एक गांव में बूढ़ी दादी और बिल्ली रहता था दोनों का घर एक जगह था यानी पड़ोसी ही था दोनों अपने अपने घर खाना बना रही थी लेकिन बिल्ली के घर में कुछ नहीं था वे सोचा बिल्ली ने क्यों नही पड़ोसी दादी के घर से सारा सामान लेलू
वे दिमाग लगाया और बिल्ली दादी के घर गया और दादी अभी बर्तन मज रहा था बिल्ली ने दादी से कहा दादी थोड़ा माचिस दो दादी बोली क्यों चूल्हा जलाना है दादी बोला ताखा में उठालो माचिस उठाने के बाद बिल्ली ने दादी के घर लौका देखा बिल्ली ने दादी से लौकी मांगा दादी बोली लेजाओगे कैसे गुरका_गुरका के दादी बोली लेजा
फिर दादी बोली बनाओगे कैसे बिल्ली बोला चाकू से कच कच फिर दादी बोली निनोहगे कैसे बिल्ली बोला कराही में डब डब दादी बोली खाओगे कैसे बिली बोली प्लेट मे धकर ग़ब_ग़ब दादी बोली सोओगे कहा बिली बोली चूली के पिछे
दादी बोली ओढ़ोगे क्या बिली बोली सूप देख बिलाई के रूप, दोस्तो कहानी गया बन में आप सोचिए अपने मन में। कहानी से क्या सिख मिला कॉमेंट में बताए और दोस्तो के पास जरूर शेयर कीजिएगा।
भारत के एक हरेभरे गांव में रमेश नाम का किसान रहता था। रमेश मेहनती था, ईमानदार था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी। वह हमेशा पुराने तरीकों से ही खेती करता था। उसके पिताजी ने जिस तरह हल चलाया था, जिस तरह बीज बोए थे, रमेश आज भी वही
तरीके अपनाता था। हर दिन वह सुबह सूरज उगने से पहले अपने खेतों में पहुंच जाता। बैलों से हल चलाता, हाथ से बीज बोता और पूरे दिन पसीना बहाता। लेकिन असली समस्या यह थी कि दुनिया अब बदल चुकी थी। उसके आसपास के किसान नई टेक्नोलॉजी का
इस्तेमाल कर रहे थे। ट्रैक्टर, मोटर, ड्रिप इरीगेशन, अच्छी क्वालिटी के बीज। उससे उनकी फसलें भी ज्यादा होती, मेहनत भी कम लगती और आमदनी भी अच्छी होती। रमेश यह सब देखकर भी अनदेखा कर देता। वो कहता, “मेरे पिताजी ने यही तरीके अपनाए थे। मैं भी इन्हें ही अपनाऊंगा। मशीन पर भरोसा करके किसानी का असली मजा नहीं आता। उस गांव के और किसान धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।
लेकिन रमेश उसी जगह अटका हुआ था। उसकी हालत ऐसी हो गई थी कि परिवार का गुजारा भी मुश्किल होने लगा। एक दिन गांव में एक नौजवान आया। उसका नाम अर्जुन था। वो शहर से पढ़ाई करके लौटा था। अर्जुन ने देखा कि रमेश अब भी बैलों से ही हल चला रहा है। अर्जुन ने मुस्कुरा कर कहा, “अरे चाचा, आप भी पुराने तरीकों से ही किसाने कर रहे हो।”
क्यों ना आप एक ट्रैक्टर किराए पर ले लें। इससे आपका समय भी बचेगा और आपकी पैदावार भी बढ़ेगी। रमेश ने हंसते हुए कहा, “अरे बेटा, यह सब दिखावा है। असली किसानी तो पसीना बहाने से होती है। मशीनों में वह आत्मा कहां जो किसान अपने हाथ से काम करने में लाता है।” अर्जुन ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसने मन बना लिया कि रमेश को समय के साथ आगे
बढ़ना जरूर सिखाएगा। अगले दिन अर्जुन ने रमेश को अपने घर बुलाया और फिर उन्हें खेतों पर ले गया। वहां उसने रमेश को दिखाया कि कैसे सिर्फ 2 घंटे में ट्रैक्टर से पूरा खेत जोत दिया जाता है जो रमेश अकेले अपने बैल से 2 दिन में करता। उसने दिखाया कि नई तकनीक की मदद से पानी की बर्बादी नहीं होती और अच्छी क्वालिटी की फसल भी मिलती है। रमेश हैरान रह गया। उसे लगा कि सचमुच मेहनत तो
