
दोस्तों रुपया डॉलर के आगे भीख मांग रहा है। अब $1 ₹90 के बराबर हो गया है। रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बनता जा रहा है। लेकिन सरकारी इकोसिस्टम आपको यह बताकर खुश करता है कि कोई बात नहीं। अरे पाकिस्तान भूखो मर रहा है। दोस्तों, अमेरिका का ₹1 हमारे ₹90 के बराबर हो गया है। यानी कि जो चीज अमेरिका के लोग ₹1 में खरीद लेंगे, वह हमें खरीदने के लिए ₹90 की जरूरत होगी।
इंटरनेशनलली आर्थिक मोर्चे पर भारत के लिए यह बेहद शर्म का विषय है। कभी नरेंद्र मोदी को यह शर्मनाक लगता था। नरेंद्र मोदी की बेचैनी गिरते रुपए के लिए देखने को मिलती थी। लेकिन आज की तारीख में प्रधानमंत्री को कोई फर्क नहीं पड़ता है। मोदी का यह पुराना बयान सुनिए जरा और समझिए कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार नहीं थी तब
प्रधानमंत्री रुपए की मजबूती के लिए कितने बेचैन हुआ करते थे। ऐसे नहीं होता मित्रों। मैं शासन में बैठा हूं। मुझे मालूम है इस प्रकार से रुपया इतनी तेजी से गिर नहीं सकता। अरे नेपाल का रुपया नहीं गिरता है। बांग्लादेश की करेंसी नहीं गिरती है। पाकिस्तान की करेंसी नहीं गिरती। श्रीलंका की करेंसी नहीं गिरती। क्या कारण है? हिंदुस्तान का रुपैया पतला होता जा रहा है। ये जवाब देना पड़ेगा आपको। देश आपसे जवाब मांग रहा है।
रुपए को लकवा मार गया है। प्रधानमंत्री पिछले 11 साल से सत्ता में हैं। लेकिन अब प्रधानमंत्री के मुंह से रुपए का राह नहीं निकलता है। अरे रुपया जाए चूल्हे भाड़ में। ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री है ही नहीं। प्रधानमंत्री और उनकी प्रचार मशीनरी पूरे देश में ये भ्रम फैलाती है कि उनका पूरी दुनिया में डंका बज रहा है। भारत तो विश्व गुरु बन चुका है। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। आपको बड़ी आसान भाषा में समझाती हूं कि डंका बजना होता क्या है? देखिए दोस्तों आपका आपके नाते रिश्तेदारों में भौकाल कब बनता है? जब आप
मजबूत होते हैं। अब वो मजबूती कैसे आती है? कैसे दिखती है कि आप मजबूत हैं? आपकी मजबूती पैसों से दिखाई देती है। अच्छा घर होता है, अच्छी गाड़ी होती है। रिश्तेदारों की मदद के लिए आपके पास पैसा होता है। तो बाकी के जो रिश्तेदार होते हैं, वह भी आपका लोड लेने लग जाते हैं। रुपया और डॉलर का कोई मुकाबला ही नहीं है। आपकी गरीबी रुपए की कीमत से ही दिखाई देती है और आप कहते हैं कि दुनिया में आपका डंका बज रहा है और सबसे बड़ी बेशर्मी की बात यह है दोस्तों कि रुपए की सेहत ठीक कैसे की जाए इसका कोई
प्लान भी आपके पास नहीं है। वित्त मंत्री मैडम तो ऐसी है जो प्याज महंगा होने पर कह देती हैं कि वह प्याज खाती ही नहीं है। भाई रुपए की इस दुर्दशा पर वह कह सकती हैं कि वह रुपया खर्च करती ही नहीं है। वो तो Google Pay से पेमेंट करती हैं। दोस्तों देश में बादलों में रडार छिपाने से रुपया मजबूत होता। आधी झूठी आधी सच्ची आधी अध कचरी बातें करने से रुपया मजबूत होता। तो प्रधानमंत्री के बस की बात लगती। लेकिन जो प्रधानमंत्री खुद को अनपढ़ बताते हैं वो कैसे रुपया को मजबूत कर पाएंगे? देश को प्रधानमंत्री से
आर्थिक स्तर पर कोई उम्मीद नहीं है। अब कोई कंपनी भी नहीं बची है जिसे बेच के भाई रुपयों को मजबूत किया जा सके। आप प्रज्ञा का पन्ना देख रहे हैं तो यहां पर आपको कम समय में डिटेल एनालिसिस मिलता है और इसीलिए आप प्रज्ञा का पन्ना देखने के लिए आते हैं। आप अपना समय हमको देते हैं। तो अब सवाल ये उठता है दोस्तों कि भारतीय रुपया आखिर गिर क्यों रहा है? उसके कारणों को भी समझ लिया जाए। क्या रुपया नरेंद्र मोदी के हाकने की आदतों से गिर रहा है या कारण
