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Tag: ज़्यादा सोचना छोड़ों – Story of a Sad Farmer | Motivational Story in Hindi

  • ज़्यादा सोचना छोड़ों – Story of a Sad Farmer | Motivational Story in Hindi

    एक शांत गांव था। उसी गांव में एक साधारण आदमी रहता था। मोहन गांव में लोग उसे सोचू मोहन कहते थे। वजह यह थी कि वह हर बात पर बहुत सोचता था। खेत में काम करे तो सोचता, घर बैठे तो सोचता। यहां तक कि किसी से बात भी करे तो बाद में घंटों उसके शब्दों के बारे में सोचता रहता। गांव वाले हंसकर कह दे। अरे इसे कोई काम मत देना। यह 2 घंटे सिर्फ सोचता ही रहेगा। करेगा कुछ नहीं। मोहन की यही सबसे बड़ी समस्या थी। वह जीवन को बहुत ही मुश्किल मानता था। फसल

    अच्छी हो या बेकार, घर में झगड़ा हो या सुकून उसे हर चीज बस बोझ ही दिखाई देती। वो अक्सर अपने आप से पूछता क्यों जिंदगी इतनी मुश्किल है? क्यों मैं चैन से नहीं जी सकता? एक साल की मेहनत के बाद जब मोहन की फसल तैयार हुई तो अचानक ही उस पर कीड़ों ने हमला कर दिया। महीनों का पसीना, मेहनत सब मिट्टी में मिल गया। मोहन का दिल टूट गया। घर लौटकर उसने अपनी पत्नी से कहा, अब मैं और नहीं कर सकता। जिंदगी मुझसे संभलती नहीं है। हर चीज

    मुझे भारी लगती है। उसकी पत्नी ने धीरे से उत्तर दिया, “अगर तुम्हें इसका जवाब ढूंढना है, तो दूसरों से मत पूछो। या तो अपने आप से पूछ कर देखो या फिर किसी ऐसे से जो जिंदगी को सच में समझ गया हो।” उस रात मोहन देर तक जागता रहा। उसकी आंखों में अचानक एक नाम चमका। गौतम बुद्ध उसे बचपन में दादी की कहानियां याद आई। कैसे बुद्ध राजमहल त्याग कर

    सच्चाई की तलाश में निकल गए थे। मोहन को पता चला कि पास के पहाड़ों के नीचे एक विशाल पीपल का पेड़ है। जहां पर एक महात्मा साधु ध्यान करते हैं। लोगों का यह मानना था कि उन्होंने बुद्ध से ही सीख ली है। मोहन ने यह ठान लिया। अगर कहीं जवाब मिलेगा तो उसी महात्मा के पास मिलेगा। सुबह सूरज निकलते ही उसने सर पर पगड़ी बांधी और निकल पड़ा। रास्ता आसान नहीं था। कांटे, पथरीले पत्थर, धूप लेकिन उसके अंदर

    की बेचैनी इन सब मुश्किलों से आगे थी। दोपहर ढल रही थी जब वह आखिरकार उस पीपल के पेड़ के नीचे पहुंचा। वहां पर एक साधु शांत भाव से ध्यान में बैठे थे। उनके चेहरे से शांति टपक रही थी। ना उनके पास कोई वस्तु थी, ना कोई शिष्य, बस गहरी निरवता। मोहन कुछ देर तक बैठा रहा। फिर हिम्मत जुटाकर उनसे बोला, महात्मा जी, मैं एक सवाल लेकर आया। साधु ने आराम से अपनी आंखें खोली और मुस्कुराते हुए मोहन से कहा, “तुम सवाल लेकर नहीं जवाब की तलाश में यहां पर

    आए हो। बोलो।” मोहन नीचे बैठ गया। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा जिंदगी मुझे बहुत मुश्किल लगती है। छोटी-छोटी बातें बहुत परेशान करती हैं। रिश्ते टूटते हैं। लोग बदल जाते हैं। मेहनत का हक नहीं मिलता। क्या यही जीवन है? साधु ने मुस्कुरा कर जमीन से एक हल्का सा पत्थर उठाया और बोले, “इसे हाथ में लो।” मोहन ने वो पत्थर उठा लिया। फिर साधु बोले, अब मुट्ठी कसकर बंद करो और इसे जोर से दबाओ।” मोहन

    ने वैसा ही किया। 1 मिनट बाद फिर साधु ने पूछा क्या महसूस हो रहा है? मोहन बोला हल्का दर्द हो रहा है। हाथ में झनझनाहट है। साधु ने कहा क्यों? क्योंकि तुमने इस हल्के से पत्थर को कसकर पकड़ा है। यही जिंदगी की हकीकत है। जीवन मुश्किल नहीं होता बल्कि हम उसकी छोटी-छोटी बातों को कसकर पकड़े रहते हैं। जैसे ही तुम इस पत्थर को अपने हाथ से निकाल दोगे, दर्द भी चला जाएगा और तुम्हारा बोझ भी। मोहन जैसे जाग गया। वापस लौटते हुए रास्ते में उसने हर वस्तु को

    हल्के में लेना शुरू किया। सूखे पत्ते, धूप की किरण, हवा सब में उसको सुंदरता दिखने लगी। गांव पहुंचा तो उसकी पत्नी ने पूछा, कोई जवाब मिला? मोहन ने मुस्कुरा कर बस इतना कहा। अब मैंने अपने हाथ से पत्थर निकाल लिया है। धीरे-धीरे लोगों ने उसके अंदर बदलाव देखने शुरू किए। अब वह शिकायत नहीं करता था। अगर उसकी फसल बेकार होती तो कहता इस बार मिट्टी को आराम की जरूरत थी। अगर कोई उसे ताना मारता तो वह बस मुस्कुरा देता। लोग हैरान होते। यही वो मोहन है जो पहले हर बात पर दुखी हो जाता था।

    अब हर चीज को स्वीकार कर रहा। अब मोहन हर शाम गांव के परगद के नीचे बैठता। कोई भी परेशान होकर वहां से गुजरता तो मोहन बस उससे एक ही बात कहता। जिंदगी की सारी उलझनें मुट्ठी में दबे पत्थर जैसी होती है। बस उसे हाथ से निकालना सीखो। दोस्तों, इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है। जिंदगी मुश्किल नहीं है। हम ही उसे अपने विचार और परेशानियों से मुश्किल बना देते हैं। ज्यादा सोचना बंद करो और हल्का जीना सीखो। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है, तो आपको यह दूसरी कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।