से शादी कर रही हूं। मैं तुम्हें अपनी शादी में जरूर बुलाऊंगी। अनन्या के चेहरे पर ना कोई शर्म थी, ना ही पछतावा। अर्जुन की आंखें नम हो चुकी थी। वो कुछ बोले बिना वहां से चला
गया। अब तक जो सपना उसके जीने का मकसद था, वो अब उसके लिए बोझ बन चुका था। दिन भर सन्नाटा, रात भर जागना, नदी किनारे बैठकर भी वह अपने आप को घुटा हुआ महसूस कर रहा था। हर बार अपने आप से बस एक ही सवाल करता। क्यों हुआ यह मेरे साथ? एक हफ्ते तक अर्जुन ने अपने आप को कमरे में बंद रखा और फिर एक दिन उसने वो किया जो किसी को नहीं करना चाहिए। वो पंखे से रस्सी बांधकर कुर्सी पर बैठ गया। आंखों में आंसू,
दिल में खालीपन, अर्जुन को लग रहा था कि वह हार चुका है। लेकिन जैसे ही उसने ऊपर देखा, दीवार पर टंगी अपने माता-पिता की तस्वीर दिखाई दी। उनकी मुस्कान ने जैसे उसे रोक लिया। वो तस्वीर जैसे उसे कुछ बता रही है। अर्जुन, यह जिंदगी सिर्फ तुम्हारी नहीं हमारी भी है। अर्जुन वहीं जमीन पर बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। उसने रस्सी काठ फेंकी और यह फैसला किया कि अब वह अपने माता-पिता के लिए जिएगा और उन्हें गर्व महसूस कराएगा। उस दिन से उसकी जिंदगी बदल गई। वो अब वो अर्जुन नहीं था जो पहले था। अब उसके अंदर गम नहीं
जुनून जल रहा था। वो अपनी पढ़ाई में ऐसा डूब गया कि दिन रात एक कर दिए। हर दर्द का जवाब उसने अपनी मेहनत से दिया। दिन बीतते गए महीने गुजर गए और फिर आया वो दिन। यूपीएससी रिजल्ट का दिन। इस बार विवेक ने ना सिर्फ यूपीएससी क्लियर किया बल्कि टॉप रैंक हासिल की। वो अब एक आईएएस अफसर बन चुका था। जब उसने अपने
माता-पिता को यह खबर दी तो उनकी आंखों में खुशी और गर्व के आंसू थे। उनकी मुस्कुराहट को देखकर अर्जुन को लगा जैसे उसने पूरी दुनिया जीत ली। आज अर्जुन एक ईमानदार आईएएस अधिकारी है। उसकी कहानी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो जिंदगी की मुश्किलों से हार मान लेते हैं। दोस्तों जब जिंदगी हमें दर्द देने पर आती है तो हमें उससे कोई रहम की
उम्मीद नहीं करनी चाहिए। जिंदगी जब तुम्हें गिरा है तो उसे हार की तरह नहीं सबक की तरह समझो। क्योंकि असली जीत उन्हीं की होती है जो हारने के बाद भी कोशिश करना नहीं छोड़ते। और अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको एक बच्चे की यह कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
साल था 1898। अमेरिका के एक शहर ओहायो में दो भाई अपनी साइकिल की दुकान चलाते थे। ना कोई बड़ी डिग्री, ना पैसे, ना किसी वैज्ञानिक का साथ। लेकिन उनके अंदर एक ऐसा सपना पल रहा था जिसे दुनिया पागलपन कहती थी। उनका सपना था इंसान को उड़ते हुए देखने का। जब भी कोई पंछी
आसमान में उड़ता तो दोनों भाई उसे घंटों तक देखते रहते और अपने मन में सोचा करते अगर यह कर सकता है तो इंसान क्यों नहीं कर सकते? यही सवाल उनके दिल में आग बनकर जलने लगा। उन दोनों भाइयों ने ठान लिया था कि वह उड़ने वाली मशीन बनाकर रहेंगे। अपनी साइकिल रिपेयरिंग की दुकान पर पुराने पुर्जों से उन्होंने उस असंभव मशीन को बनाने की
शुरुआत की। लोगों ने उनसे कहा, “अरे पागल हो गए हो क्या? उड़ना ईश्वर का काम है। इंसान का नहीं। वैज्ञानिकों ने उनका मजाक उड़ाया। अखबारों में उन्हें ड्रीमिंग मैकेनिक्स कहा गया। लेकिन उन दोनों भाइयों के लिए हर ताना, हर हंसी एक और सबक बन गया। उन्होंने अपनी साइकिल की दुकान के कोने में टेस्ट शुरू किए। लकड़ी, तार और कपड़े के पंख बनाए और हवा में उड़ाने की कोशिश की। कभी इंजन फेल हो जाता, कभी मशीन टूट जाती। कभी हवा साथ
नहीं देती तो कभी जमीन धोखा दे जाती। लेकिन हर बार गिरने के बाद वह मुस्कुरा कर कहते हम उड़ नहीं पाए पर आज हमने उड़ना सीखा है। 2 साल तक प्रयोग करने के बाद साल था 1900। उन्होंने अपनी मेहनत से अपना पहला ग्लाइडर बनाया और उसे टेस्ट करने गए नॉर्थ कैरोलना के रेतीले टीलों पर। वहां पर हवाएं तेज थी और हालात मुश्किल थे। दिन में तपती धूप और रात में कड़ाके की ठंड और
