
यह कहानी एक ऐसे बच्चे की है जिसने बचपन में टूटी हुई बोतलों में साइंस देखा। एक ऐसे जीनियस की जिसने महज 15 साल की उम्र में ग्रेजुएट होकर टॉप किया और उस वैज्ञानिक की जिसने फिजिक्स में इंडिया को फर्स्ट नोबेल प्राइज जिताया। लेकिन क्यों उसने गुस्से में आकर सरकार से मिले भारत रत्न को तोड़ दिया। आइए जानते हैं फादर ऑफ इंडियन साइंस की कहानी।
सीवी रमन की कहानी। सीवी रमन का जन्म नवंबर 1888 को तमिलनाडु में हुआ। रमन का परिवार मध्यमवर्गीय था। उनके घर में जरूरत का हर सामान मौजूद था। लेकिन रमन सिर्फ अपने सपनों और किताबों में खोए रहते थे। रमन के पिता कॉलेज में लेक्चरार थे। और रमन बचपन से ही पिताजी की फिजिक्स और मैथ्स की किताबें पढ़ा करते थे। जब दूसरे बच्चे पतंग उड़ाते रमन घर में अपनी पुरानी बोतलें और कांच के टुकड़ों से
प्रयोग किया करते। उनका मन हमेशा सवालों में उलझा रहता। रोशनी रंग क्यों बदलती है? कांच का टुकड़ा क्यों चमकता है? समुद्र क्यों नीला होता है? किसी को नहीं पता था कि यही सवाल आगे चलकर पूरी दुनिया को बदल देंगे। रमन का दिमाग इतना तेज था कि महज 11 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल की परीक्षा पास कर ली। 16 साल की उम्र में उन्होंने बीए टॉप किया और महज 18 साल की उम्र में एमए में गोल्ड मेडल हासिल किया।
लेकिन किस्मत उनके खिलाफ थी। उस समय इंडिया में रिसर्च के लिए अच्छे लैब्स नहीं थे। रमन साइंटिस्ट बनना चाहते थे। लेकिन मजबूरन उन्हें सरकारी नौकरी करनी पड़ी। फाइनेंस डिपार्टमेंट में साधारण क्लर्क की नौकरी। इंडिया को नोबेल प्राइज जिताने वाला व्यक्ति कभी सरकारी दफ्तर में फाइल्स पलटता था। लेकिन रमन रुके नहीं। वो लंच के समय बगल वाली लैब में दौड़ते और एक्सपेरिमेंट करते। कई-कई रातें उन्होंने बिना सोए सिर्फ रिसर्च में बिताई हैं। जब रमन की रिसर्च कुछ आगे बढ़ी। उन्होंने अपने पेपर इंग्लैंड के मशहूर अखबार के
लिए भेजे। लेकिन जवाब आया इंडिया में साइंस यह इंपॉसिबल है। हम पब्लिश नहीं करेंगे। रमन दुखी हुए लेकिन टूटे नहीं। उन्होंने फिर दोबारा लिखा और इतना अच्छा लिखा कि आखिरकार दुनिया ने रमन का नाम देखा। पहली बार किसी इंडियन के रिसर्च पेपर अंतरराष्ट्रीय अखबार में छपे। रमन हमेशा से नोबेल प्राइज जीतना चाहते थे। 1922 में जब रमन को एक यूनिवर्सिटी के द्वारा अवार्ड दिया गया तो रमन ने अपने भाषण में कहा अगले कुछ सालों में मैं नोबेल प्राइज जीतूंगा। वहां बैठे कई लोगों ने इस पर यकीन नहीं
किया। लेकिन यह भारत की साइंस के इतिहास में एक मोड़ था। एक दिन जब रमन समुद्र पर जहाज से यात्रा कर रहे थे। उन्होंने देखा कि समुद्र का पानी अलग-अलग रंगों में चमक रहा है। अगर कोई आम इंसान होता तो इस दृश्य को सुंदर कहकर आगे बढ़ जाता। लेकिन रमन की आंखों में फिर सवाल जाग उठे पानी रंग क्यों बदल रहा है? रोशनी ऐसा क्यों करती है? यही सवाल आगे चलकर उनके करियर की दिशा बदलने वाला था। 1921 से लेकर 1929 तक रमन ने रोशनी और उसके रहस्यों
पर हजारों एक्सपेरिमेंट किए। उनके पास हाईटेक मशीनें नहीं थी। बस कुछ इक्विपमेंट और उनकी अटूट जिज्ञासा। कई एक्सपेरिमेंट बर्बाद हुए। कई बार उन्हें लगा कि वह गलत दिशा में जा रहे हैं। लेकिन आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई। फरवरी 1929 को उन्होंने वह खोज की जिसने पूरी दुनिया को बदल दिया। रमन इफेक्ट्स यानी जब रोशनी किसी वस्तु से टकराती है तो वह सिर्फ परावर्तित नहीं होती बल्कि बदल भी जाती है। वो अपनी फ्रीक्वेंसी और रंग बदल सकती है।
यह डिस्कवरी इतनी महान थी कि 1930 में रमन को मिला नोबेल प्राइज इन फिजिक्स। वो फर्स्ट इंडियन बने जिन्होंने इंडिया में रहकर नोबेल प्राइज जीता। भारत सरकार ने रमन का अच्छा सम्मान किया। लेकिन रमन को सरकार की कुछ साइंस नीतियां अच्छी नहीं लगती थी। आगे चलकर रमन को उस वक्त के प्रधानमंत्री नेहरू से सख्त चिढ़ थी। एक बार उन्होंने नेहरू की किसी पॉलिसी से चिढ़कर अपना भारत रत्न पदक टुकड़े-टुकड़े कर दिया जो उन्हें नेहरू सरकार ने दिया था। एक अन्य
घटना में यह आता है कि उन्होंने नेहरू की प्रतिमा जमीन पर पटक दी। एक बार नेहरू ने रमन को उनके रिसर्च सेंटर के लिए वित्तीय सहायता की पेशकश की। जिसे रमन ने यह कहते हुए साफ मना कर दिया। मैं यह निश्चित रूप से नहीं चाहता कि यह एक और सरकारी लैब बन जाए। इसके बाद रमन ने इंडिया में कई सेंटर ओपन किए जिसमें इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस, रमन रिसर्च इंस्टट्यूट शामिल है। रमन ने पूरी जिंदगी विदेशी नागरिकता या विदेश में काम करने के प्रस्ताव को
ठुकराया है। रमन कहते थे कि मैं इंडियन हूं और इंडियन की साइंस पर ही हमेशा काम करना चाहता हूं। जब वो अपनी उम्र के आखिरी दौर में थे। 82 साल की उम्र में वो रोज अपने रिसर्च सेंटर जाया करते थे। उनके आखिरी दिनों में उनके कमरे में जो आखिरी चीज मिली वह कोई अवार्ड या मेडल नहीं था बल्कि एक प्रिज्म था जिससे वह रोज रोशनी को गिरते हुए देखते थे। रमन का इंडियन साइंस में जो योगदान है उसे याद करते हुए हर साल 28 फरवरी को पूरे इंडिया में साइंस डे मनाया जाता है।
क्योंकि इसी दिन इंडिया ने पहला नोबेल प्राइज इन फिजिक्स जीता था। रमन की जिंदगी एक संदेश देती है कि जिसको दुनिया इंपॉसिबल कहे उसे आपकी जिज्ञासा पॉसिबल बना सकती है। मिडिल क्लास घर का लड़का सरकारी नौकरी करते हुए दुनिया को रोशनी का रहस्य बता सकता है तो हम भी कुछ कर सकते हैं।
