
बहुत समय पहले की बात है। भारत के एक राज्य में एक राजा रहा करता था। राजा बहुत ही दयालु और न्यायप्रिय था। लेकिन राजा की एक छोटी सी समस्या थी। उसकी इकलौती बेटी बहुत गुस्सैल थी। राजकुमारी को जरा-जरा सी बात पर गुस्सा आ जाता था। कोई उसकी बात नहीं माने तो गुस्सा। कोई चीज ना मिले तो गुस्सा। जब भी उसे गुस्सा आता वो यह नहीं देखती कि उसके सामने कौन खड़ा है। चाहे सेवक हो या उसकी
दासियां हो या फिर उसके अपने माता-पिता। गुस्से में उसके मन में जो भी आता वह सब कुछ कह देती। कभी-कभी तो अपने आसपास की चीजें उठाकर तोड़ने लगती। राजा अपनी राजकुमारी से बहुत प्रेम करते थे। उन्होंने कई बार राजकुमारी को समझाने की कोशिश की। कभी लाड़ से तो कभी डांट कर। लेकिन राजकुमारी की आदतें बदलने का नाम ही नहीं ले रही थी। राजा अब बहुत चिंतित रहने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि
अपनी राजकुमारी को सही रास्ते पर कैसे लाया जाए। आखिरकार राजा ने अपने राजगुरु को बुलाया। राजगुरु बहुत ही ज्ञानी और एक बुद्धिमान व्यक्ति थे। उन्होंने राजा की परेशानी सुनी और मुस्कुराते हुए बोले महाराज आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। आने वाले कुछ ही दिनों में राजकुमारी का गुस्सा पूरी तरह खत्म हो जाएगा। राजा को यह सुनकर राहत तो मिली लेकिन वह चकित भी थे। उन्होंने सोचा यह कैसे संभव होगा? लेकिन
उन्होंने अपने राजगुरु पर यकीन किया। अगले दिन जब राजगुरु राजकुमारी को पढ़ाने गए तो उन्होंने उससे कहा आज हम कोई पढ़ाई नहीं करेंगे। आज हम एक खेल खेलेंगे। खेल का नाम सुनते ही राजकुमारी मुस्कुराने लगी। राजगुरु उसे महल के पीछे की एक बड़ी दीवार के पास ले गए। दीवार के पास कुछ कीलें रखी हुई थी। राजगुरु बोले यह खेल आसान है। जब भी तुम्हें गुस्सा आए तुम्हें एक कील उठानी है और इस दीवार पर लगा
देनी है। राजकुमारी ने हैरानी से पूछा लेकिन इससे क्या होगा? राजगुरु ने मुस्कुराते हुए कहा जब यह खेल खत्म होगा तब तुम्हें एक बहुत ही सुंदर पीला गुलाब मिलेगा और तुम्हें गुलाब अच्छे लगते हैं ना। गुलाब का नाम सुनकर राजकुमारी मुस्कुराने लगी और उन्होंने इस खेल के लिए हां कर दी। अब जब भी राजकुमारी को गुस्सा आता वह दीवार की ओर भागती और वहां पर एक हल्की सी कील लगा देती। अगले ही दिन दीवार में 10 से ज्यादा कीलें लग चुकी थी। लेकिन धीरे-धीरे
राजकुमारी को यह एहसास हुआ कील को लगाने में बहुत मेहनत लगती है। दीवार तक जाना पड़ता है। कील उठानी पड़ती है और फिर उसे लगानी पड़ती है। यह सब आसान नहीं था। राजकुमारी ने सोचा जितनी मेहनत मैं कील लगाने में लगाती हूं उससे तो आसान है कि मैं अपना गुस्सा ही रोक लूं। और इसी सोच के साथ अगले दिन दीवार में सिर्फ आठ कीले लगी। फिर उससे अगले दिन और कम और उससे अगले दिन और कम। धीरे-
धीरे यह संख्या कटती गई। एक दिन ऐसा भी आया जब राजकुमारी को एक भी बार गुस्सा नहीं आया और उन्हें एक भी कील लगानी नहीं पड़ी। खुश होकर वह भागती हुई राजगुरु के पास गई और बोली गुरु जी आज मैंने एक भी कील नहीं लगाई क्योंकि मुझे एक बार भी गुस्सा नहीं आया। राजगुरु मुस्कुराए और बोले बहुत अच्छा किया लेकिन अभी यह खेल खत्म नहीं हुआ। अब से जब भी तुम्हें एक बार भी गुस्सा नहीं आया। उस दिन के अंत में तुम्हें इस दीवार से एक कील निकाल देनी होगी।
राजकुमारी ने अगले दिन वैसा ही करना शुरू किया। धीरे-धीरे उस दीवार से कीलें निकलने लगी क्योंकि कीलें बहुत ज्यादा थी। उन्हें निकालने में एक महीने से भी ज्यादा का समय लग गया और आखिरकार वो दिन भी आ गया जब दीवार से सारी कीलें निकल चुकी थी। राजकुमारी खुशी-खुशी गुरु जी के पास गई और बोली गुरु जी अब दीवार में एक भी कील नहीं बची। गुरुजी मुस्कुराए और उस दीवार के सामने गए और राजकुमारी से बोले ध्यान से इस दीवार को देखो। क्या तुम्हें कुछ
नजर आ रहा है? राजकुमारी ने कहा कि नहीं गुरु जी इस दीवार में तो कुछ भी नहीं है। राजगुरु ने फिर से कहा कि ध्यान से देखो शायद कुछ नजर आया। राजकुमारी ने देखा और फिर कहा हां जहां-जहां पर मैंने कील लगाई थी उस जगह पर कुछ निशान रह गए हैं। गुरु जी मुस्कुराए और अपनी गहरी आवाज में बोले बिल्कुल सही। देखो जैसे कीले निकलने के बाद भी इस दीवार पर निशान रह गए हैं। उसी तरह जब भी तुम गुस्से में अपने माता-पिता से बुरी बातें कहती हो तो उनके दिल
पर भी एक निशान लग जाता है। भले ही बाद में तुम उनसे माफी मांग लो लेकिन वो निशान याद बनकर उनके दिल पर हमेशा लगा रहता है। यह सुनते ही राजकुमारी की आंखों में आंसू आ गए। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वह दौड़ती हुई अपने पिता राजा के पास गई। उन्हें गले लगाया और रोते हुए बोली, “पिताजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं वादा करती हूं कि आज के बाद कभी भी गुस्सा नहीं करूंगी। अब मैं समझ गई हूं कि मैंने आपका दिल कितना दुखाया है।” राजा की आंखों में भी आंसू आ गए। उन्होंने अपनी बेटी को
गले लगाया और उसे वह पीला गुलाब दिया जिसका वादा राजगुरु ने उससे किया था। उस दिन के बाद से राजकुमारी ने कभी भी किसी पर गुस्सा नहीं किया। वह समझ चुकी थी कि असली हिम्मत अपने गुस्से को काबू करना है और अपने माता-पिता का दिल दुखाना सबसे बड़ी गलती