ऊपर से असफलता है। उन्हें कई बार प्रयोग के दौरान गिरते-गिरते चोटें लगी। किसी किसी टेस्ट में उनकी हड्डियां तक टूट गई। लेकिन उन्होंने हार मानने से इंकार कर दिया। बड़े भाई ने एक रात छोटे भाई से कहा, शायद दुनिया हम दोनों को पागल समझती है। लेकिन एक दिन यही पागलपन इंसान को आसमान में ले उड़ेगा। और 3 साल तक चोट खाने और असफल होने के बाद वो दिन आया 17 दिसंबर 1903 सर्दियों की सुबह थी। हवा में धुंध थी। आसमान पूरा बादलों से ढका हुआ था। लेकिन उन दोनों
भाइयों के दिल में एक साफ आसमान था। उम्मीदों से भरा हुआ। उन्होंने अपनी मशीन तैयार की। द राइट फ्लेयर। बड़े भाई ने कंट्रोल संभाला और दूसरे भाई ने पीछे से धक्का दिया। इंजन गरजा, पंख फड़फड़ाए और देखते ही देखते इंसान ने अपनी उड़ान भरी। 12 सेकंड 120 फीट। लेकिन वो 12 सेकंड इंसानी
इतिहास की सबसे बड़ी उड़ान थी। पहली बार इंसान ने आसमान को छुआ था। उनकी आंखों में आंसू थे। लेकिन वो आंसू सिर्फ सफलता के नहीं थे। वो सालों की मेहनत और विश्वास के आंसू थे। लेकिन अभी कहानी खत्म नहीं हुई। उनकी उड़ान के बावजूद किसी ने भी उन पर यकीन नहीं किया। सरकारों ने कहा ये धोखा है। अखबारों ने छापा मशीन उड़ नहीं सकती। लेकिन वो दोनों भाई जानते थे सच को साबित करने में वक्त लगता है। उन्होंने और बेहतर मशीन बनाई बार-बार टेस्ट किए। हर उड़ान
दूसरी उड़ान से ऊंची होती गई। धीरे-धीरे दुनिया ने उनके सामने अपना सिर झुका लिया और उनकी मेहनत का लोहा मान लिया। अब वो ड्रीमिंग मैकेनिक्स नहीं रहे। अब वो द फादर ऑफ एिएशन बन चुके थे। यह दो भाई और कोई नहीं ओरिवल और विलबर राइट थे जिन्हें राइट ब्रदर्स के नाम से जाना जाता है। जिन्होंने
सबसे पहले विमान की नींव रखी और दुनिया ने जिन्हें बेवकूफ कहकर उनका मजाक उड़ाया। आज जब भी कोई विमान आसमान में उड़ता है तो उसके हर पंख में राइट ब्रर्स का जुनून होता है। हर इंजन की गूंज में उनकी मेहनत की आवाज होती है। उन्होंने दुनिया को सिखाया असफलताएं रास्ते की दीवार नहीं तुम्हारे हर सपने की सीढ़ियां हैं। हर कोई कहता है
नामुमकिन है लेकिन इतिहास वही बदलता है जो कहता है चलो कोशिश करते हैं। ओरिवल और विलबर राइट ने यह साबित कर दिया अगर तुम गिरने से नहीं डरते तो एक दिन यह पूरा आसमान तुम्हारे कब्जे में होगा क्योंकि सपने उन्हीं के पूरे होते हैं जो हार से लड़ने की हिम्मत रखते हैं।
यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसे बचपन में लोग मंदबुद्धि कहते थे। जिसे उसके स्कूल से निकाल दिया गया। जो बोलना तक देर से सीखा जिसे दुनिया ने हर बार बताया कि वो पागल है। वो कुछ नहीं कर पाएगा। लेकिन उसी लड़के ने आगे चलकर दुनिया की सोच बदल
दी। यह कहानी उस इंसान की है जिसने ब्रह्मांड के नियम समझे। अल्बर्ट आइंस्टीन। अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म 14th मार्च 1879 को जर्मनी के एक शहर उल्म में हुआ था। उनका बचपन आम नहीं था। वह कम बोला करते थे और हर चीज को धीरे-धीरे सीखते थे। वे दूसरे बच्चों से हमेशा अलग रहा करते थे। घर में उनके माता-पिता यह चिंता करते क्या यह बच्चा सामान्य है? लेकिन आइंस्टीन के दिमाग में एक ऐसी दुनिया थी जिसे आम इंसान देख ही नहीं सकता था। स्कूल में तो उनका हाल और भी खराब था। उनके टीचर कहते यह बच्चा बेकार है। इससे कुछ नहीं होगा। सख्त
नियम, रटी हुई शिक्षा। आइंस्टीन को इन सब से नफरत थी। एक दिन तो उनके प्रिंसिपल ने यहां तक कह दिया तुम स्कूल की इज्जत गिराते हो। तुमसे कभी कुछ नहीं होगा। लेकिन यही वो लड़का था जो आगे चलकर फिजिक्स का चेहरा हमेशा के लिए बदल देने वाला था। 16 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और अपने