वही है लेकिन नतीजा कितना अलग है। अर्जुन ने समझाया चाचा समय बदल गया है। बदलते वक्त के साथ हमें भी बदलना पड़ता है। वरना हम पीछे रह जाते हैं। मेहनत जरूरी है लेकिन अकल और मेहनत को मिलाना भी जरूरी है। रमेश को पहली बार महसूस हुआ कि उसकी ज़िद ही उसे गरीबी की तरफ धकेल रही थी। आखिरकार रमेश ने अपनी सोच बदली। उसने पहली बार ट्रैक्टर किराया पर लिया। अच्छी
क्वालिटी के बीज भी खरीदे और नई सिंचाई तकनीक अपनाई। नतीजा यह हुआ कि उसकी फसल और दो गुना बढ़ गई। उसका परिवार भी खुशहाल था। गांव वाले हैरान थे कि रमेश जैसे जिद्दी किसान ने आखिरकार किस तरह बदलाव को अपना लिया। रमेश अब हर किसी से कहता मेरे दोस्तों मेहनत करो लेकिन समय के साथ बदलो। अगर हम अब भी पुराने तरीकों से ही चिपके रहेंगे तो जिंदगी आसान नहीं
होगी। बदलाव ही जीवन का नियम है। उस दिन से रमेश की सोच बदल गई। वो गांव के और किसानों को भी समझाने लगा। समय के साथ आगे बढ़ना सीखो। यही असली सफलता है। दोस्तों, समय के साथ आगे बढ़ो। तभी हमारा जीवन आसान और सफल बनता है। जो समय के साथ बदलता है वही आगे बढ़ता है। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
यह कहानी एक ऐसी औरत की है जिसे पति से झगड़ा होने पर तलाक लेना पड़ा। एक बच्चे की जिम्मेदारी उसके सर पर थी और उसकी जेब खाली थी। किताब लिखी लेकिन कोई उसे पब्लिश करने को तैयार ना हुआ। दर-दर
भटकती रही। कई बार आत्महत्या का ख्याल आया लेकिन उसने हार नहीं मानी। जब उसकी लिखी किताब रिलीज हुई तो सफलता ने उसके कदम चूमे। आइए जानते हैं कहानी जहाना की। यह कहानी है इंग्लैंड में जन्मी एक लड़की ज्वाना की। जोना को बचपन से ही लिखने पढ़ने का शौक था। वह बचपन में अपनी बहन को कहानियां लिखकर सुनाया करती थी।
जोना जब 15 साल की थी तब एक दिन उसकी आंटी ने उसे जेसिका मिडफोर्ड की एक किताब लाकर दी। जिस किताब का नाम था हॉल्स एंड रिबल्स। उस बुक को पढ़ने के बाद जहाना जैसे पागल हो गई और उन्होंने लेखन को ही अपना भविष्य मान लिया। 1982 में जहाना ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एंट्रेंस के लिए एग्जाम दिया। जोाना का सपना था कि वह ऑक्सफोर्ड में पढ़े लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर
था। वहां उनका सिलेक्शन नहीं हो पाया। जोना के लिए यह एक बड़ा झटका था जिसके बाद मजबूरन उन्हें एक्स्ट्रा यूनिवर्सिटी में पढ़ना पड़ा। यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कंप्लीट होने के बाद उन्होंने किसी कंपनी में सेक्रेटरी के तौर पर काम किया। फिर आगे जाकर वो मैनचेस्टर में रहकर काम करने लगी। एक दिन जब वह मैनचेस्टर से लंदन आने के लिए ट्रेन में सफर कर रही थी तो उनके मन में जादूगरी के स्कूल में पढ़ने वाले एक यंग बॉय की कहानी आई जिसे उन्होंने अपने मन में पूरी तरह से पढ़ लिया था और जैसे ही वह लंदन अपने कैंपस पहुंची तो उन्होंने उसी वक्त लिखना शुरू कर दिया। जोना को
