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Tag: Supreme Court CJI BR Gavai ने कौन सा फैसला बदला

  • Solar System का सबसे ऊँचा पहाड | Highest Mountain in the Solar System | Mars Planet Highest Mountain

    मंगल ग्रह एक ऐसा प्लेनेट है जो कभी पृथ्वी की तरह ही हैबिटेबल प्लेनेट हुआ करता होगा और इंसानों की तरह ही मंगल ग्रह पर लोग रहा करते होंगे ऐसा इस ग्रह पर मिले कुछ जगहों के आधार पर कहा जाता है ऐसा ही इस ग्रह पर

    एक वोल्केनो माउंटेन मौजूद है जो आखिरी बार 25 मिलियन साल पहले फूटा था इस पहाड़ की ऊंचाई करीब 22 किमी है जो माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई से लगभग ढाई गुना ज्यादा है और यह पूरे सोलर सिस्टम का सबसे ऊंचा पहाड़ है इस पहाड़ को सबसे पहले 19वीं में टेलिस्कोप के

    जरिए खोजा गया था और इसकी पहली तस्वीर को 1972 में नासा के मेनर नाइन स्पेस करप्ट ने खींची थी सोलर सिस्टम के इस सबसे ऊंचे ज्वालामुखी पहाड़ की ऊंचाई को मार्स ऑर्बिटर लेजर अल्टीमेट द्वारा मापा गया था इस पहाड़ का नाम ओलंपस मंस है

  • Supreme Court CJI BR Gavai ने कौन सा फैसला बदला, साथी जज नाराज हो गए? 

    आगामी 23 नवंबर को रिटायर हो रहे मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने सरकार के पक्ष में एक ऐसा फैसला दे दिया जिसके लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश को पलटना पड़ा। इस कारण उनके साथ जज असहमति भी दिखाते हुए नजर आए। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 16 मई के अपने उस ऐतिहासिक आदेश को वापस ले लिया जिसने देश भर में कई

    सार्वजनिक परियोजनाओं को कथित तौर पर ध्वस्तकरण के खतरे में डाल दिया। मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने दो एक के बहुमत से यह फैसला सुनाया। यह रिव्यू उस पुराने आदेश के खिलाफ थी जिसमें कहा गया था कि किसी भी निर्माण को जारी रखने या मंजूरी देने से

    पहले पर्यावरण अनुमति अनिवार्य है और पोस्ट फैक्टो क्लीयरेंस यानी निर्माण शुरू होने के बाद मिली मंजूरी को अवैध माना गया था। इस आदेश की वजह से देश भर में करीब ₹00 करोड़ की चल रही परियोजनाएं रुक गई थी। जिनमें ओडसा का एआईआईएमएस अस्पताल, ग्रीन फील्ड एयरपोर्ट और कई राष्ट्रीय महत्व के ढांचे शामिल हैं। बहुमत का फैसला

    सीजीआई गवाई और जस्टिस विनोद चंद्रन ने दिया। सीजीआई ने 84 पन्नों में लिखा कि 16 मई का आदेश व्यावहारिक रूप से लागू होने योग्य नहीं था। इसका असर देश के विकास पर प्रतिकूल पड़ता और बड़ी संख्या में सार्वजनिक ढांचे ढहाने पड़ जाते। मोहम्मद ने कहा कि पोस्ट फैक्टो क्लीयरेंस को पूरी तरह अवैध करार देना अत्यधिक कठोर था क्योंकि पर्यावरण को नुकसान का आकलन, क्षतिपूर्ति और

    सुधारात्मक उपायों का विकल्प भी मौजूद है। उनका मानना है कि ऐसे आदेश से राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में अनावश्यक अवरोध पैदा होते और सरकार के पास उन्हें नियमित करने का कोई विकल्प नहीं बचता। अदालत केंद्र के द्वारा पेश उस सूची पर भी गौर करती हुई नजर आई जिसमें बताया गया कि कई अहम परियोजनाएं सिर्फ इस आदेश की वजह से

    खतरे में थी। लेकिन सबसे बड़ी बात तब हुई जब जस्टिस उज्जवल भुया का मत असहमति का रहा। उन्होंने अपने 97 पन्नों का डिसेंटिंग जजमेंट लिखा और कहा कि यह फैसला पर्यावरण न्यायशास्त्र को पीछे धकेलने वाला कदम है। जस्टिस भूिया ने कहा कि प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल पर्यावरण कानून का आधार स्तंभ है। पहले सावधानी बाद में सुधार। उनके अनुसार पोस्ट फैक्टो क्लीयरेंस की अनुमति देने से

    सरकार को गलत प्रथाओं का बढ़ावा देने का लाइसेंस मिल जाता है और पर्यावरण को अकरणीय क्षति हो सकती है। उन्होंने बहुमत के फैसले को इनोसेंट एक्सप्रेशन ऑफ ओपिनियन कहा यानी ऐसा मत जिसने पर्यावरण संरक्षण के मूल सिद्धांतों को नजरअंदाज किया है। बेंच के तीसरे जज जस्टिस विनोद चंद्रन ने भी अलग से सहमति लिखी। उन्होंने कहा कि

    डिसेंट लोकतांत्रिक न्यायिक व्यवस्था की आत्मा है लेकिन कानूनी सिद्धांतों के दायरे में रहकर होना चाहिए। उनके अनुसार 16 मई का आदेश पर्यावरण संरक्षण की चिंता में तो था लेकिन उसने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत उपलब्ध वैधानिक व्यवस्थाओं और सरकार को मिली शक्तियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। उन्होंने रिव्यू को उचित, अनावश्यक और

    समायोजित बताया। इस फैसले के बाद देश भर में रुकी हुई परियोजनाओं को राहत मिल गई और सरकार अब कोस्ट फैक्टो क्लीयरेंस को उचित आकलन और सुधारात्मक उपायों के साथ जारी रख सकेगी। लेकिन जस्टिस भुया के कड़े डिसेंट ने यह भी साफ कर दिया कि आने वाले समय में पर्यावरण बनाम विकास की बहस और तीखी होने वाली है।