परिवार के पास स्विट्जरलैंड चले गए। वहां भी उन्हें कई रिजेक्शन मिले। यूनिवर्सिटी ने पहले उन्हें स्वीकार नहीं किया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। फिजिक्स और मैथ उनका जुनून थे और इसी जुनून ने उन्हें आगे बढ़ाया। डिग्री पूरी करने के बाद भी उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी। इतना महान दिमाग और कोई नौकरी देने को तैयार नहीं। आखिरकार उन्हें एक छोटा सा जॉब मिला। स्विस पेटेंट ऑफिस में क्लर्क की नौकरी। लेकिन यही वो जगह थी जिसने
आइंस्टीन का इतिहास हमेशा के लिए बदल दिया। स्विस पेटेंट ऑफिस में बैठकर आइंस्टीन हर किसी के आविष्कार जांचते थे। लेकिन उनके दिमाग में ब्रह्मांड के रहस्य उबल रहे थे। अपना काम पूरा करने के बाद वह देर रात तक कागजों पर समीकरण लिखा करते। समय क्या है? रोशनी कैसे चलती है? ब्रह्मांड कैसे काम करता है? हर कोई अपनी जिंदगी में खोया था। लेकिन आइंस्टीन अपनी कल्पना की दुनिया में खोए रहते थे। और फिर आया सन 1905 और यह साल विज्ञान का चमत्कार वर्ष बन गया। सिर्फ एक साल में उन्होंने ऐसी रिसर्च पब्लिश
की जो दुनिया को हिला देने वाली थी। यही वो साल था जब इंसानी इतिहास की सबसे मशहूर समीकरण जन्मी e = mc² यानी ऊर्जा और द्रव्य असल में एक ही चीज है। ये समीकरण इतनी शक्तिशाली थी कि आगे चलकर इसी के सिद्धांत पर एटम बम से लेकर न्यूक्लियर वेपन हर चीज बनी। दुनिया हैरान थी एक मामूली पेटेंट क्लर्क ने फिजिक्स का पूरा खेल ही बदल दिया। इसके बाद उन्होंने द थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी दी। एक ऐसी थ्योरी जिसने ब्रह्मांड, स्पेस और ग्रेविटी को समझकर पूरी तरह नया रूप दे दिया। आइंस्टीन कहा करते थे कल्पना ज्ञान से बड़ी होती है और उन्होंने साबित कर
दिया कि सिर्फ कल्पना से यूनिवर्स के नियम लिखे जा सकते हैं। सन 1920 में आइंस्टीन को नोबेल प्राइज दिया गया। आइंस्टीन जितने महान वैज्ञानिक थे, उतने ही अच्छे इंसान भी। वह युद्ध और हिंसा के खिलाफ थे। लेकिन जब दुनिया दूसरे विश्व युद्ध में जल रही थी तब उन्होंने अमेरिकी सरकार को चेतावनी दी कि जर्मनी एटम बम बना सकता है और उनके इस एक पत्र से मैनहटन प्रोजेक्ट शुरू हुआ जिसने दुनिया का फर्स्ट एटम बम बनाया लेकिन आगे चलकर आइंस्टीन ने इसे अपनी सबसे बड़ी गलती बताया। उनकी जिंदगी में शोहरत भी
आई और अकेलापन भी। अवार्ड भी मिले और आलोचना भी। लेकिन उन्होंने विज्ञान को जो दिया वो अनमोल है। उनका नाम आज भी जीनियस के तौर पर याद किया जाता है। और 18 अप्रैल सन 1955 को अल्बर्ट आइंस्टीन इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए। लेकिन उनकी सोच, उनका ज्ञान आज भी हमारी हर टेक्नोलॉजी में जीवित है। जीपीएस से लेकर लेजर तक सब में आइंस्टीन छिपे बैठे हैं। आइंस्टीन की जिंदगी हमें सिखाती है।
दुनिया चाहे आपको 100 बार नालायक बोले पर अगर आपके अंदर जलती हुई जिज्ञासा है, सीखने का जुनून है और हार ना मानने की हिम्मत है तो आप भी ब्रह्मांड के नियम बदल सकते हैं। कभी अपने आप को किसी से कम मत समझो। अगर एक ऐसा बच्चा जिसे बोलना तक नहीं आता वो आगे चलकर इंसानी इतिहास का सबसे महान वैज्ञानिक बन सकता है तो आप कुछ भी कर सकते हो।
बिहार में एक बार फिर से एनडीए की वापसी हुई है। नीतीश कुमार और बीजेपी दोनों ने मिलकर के आरजेडी और कांग्रेस समेत तमाम महागठबंधन की पार्टियों की हवा निकाल दी और इसके हवा निकाले जाने के बाद तेज प्रताप यादव जो कि कभी तेजस्वी यादव के साथ रहते थे। उनके सारथी होने का दावा करते थे और भाई को अर्जुन बना करके महाभारत जीतने का सपना दिखाया करते थे। उन्होंने अब तेजस्वी यादव की मौज ले ली। पहले तो उन्होंने