कुछ और है? तो चलिए उसी पर बात कर लेते हैं। दोस्तों रुपया गिरने का कारण यह है कि विदेशी निवेशक जिन्होंने भारतीय बाजारों में पैसा लगा रखा है उनको भारतीय बाजारों पर यकीन नहीं रहा। अब वो इसीलिए अपना पैसा भारतीय बाजारों से निकालकर भाग रहे हैं। भारत से पैसा निकालकर वो दूसरी मार्केट में डाल रहे हैं जिससे डॉलर की मांग बढ़ रही है। दोस्तों केवल इसी साल अक्टूबर 2025 में 1.14 लाख करोड़ और नवंबर में 45,974 करोड़ का नेट आउट फ्ल्लो हुआ है। इसका
कारण अमेरिका, कनाडा जैसे देशों से भारत की कबाड़ा हो चुकी विदेश नीति बताई जा रही है। इकोनॉमिक्स की भाषा में अगर समझें तो अमेरिका भारत व्यापार संबंधों में अनिश्चितता और वैश्विक जोखिम की भावना ने निवेशकों का विश्वास कम कर दिया है। भारत का व्यापार घाटा बढ़ा है। अमेरिकी सरकार ने अगस्त 2025 से भारत से आयातित वस्तुओं पर 50% का टेरिफ लगाया जिसने भारतीय निर्यात को कम कर दिया। इससे व्यापार घाटा बढ़ा और मुद्रा बाजार में अनिश्चितता
पैदा हो गई। लेकिन भारत की सरकार चलाने वालों को इससे कोई लेना देना नहीं है। भारत की सरकार चलाने वालों को देश चलाने से ज्यादा पार्टी चलाने की चिंता है। पिछले दिनों जब भारत ने अपना अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी 7.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर बताया तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने भारत की जीडीपी और नेशनल अकाउंट्स यानी आंकड़ों को सी रेटिंग देकर भारतीय
आंकड़ों की गुणवत्ता पर ही सवाल उठा दिए। 26 नवंबर को जारी एक रिपोर्ट में आईएमएफ ने भारत को सी ग्रेड दिया। हैरानी यह भी है दोस्तों कि 8.2% की विकास दर का आंकड़ा आने के बाद भी शेयर बाजार में वह गर्मजशी नहीं दिखाई दी जिसकी उम्मीद की जा रही थी। 2025 से 26 में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 6.19% गिर चुका है। जबकि पिछले 1 महीने में ही यह गिरावट 1.35% की रही है। हाल के दिनों में रुपए में डॉलर के मुकाबले सबसे तेज गिरावट आई है। इस
लिहाज से रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बन गया है। रुपया का कमजोर होना दर्शा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की साख कमजोर हो रही है। लेकिन भारत के प्रधानमंत्री के सिर से बिहार की जीत की खुमारी उतर ही नहीं रही है। देखिए इस वीडियो में मेरे साथ फिलहाल इतना ही। मुझे दीजिए इजाजत। लेकिन प्रधानमंत्री को सुनते जाइए। शीतकालीन सत्र से पहले वह देश को संबोधित कर रहे
थे और विपक्ष को बिहार हार के बाद वह चिढ़ा रहे थे। उनको देश की आर्थिक स्थिति, देश की आर्थिक चुनौतियों से कोई फर्क नहीं पड़ता। उनको बिहार जीत से फर्क पड़ता है। कुछ लोग कहते हैं कि देश की गिरती आर्थिक साख से नहीं उनको दो लोगों की आर्थिक मजबूती की चिंता रहती है। केवल एक बार चिंतन करना चाहिए कि पिछले 10 साल से ये जो खेल खेल रहे हैं देश स्वीकार नहीं कर रही है इन पद्धतियों को। तो अब थोड़ा बदले अपनी रणनीति बदले। मैं टिप्स देने के लिए
तैयार हूं। उनको कैसे परफॉर्म करना चाहिए? लेकिन कम से कम सांसदों के हकों पर तरा मत लगाइए। सांसदों को अभिव्यक्ति का अवसर दीजिए। अपनी निराशा और अपने पराजय में सांसदों को बलि मत बनाइए। मैं आशा करता हूं कि इन जिम्मेवारियों के साथ हम सब चले
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