
बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गांव में एक साहूकार रहता था। वह बहुत अमीर था और गांव के अधिकतर लोग उससे उधार लिया करते थे। उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसका स्वभाव काफी स्वार्थी और चालाक था। पैसों के मामले में वह किसी पर आसानी से भरोसा नहीं करता था और अपने फायदे के लिए झूठ बोलने से भी नहीं हिचकता था।
साहूकार का बटुआ खो गया
एक दिन साहूकार गांव के बाजार से अपने घर लौट रहा था। उस दिन बाजार में काफी भीड़ थी। उसी अफरातफरी के बीच उसका बटुआ कहीं गिर गया। उस बटुए में उसकी वसूली के पैसे रखे हुए थे।
जब वह घर पहुंचा और बटुआ नहीं मिला, तो वह बहुत परेशान हो गया। उसने अपने नौकरों को भेजकर हर जगह खोजबीन करवाई, लेकिन बटुआ कहीं नहीं मिला।
अगले दिन साहूकार ने पूरे गांव में यह घोषणा करवा दी कि जिस किसी को उसका बटुआ मिले और वह उसे लौटा दे, उसे वह 100 रुपये इनाम देगा।
ईमानदार किसान को मिला बटुआ
उसी गांव में हरिदास नाम का एक गरीब किसान रहता था। वह बहुत मेहनती, ईमानदार और सीधा-साधा इंसान था। एक दिन जब वह खेत से घर लौट रहा था, तो उसे रास्ते में वही बटुआ पड़ा मिला।
हरिदास ने बटुआ उठाकर देखा। उसमें पूरे 1000 रुपये थे। उसके लिए यह रकम बहुत बड़ी थी। वह कुछ देर के लिए सोच में पड़ गया कि अगर वह यह पैसे रख ले, तो उसकी गरीबी दूर हो सकती है।
लेकिन फिर उसने खुद से कहा, “यह पैसे मेरे नहीं हैं। अगर मैं इन्हें रख लूं, तो मुझमें और साहूकार में क्या फर्क रह जाएगा?
ईमानदारी की परीक्षा
हरिदास बिना देर किए साहूकार के घर पहुंचा और बटुआ उसे लौटा दिया। साहूकार ने जल्दी-जल्दी पैसे गिनने शुरू किए। बटुए में पूरे 1000 रुपये थे।
लेकिन अब साहूकार के मन में लालच आ गया। उसने इनाम देने से बचने के लिए चाल चली और गुस्से में बोला, “तूने इनाम के 100 रुपये पहले ही निकाल लिए हैं। मेरे बटुए में 1100 रुपये थे।”
यह सुनकर हरिदास हैरान रह गया। उसने साफ शब्दों में कहा कि उसने बटुए से एक भी रुपया नहीं निकाला है। बात बढ़ने लगी, तो हरिदास ने सुझाव दिया कि दोनों गांव के सरपंच के पास चलें।
सरपंच का न्याय
गांव के सरपंच बहुत समझदार और न्यायप्रिय थे। संयोग से गांव के शिक्षक भी वहां मौजूद थे। उन्होंने दोनों की बात ध्यान से सुनी।
सरपंच ने साहूकार से पूछा, “क्या आपको पूरा यकीन है कि आपके बटुए में 1100 रुपये थे?”
साहूकार ने तुरंत हां कह दी।
तब सरपंच और शिक्षक ने आपस में थोड़ी बातचीत की और फिर बोले, “अगर आपके बटुए में 1100 रुपये थे और इसमें केवल 1000 रुपये हैं, तो यह बटुआ आपका नहीं हो सकता।”
सरपंच ने फैसला सुनाया कि जब तक असली बटुआ नहीं मिलता, यह बटुआ हरिदास के पास ही रहेगा।
कहानी की सीख
गांव वालों के सामने साहूकार की चालाकी उजागर हो गई। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वहीं हरिदास अपने घर लौट गया, न केवल पैसों के साथ, बल्कि ईमानदारी की सबसे बड़ी जीत के साथ।