तेजस्वी यादव कह दिया यानी तेजस्वी यादव को फेल बता दिया और उसके बाद अपनी हार को लेकर के उन्होंने एक पोस्ट डाला है और नीतीश कुमार समेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खूब तारीफ की है। दरअसल तेजू भैया ने एक्स पर लिखा है कि हमारी हार में भी जनता की जीत छिपी है। आज के परिणामों को मैं जनादेश के रूप में स्वीकार करता हूं। हमारी हार कर भी जीत हुई है क्योंकि बिहार ने यह साफ संदेश दे दिया है कि अब राजनीति परिवारवाद की नहीं सुशासन और शिक्षा की होगी। यह जयचंदों की करारी हार है। हमने पहले ही कहा था कि इस
चुनाव के बाद बिहार से कांग्रेस खत्म हो जाएगी और आज कहना नहीं साफ-साफ दिख भी रहा है। मैं तो हार कर भी जीता हूं क्योंकि मेरे साथ जनता का प्रेम, विश्वास और आशीर्वाद खड़ा है। लेकिन सच्चाई कड़वी है। इन जयचंदों ने आरजेडी को भीतर से खोखला कर दिया, बर्बाद कर दिया। इसी वजह से आज तेजस्वी फिलसफरी हो गया है। जिन्होंने अपनी कुर्सी और अपनी राजनीति बचाने के लिए अपने ही घर को आग लगा दी। इतिहास इन्हें कभी माफ नहीं
करेगा। मैं बार-बार कहता हूं जनता ही मां-बाप होता है। जनता का फैसला सर माथे पर और आज भी उसी भावना के साथ मैं आपका फैसला स्वीकार करता हूं। हार और जीत अलग-अलग बातें हैं। लेकिन इरादा और प्रयास ही असली हीरो होते हैं। महुआ की जनता से मैंने जो वादे किए थे उनको निभाने का प्रयास मैं लगातार करता रहूंगा। चाहे मैं विधायक बनूं या नहीं। मेरे दरवाजे हर समय जनता के लिए खुले
रहेंगे। बिहार ने सुशासन की सरकार चुनी है। हम उसका सम्मान करते हैं और जनता के हित में हर कदम पर रचनात्मक भूमिका निभाएंगे। यह जीत हमारे यशस्वी कर्मठ प्रधानमंत्री और विश्व के सबसे मजबूत नेता श्री नरेंद्र मोदी जी के ही उनके व्यक्तित्व और उनके जादुई नेतृत्व का यह कमाल है। जनता ने माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के सुशासन को खुले दिल से अपनाया है। बिहार की यह ऐतिहासिक जीत भारत के गृह मंत्री और बीजेपी के चाणक्य
माननीय अमित शाह और भारत सरकार में मंत्री और बीजेपी बिहार के प्रभारी श्री धर्मेंद्र प्रधान की कूटनीति दूरदृष्टि और दिनरा किए गए परिश्रम का परिणाम है। इस विजय का सबसे बड़ा कारण एनडीए की अटूट एकता है। एनडीए गठबंधन की सभी पांचों पार्टियों पांच पांडवों ने एकजुट होकर के चुनाव लड़ा और जनता ने अपना विश्वास मत और भरपूर समर्थन देकर के इस एकता को विजय की शक्ति में बदल दिया। यह जीत बिहार की जनता की यह जीत विश्वास की है। यह जीत विकास और सुशासन के संकल्प की है। मैं बिहार के युवा शक्ति मातृशक्ति और आप सभी को
दिल से धन्यवाद देता हूं। आपने मुझे अपार प्यार दिया और यह प्रेम मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। जनता की आवाज बनकर हम और मजबूती से वापस लौटेंगे। धन्यवाद। तेज प्रताप यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष जनशक्ति जनता दल। यानी तेज प्रताप यादव ने ना सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी से लेकर के बीजेपी और एनडीए के तमाम नेताओं की तारीफ कर डाली बल्कि अब सीधे-सीधे संदेश भी दे दिया है कि अब उनकी करीबी किस तरफ जा रही है। हालांकि इस बात की संभावना
पहले से ही थी क्योंकि वो लगातार एक्टर और सांसद रविकिशन के साथ नजर आते थे। एयरपोर्ट से लेकर के कई जगह उनकी जुगलबंदी देखने को मिली और अब इस जीत के बाद उन्होंने कमेंट करके और फिलसफी यादव लिख के अपनी आगे की रणनीति साफ कर दी है। इस खबर में फिलहाल इतना ही। अपडेट्स के लिए बने रहिए वन इंडिया हिंदी के साथ। नमस्कार।
एक बार की बात है एक गांव में एक धोबी रहता था जिसके पास एक गधा था। हर दिन बेचारा गधा भारी भरकम कपड़ों के गट्ठर एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाता था। लेकिन धोबी बेहद कंजूस था। वह गधे को ना ठीक से खाना देता था और ना आराम। रात में वह बस उसे खोल देता और उससे कहता जा अपना खाना अपने आप ढूंढ ले। थका हारा गधा रात के अंधेरे में