लगा कि शायद यह कहानी उनकी जिंदगी बदल देगी। लेकिन वो इस बात से अनजान थी कि बुरे हालात उनका इंतजार कर रहे हैं। लंदन आने के कुछ ही दिनों बाद उनकी मां की मृत्यु हो गई। जोाना की मां उसकी सबसे करीबी थी। जोना इस सदमे से कई महीनों तक नहीं निकल पाई और इस घटना का असर जोाना के लेखन पर भी पड़ा। जोना बहुत दुखी सी रहने लगी लेकिन उन्होंने अपने गम को भुलाने के लिए भी लिखने का ही सहारा लिया और अपना पूरा समय लिखने में बिताने लगी। कुछ समय बाद वह जॉब की तलाश में पुर्तगाल चली गई। जहां पर उनकी मुलाकात जॉर्ज से हुई। उन दोनों के विचार आपस में काफी मिलते जुलते थे और
इसीलिए उन्होंने 1992 में शादी कर ली। लेकिन किस्मत ने उनके लिए अभी और गम लिख रखे थे। एक साल बाद यानी 1993 में उनकी बेटी पैदा हुई जिसका नाम उन्होंने जेसिका रखा और उसी साल घरेलू हिंसा से परेशान होकर ज्वाना ने तलाक ले लिया। इसके बाद ज्वाना अपनी बच्ची के साथ स्कॉटलैंड रहने चली गई। यह समय जवाना के लिए सबसे मुश्किल था। उनकी शादी नाकामयाब हो चुकी थी। एक बच्चे की जिम्मेदारी भी उन्हीं के ऊपर थी और उनके पास कोई काम नहीं था। इसलिए वह डिप्रेशन में रहने लगी। कई बार उन्हें आत्महत्या का ख्याल आता। हालांकि इन सभी परेशानियों को झेलते हुए भी उन्होंने कभी लिखना बंद नहीं
किया और आखिरकार 1995 में उन्होंने अपनी फर्स्ट बुक पूरी की। किताब पूरी होने के बाद जुआना को लगा कि शायद अब उनकी जिंदगी बदल जाएगी। लेकिन यहां भी उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी और एक के बाद एक लगातार कई पब्लिशिंग हाउसेस ने उनकी किताब को पब्लिश करने से मना कर दिया। जोना की उम्मीद अब टूटती नजर आ रही थी। एक साल तक भटकने के बाद लंदन के एक एडिटर ने आखिरकार उस किताब को पब्लिश करने के लिए हामी भरी। लेकिन उस एडिटर
को लगता था कि यह बुक नाकामयाब होगी। इसलिए उन्होंने जहाना को जॉब की सलाह दी। 2 साल इंतजार करने के बाद 1997 में जहााना की किताब को पब्लिश किया गया और उसके बाद तो मानो सब कुछ उल्टा हो गया। इस बुक को लोगों ने इतना पसंद किया कि 5 महीने के अंदर इस बुक को ब्रिटिश बुक ऑफ द ईयर का अवार्ड दिया गया। वो बुक थी मशहूर हैरीपॉटर सीरीज की फर्स्ट बुक हैरीपॉटर एंड द फिलॉसफर स्टोन। इस बुक का सीक्वल 2 जुलाई 1998 को रिलीज़ किया गया और फिर एक के बाद एक यह किताब आगे बढ़ती चली
गई। हैरीपॉटर के चौथे नवेल को इतनी सफलता मिली कि इसने उस समय के हर रिकॉर्ड को तोड़ दिया। 380 कॉपियां यूके में एक ही दिन में बिक गई। 2001 में जहाना ने दूसरी शादी की और फिर 2 साल बाद उनका बेटा डेविड पैदा हुआ। उसी साल हैरीपॉटर की पांचवी नवेल पब्लिश की गई और फिर उसके अगले साल रोलिंग किताबें लिखकर अरबपति बनने वाली पहली लेखक बन गई। 2007 में रिलीज हुए हैरीपॉटर के अंतिम हिस्से को इतनी सफलता मिली कि इसे बेस्ट सेलिंग बुक ऑफ द वर्ल्ड टाइम बना दिया गया। यूके और यूएस में
रिलीज होने के एक ही दिन में इसकी 11 मिलियन से ज्यादा कॉपियां बिक गई। दोस्तों जवाना का नाम जेके रोलिंग है जिसने ऐसे हालातों में रहकर हैरीपॉटर जैसी नवेल को जन्म दिया। इतनी मुश्किलों से लड़कर आज यह मुकाम हासिल किया। आज रोलिंग दुनिया की सबसे अमीर राइटर्स में से एक और हैरीपॉटर को 20वीं सदी की सबसे मशहूर नवेल माना जाता है। इस बुक सीरीज ने दुनिया में किताब को मिलने वाला लगभग हर अवार्ड जीता है। जिंदगी में ऐसा कई बार होता है जब हमें लगता है कि अब हमें हार मान लेनी चाहिए। लेकिन