यहां से वहां भटकता और अपने लिए खाने की तलाश करता। उसका शरीर इतना कमजोर हो गया था कि उसकी हड्डियां साफ दिखाई देती थी। एक रात जब वह दुखी होकर घूम रहा था तब उसे एक लोमड़ी मिली। लोमड़ी ने उसे देखा और उससे पूछा अरे भाई तुम इतने दुबले और कमजोर क्यों हो? गधे ने दुखी होकर कहा,
“क्या बताऊं दोस्त? मेरा मालिक मुझसे दिन भर काम करवाता है और रोटी पानी कुछ नहीं देता। रात को मुझे अंधेरे में खुद ही खाना ढूंढना पड़ता है। लोमड़ी बोली, तो अब से तुम्हें यह तकलीफ नहीं उठानी पड़ेगी। आज रात मेरे साथ चलो। पास ही में एक बड़ा सब्जियों का
बगीचा है। गाजर, मूली सब वहां भरे पड़े हैं। मैंने अंदर जाने का एक गुप्त रास्ता भी बनाया हुआ है। मैं हर रात वहां जाकर पेट भरकर खाती हूं। आज रात तुम भी चलो। फिर से तंदुरुस्त हो जाओगे। गधे की आंखें चमक उठी। उसने कहा, तो चलो। उस रात दोनों चुपके-चुपके उस बगीचे में घुस गए। महीनों बाद उस गधे ने
अच्छी तरह खाना खाया। वह खुद को फिर से जिंदा महसूस कर रहा था। उस दिन के बाद उन दोनों में दोस्ती हो गई और वह हर रात मिलकर दावत उड़ाने लगे। कुछ ही दिनों में गधे का शरीर मजबूत हो गया। अब उसका बदन चमकने लगा और उसकी चाल में गर्व आ गया। वो अपनी सारी परेशानियां भूल गया था। एक रात भरपेट भोजन के बाद गधे को अजीब सा आनंद
महसूस हुआ। वह झूमने लगा और आसमान की ओर गर्दन उठाने लगा। लोमड़ी ने चिंतित होकर पूछा, “यह क्या कर रहे हो दोस्त?” गधा मुस्कुरा कर बोला, आज मैं आनंद में हूं। मेरा मन कर रहा है कि मैं गाना गाऊं। अच्छे भोजन के बाद खुशी से गाना तो बनता है। लोमड़ी घबरा गई। अरे नहीं नहीं यह मत करना। हम यहां चोरी से आए हैं। अगर चौकीदारों ने सुन लिया तो हम दोनों पकड़े जाएंगे। लेकिन गधे ने गर्व से कहा। तुम संगीत समझती नहीं हो प्रिय
लोमड़ी तुम तो जंगल के जीव हो। कला क्या होती है यह तुम क्या जानो। मैं जन्मजात गायक हूं। मेरी आवाज सुनकर तो बगीचे का मालिक भी नाचने लगेगा। लोमड़ी ने हाथ जोड़कर कहा, अरे भाई मेरी बात मानो। तुम चाहे महान गायक हो पर अभी नहीं। अगर तुमने यहां गाया तो हम दोनों की खैर नहीं। गधा गुस्सा हो गया। लोमड़ी आज तुमने मेरी आवाज का मजाक उड़ाया। बस अब तुम देखना दुनिया किस तरह मेरी
गायकी की तारीफ करती है। लोमड़ी ने समझ लिया कि गधा नहीं मानेगा। उसने कुछ सोचा फिर चालाकी से कहा अच्छा भाई मान लिया तुम महान गायक हो। मैं तुम्हारे लिए फूलों की माला लाती हूं। तुम कुछ देर बाद गाना शुरू करना ताकि मैं समय पर आकर तुम्हारा सम्मान कर सकूं। गधा हंसकर मान गया। जैसे ही लोमड़ी वहां से निकली, गधे ने आंखें बंद की, गर्दन ऊपर उठाई और जोर-जोर से रेकने लगा। बगीचे के चौकीदार एकदम जाग पड़े। वो लाठियां लेकर आवाज की तरफ दौड़े और
बोले, यही है। यही गधा हमारा बगीचा खराब कर रहा था। और उन्होंने उस गधे को पीटना शुरू करा। वे उसे तब तक पीटते रहे जब तक वह अधमरा होकर जमीन पर नहीं गिर पड़ा। दूर से यह सब देखते हुए लोमड़ी ने अपना सिर हिलाया और धीरे से कहा मूर्ख वही है जो अपने दोस्त की बात नहीं मानते। जब कोई आपको अच्छी सलाह दे खासकर वो इंसान जो आपकी परवाह करता हो तो देर होने से पहले उसे सुन
लेना चाहिए। अहंकार और घमंड सबसे चतुर दिमाग को भी अंधा कर देते हैं। याद रखो जो अच्छे सुझाव को ठुकराते हैं उन्हें अक्सर दर्द से सीखना पड़ता है। सच्ची समझदारी अपनी आवाज दिखाने में नहीं अनुभव की खामोशी को सुनने में है। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको दूसरी कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
क्या आप भी रोज YouTube पर मोटिवेशनल वीडियोस देखते हैं और यह सोचते हैं कि इससे आपकी जिंदगी बदल जाएगी या आप सफल बन जाएंगे तो माफ कीजिए। लेकिन आप भी उन लाखों लोगों में से एक हैं जो सोचते हैं कि सिर्फ मोटिवेशन से वह सफल बन जाएंगे। जब तक आप अपनी जिंदगी में डिसिप्लिन यानी अनुशासन नहीं लाते तब तक मोटिवेशन कुछ
उखाड़ नहीं सकता। अगर आप इस बात को अच्छी तरह समझना चाहते हैं तो यह कहानी अंत तक सुने। हो सकता है यह कहानी आपकी जिंदगी बदल दे। छोटे से कस्बे में आरव नाम का एक लड़का रहता था। वो बहुत बड़े सपने देखा करता था। हर दिन वो सोचता मुझे जिंदगी में कुछ ऐसा करना है जिससे लोग मुझे याद रखें। वो रोज मोटिवेशनल वीडियोस देखता, स्टोरीज पढ़ता और सक्सेसफुल लोगों की
स्पीच सुनता। वो अपने आप से बार-बार कहता कल से मैं रोज इतने घंटे पढ़ाई करूंगा। अब से मैं हर चीज बदल दूंगा। और जब वह सोचता तो अंदर से जोश और एक्साइटमेंट महसूस करता। लेकिन वह जोश ज्यादा देर तक टिकता नहीं था। बस दो या तीन दिन बीतते और वो फिर अपनी आलसी आदतों पर लौट आता। कभी मन नहीं हुआ तो पढ़ाई छोड़ दी। कभी मौसम अच्छा नहीं लगा तो टहलने निकल गया। धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बहानों का ढेर बन गई। बार-बार कोशिश करके असफल होने से वह अंदर
से टूट गया था। उसे लगने लगा कि शायद वह कभी बदल नहीं सकता। एक दिन वो अपने दोस्त विवेक से मिला। विवेक को देखकर आरव हैरान रह गया। विवेक हर सुबह जल्दी उठता, अपनी दिनचर्या का पालन करता, पढ़ाई समय पर करता और हर दिन अपने आप को बेहतर बनाता। आरव ने पूछा, “यार विवेक, तू यह सब कैसे करता है? तू हर दिन इतना मोटिवेटेड कैसे रहता है?” विवेक मुस्कुराया और बोला, “मैं
मोटिवेशन पर नहीं डिसिप्लिन पर भरोसा करता हूं।” आरव हैरान रह गया और बोला, “क्या? लेकिन सब तो कहते हैं मोटिवेशन ही सक्सेस की कूंजी है। विवेक ने ना सिर हिलाया और बोला कल सुबह सूरज निकलने से पहले मेरे साथ नदी किनारे चलना। मैं तुझे कुछ दिखाना चाहता हूं। अगली सुबह विवेक के साथ आरव नदी किनारे पहुंचा। वहां पर एक बूढ़ा मछुआरा बैठा था। उसके हाथ सख्त थे और आंखों में
अनुभव की गहराइयां थी। विवेक ने कहा दादा जी क्या आप को वह कहानी सुना सकते हैं जो आपने मुझे सुनाई थी? मछुआरे ने मुस्कुराते हुए आरव को देखा। बेटा क्या तुम इस नदी को देख रहे हो? मैं रोज इसी वक्त यहां पर आता हूं। चाहे सर्दी हो, बारिश हो या धूप। मैं हर दिन अपना जाल डालता हूं और सब्र के साथ मछलियों का इंतजार करता हूं। किसी दिन मुझे अच्छी मछलियां मिलती हैं। किसी दिन बेकार
मछलियां मिलती हैं और किसी दिन मिलती ही नहीं। लेकिन मैं आना नहीं छोड़ता। जानते हो क्यों? आरव ने सोचा और फिर बोला क्योंकि आपको मछली पकड़ना पसंद है। मछुआरा हल्के से हंसा। नहीं बेटा यह मेरा शौक नहीं है। यह मेरी जिम्मेदारी है। अगर मैं सिर्फ उस वक्त आता जब मेरा मन करता है तो मेरा परिवार भूखा रह जाता। मैं मोटिवेशन का इंतजार नहीं करता। मैं अनुशासन पर यकीन रखता हूं। फिर मछुआरे ने बांस के पेड़ की तरफ इशारा किया और बोला, क्या तुमने बांस के पेड़ की कहानी सुनी है? आरव ने सिर हिलाया नहीं। मछुआरा बोला एक किसान ने एक बार बांस का बीज
बोया। वो हर दिन उसे पानी देता। धूप देता और उसकी देखभाल करता। एक साल बीता कुछ नहीं हुआ। दूसरा साल बीता फिर भी कुछ नहीं हुआ। तीसरा यहां तक कि चौथा साल भी बीत गया। फिर भी जमीन से कुछ नहीं उगा। लोग उस पर हंसते कि वो अपना समय बर्बाद कर रहा है। लेकिन किसान नहीं रुका। और पांचवें साल अचानक सिर्फ कुछ ही हफ्तों में बांस का पेड़ 90 फीट तक ऊंचा हो गया। क्यों?क्योंकि शुरुआत के 4 साल वो जमीन के अंदर अपनी जड़े मजबूत कर रहा था। अगर किसान हार
मान लेता तो वह कभी भी उसे बढ़ता हुआ नहीं देख पाता। मछुआरे ने मुस्कुरा कर कहा बेटा डिसिप्लिन भी उसी बांस की तरह है। शुरुआत में कोई नतीजा नहीं दिखता। लेकिन अंदर ही अंदर कुछ बड़ा बन रहा होता है और जब सही समय आता है तो सफलता इतनी तेजी से बढ़ती है कि लोग हैरान रह जाते हैं। आरव के अंदर कुछ बदल गया। उसे एहसास हुआ कि अब तक वो मोटिवेशन के पीछे भाग रहा था। जबकि उसे अनुशासन की जरूरत थी। उसने
यह तय किया कि अब से वह कोई एक्सक्यूज नहीं करेगा। हर दिन एक समय पर उठेगा। हर दिन पढ़ाई करेगा। व्यायाम करेगा और अपने लक्ष्य पर काम करेगा। चाहे उसका मन हो या ना हो। क्या आप भी आरव की तरह अपने सपनों के लिए तैयार हैं? तो याद रखिए
मोटिवेशन नहीं डिसिप्लिन ही असली ताकत है। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह दूसरी कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गांव में एक साधारण आदमी रहता था। उसका काम था पहाड़ पर जाकर दिनभर पत्थर तोड़ना। यह काम कठिन था, थकाऊ था। लेकिन उस आदमी को अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। वह सुबह काम पर जाता, दिनभर मेहनत करता और शाम को थोड़े बहुत पैसे लेकर लौट आता। उसी पैसे से अपने परिवार का
गुजारा चलता था। रात को अपने घर आकर वो अपने परिवार के साथ कुछ वक्त बिताता और फिर आराम से सो जाता। यही उसकी रोजमर्रा की जिंदगी थी। लेकिन एक दिन काम खत्म करके घर लौटते समय उसके मन में एक विचार आया क्या यही जिंदगी है? सुबह से शाम तक पत्थर तोड़ो और उसके बदले में इतने कम पैसे मिले कि मुश्किल से गुजारा हो पाए। काश मेरे पास कोई ऐसी शक्ति होती कि मैं जो चाहूं वो बन पाता। वो गहरी सोच में डूबा हुआ घर पहुंचा। खाना उसके आगे रखा गया लेकिन उसका ध्यान
अपने विचार में ही डूबा हुआ था। धीरे-धीरे वह सोने लगा और नींद में चला गया। तभी उसे एक अजीब सपना आया। वो देखता है कि रोज की तरह वो अपने काम से घर लौट रहा है और रास्ते में उसे एक बहुत ही आलीशान मकान दिखा। घर इतना शानदार था कि देखकर उसके मन में ख्याल आया काश यह घर मेरा होता। काश मैं इसका मालिक होता। और जैसे ही उसने यह सोचा पल भर में वही घर उसका हो गया। वह उस घर के अंदर था। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। सचमुच जो उसने चाहा वो उसे मिल गया। लेकिन यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक पाई।
अचानक उसने एक शोर सुना। दरवाजे पर जाकर देखा तो उसे एक बहुत बड़ी रैली दिखाई दी। लोग जोर-जोर से नारे लगा रहे थे। बीच में एक नेता खड़ा था और लोग उसके नाम के जयकारे कर रहे थे। वो सोचने लगा मैं इस आलीशान घर का मालिक हूं। लेकिन असली ताकत तो उस नेता के पास है। अगर मैं वह नेता बन जाऊं तो हजारों लोग मुझे देखने के लिए तरसेंगे। बस इतना सोचना था कि वो नेता बन गया। चारों ओर लोगों की भीड़, नारे सब उसके लिए कर रहे थे। वो खुशी से पागल हो गया। लेकिन यह
खुशी भी ज्यादा देर तक नहीं टिकी। तभी धूप बढ़ने लगी। कड़ी गर्मी और रोशनी से उसका सिर चकराने लगा। पसीने से लथपथ होकर वह बैठ गया और उसे एहसास हुआ इस नेता से भी कोई ताकतवर है और वह है सूरज। असली ताकत तो उसी की है। उसके मन में विचार आया काश मैं सूरज बन जाऊं और पलक झपकते ही वह सूरज बन गया। पूरा संसार अब उसकी रोशनी से जगमगा उठा। उसे लगा कि अब इस दुनिया में उससे ताकतवर कोई नहीं है। लेकिन यह खुशी भी ज्यादा देर तक नहीं रही। कुछ ही देर बाद
आसमान में बादल खिराए। सूरज की रोशनी पूरी तरह ढक गई। उसने महसूस किया कि बादल तो उससे भी ताकतवर है और सोचने लगा काश मैं बादल बन जाऊं। और इतना सोचते ही वो बादल बन गया और आसमान में उड़ने लगा। उसे लगने लगा कि अब कोई उसकी बराबरी नहीं कर सकता। वो जहां चाहे वहां बरस सकता था और सुनामी ला सकता था। लेकिन अचानक तेज हवाएं चलने लगी और उस बादल को इधर-उधर उड़ाने लगी। उसके मन में ख्याल आया हवा तो बहुत शक्तिशाली है। काश मैं हवा बन जाऊं। और यह बोलते ही वो हवा बन गया। अब वह चाहे तो धीरे-धीरे उड़े या चाहे आंधी बनकर सब कुछ बहा ले जाए। उसे लगा अब सचमुच दुनिया में
ताकतवर मैं ही हूं। लेकिन तभी उसके सामने एक पत्थर का पहाड़ आया। उसने पूरी ताकत लगाई। आंधी बनकर भी उड़ा लेकिन उसे 1 इंच भी नहीं हिला पाया। उसने हैरानी के साथ सोचा तो इस दुनिया में हवा से भी ज्यादा शक्तिशाली कोई है तो वह है यह पहाड़। काश मैं यह पहाड़ बन जाऊं। और इतना सोचते ही वो मजबूत पहाड़ बन गया। उसे लगने लगा कि अब कोई भी ताकत उसे हिला नहीं सकती। लेकिन अचानक उसे दर्द होने लगा जैसे कोई आदमी उसे चोट पहुंचा रहा हो। उसने देखा कि एक आदमी हथौड़ी लेकर पत्थर तोड़ रहा था। उसे झटका लगा। यह कैसे हो सकता है? पहाड़ जैसे मजबूत को भी
कोई तोड़ सकता है। आखिर इतनी ताकत किसके पास है? उसके मन में ख्याल आया काश मैं वही इंसान बन जाऊं जो इस पत्थर को तोड़ रहा है। लेकिन इस बार उसकी इच्छा पूरी नहीं हुई। वो दर्द से तड़पता रहा। तभी उसका सपना टूटा। वो घबरा कर उठा और उसने आईने में अपने आप को देखा। तब उसे समझ में आया। सपने में मैं वह इंसान इसलिए नहीं बन पाया क्योंकि असलियत में मैं वह इंसान ही हूं जो पहाड़ को तोड़ सकता है। मैं वही हूं जिसकी मेहनत से हर कुछ संभव है। उस दिन उसे यह सच्चाई समझ आई। कभी भी अपने आप को कम मत
समझो। तुम्हारे अंदर ही सबसे बड़ी ताकत है। अगर तुम अपने आप को कम आंकते हो तो दुनिया तुम्हें और भी कम समझेगी। लेकिन अगर तुम अपनी असली ताकत को पहचान लोगे तो तुम्हें कोई रोक नहीं सकता। सबसे बड़ी शक्ति तुम्हारे अंदर ही है। दोस्तों, अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है, तो आपको यह कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
जब भी हम जानवरों की बात करते हैं तो अक्सर हमारे दिमाग में हाथी की ताकत या चीते की रफ्तार का ख्याल आता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जंगल का राजा आखिर शेर ही क्यों होता है? असल में शेर के अंदर ऐसे पांच खास गुणन हैं जो ना सिर्फ उसे
जंगल का राजा बनाते हैं बल्कि अगर हम इंसान भी इन गुणों को अपनी जिंदगी में उतार लें तो हम भी अपने लक्ष्य और जीवन के राजा बन सकते हैं। आइए जानते हैं शेर के वो पांच अद्भुत गुण और यह पांचवा गुण। तो इतना जरूरी है कि उसके बिना कोई भी सफलता अधूरी है। पहला आत्मविश्वास। शेर जब चलता है तो उसके चेहरे पर घमंड नहीं बल्कि एक
ठहराव और भरोसा होता है। वह जानता है कि वह कौन है और उसे क्या करना है। वो ना तो बिना वजह डरता है और ना ही किसी को डराने की कोशिश करता है। उसका आत्मविश्वास ही उसे सबकी नजर में खास बनाता है। दूसरा स्पष्ट लक्ष्य और फोकस शेयर। जब शिकार करता है तो वह बार-बार कोशिश नहीं करता। वो इंतजार करता है, सही वक्त देखता है और एक
ही बार में वार करता है। उसका लक्ष्य बिल्कुल साफ होता है। जिंदगी में भी जब तक हम अपना फोकस नहीं तय करेंगे तब तक हम सिर्फ दौड़ते रहेंगे। पहुंचेंगे कहीं नहीं। तीसरा साहस और निर्णय क्षमता। शेर कभी भी पीछे नहीं हटता। भले सामने हाथी ही क्यों ना खड़ा हो वो डर से नहीं। साहस और रणनीति से आगे बढ़ता है। वह सही वक्त पर सही फैसला लेता है और उसी पर कायम रहता है। चौथा जिम्मेदारी शेर अकेला चलता है। लेकिन जब बात अपने समूह की आती है तो वह सबसे पहले खड़ा
होता है। अपने परिवार की सुरक्षा हो या पूरे इलाके की हिफाजत शेर अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटता। एक असली राजा वह होता है जो खुद से पहले दूसरों की सोचता है। पांचवा गुण जानने से पहले हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें। पांचवा अनुशासन। शेर की हर दिनचर्या में एक पैटर्न होता है। वो कब उठेगा, कब शिकार करेगा, कब आराम करेगा, सब तय होता है। उसकी ताकत सिर्फ शरीर में नहीं उसके अनुशासन में भी छुपी होती है। जिंदगी में कोई भी बड़ी सफलता हर दिन की मेहनत,
अनुशासन और निरंतरता से ही मिलती है। यही वह पांच गुण है जो अगर हम अपने जीवन में उतार लें तो हम भी अपने भाग्य, अपने सपनों और अपने लक्ष्य के राजा बन सकते हैं। आपने शेर के यह पांच अनमोल गुण सीख लिए।
लेकिन क्या आप जानते हैं एक सच्चे दोस्त की क्या पहचान होती है? अगर जानना चाहते हैं तो इसे शेयर करें ताकि नेक्स्ट स्टोरी लेकर आए।
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