उसी वक्त अगर हम अपने मन को समझाकर कोशिश करना ना छोड़ें तो हम इतिहास लिख सकते हैं। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह दूसरी कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
Sabse pahle Chhath kisne kiya tha // Chhath Puja par nibandh // छठ पूजा का इतिहास क्या है? // बिहार में छठ पूजा क्यों मनाया जाता है // सबसे पहले छठ पूजा किसने किया था
सबसे पहले छठ पूजा किसने की, इसके बारे में कई मान्यताएं हैं, लेकिन सबसे प्रचलित धारणाओं में माता सीता और कर्ण का उल्लेख है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम के वनवास से लौटने के बाद रावण-वध के पाप से मुक्त होने के लिए माता सीता ने छठ का व्रत किया था। वहीं, महाभारत काल के अनुसार सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की थी और वे सबसे पहले छठ का व्रत करने वाले माने जाते हैं।
माता सीता
रामायण के अनुसार, जब भगवान राम 14 साल के वनवास से लौटे, तो ऋषि-मुनियों के कहने पर रावण-वध के पाप से मुक्ति पाने के लिए माता सीता ने कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना की थी।
उन्होंने सरयू नदी के तट पर रहकर छठ व्रत का संकल्प लिया और सूर्यदेव को अर्घ्य दिया, जिसके बाद उन्हें सुख और समृद्धि का आशीर्वाद मिला।
मान्यता है कि माता सीता ने जहाँ यह पूजा की थी, वहाँ आज भी उनके पदचिह्न मौजूद हैं।
कर्ण
महाभारत काल की एक अन्य मान्यता के अनुसार, सूर्य के परम भक्त और सूर्यपुत्र कर्ण ने सबसे पहले छठ पूजा की शुरुआत की थी।
कहा जाता है कि कर्ण रोज घंटों तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे और उनकी कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे।
अन्य मान्यताएं
कुछ मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले राजा प्रियव्रत के पुत्र के जीवन को बचाने के लिए षष्ठी देवी (छठी मैया) की पूजा की गई थी, और उन्हीं की आज्ञा का पालन करते हुए राजा प्रियव्रत ने पहला व्रत रखा था।
साल था 1938 यह कहानी है कैरली नाम के एक आदमी की। कैरली हंगरियन आर्मी में एक अच्छा सैनिक था। लेकिन उसकी पहचान सिर्फ एक सैनिक के रूप में नहीं थी। वो उस देश का सबसे अच्छा शूटर था। उसने अपने देश की हर नेशनल चैंपियनशिप जीत रखी थी। लोगों को
पूरा यकीन था कि आने वाले ओलंपिक में गोल्ड मेडल सिर्फ और सिर्फ कैरली को ही मिलेगा। कैरली का सपना साफ था। मुझे अपने हाथ को दुनिया का सबसे अच्छा शूटिंग हैंड बनाना है। दिन रात बस यही मंदिर था और बेहतर बनाना है हर दिन हर पल। और वो बन चुका था दुनिया का सबसे अच्छा निशाने लगाने वाला शूटर।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 1938 में एक दिन आर्मी ट्रेनिंग कैंप के दौरान एक हादसा हुआ। कैरली के हाथ में एक हैंड ग्रेनेड ब्लास्ट हो गया और उसी हाथ में ब्लास्ट हुआ जिससे वह गोल्ड मेडल जीतने वाला था। उसका दाया हाथ जो उसका सपना था, उसकी
पहचान थी, अब वह नहीं रहा। सोचिए एक ही पल में सब कुछ बर्बाद हो गया। सालों की मेहनत, उसका सपना, उसकी उम्मीद सब मिट्टी में मिल गया। कई लोग सोचते कि अब उसकी जिंदगी खत्म हो गई कि अब वो आदमी टूट गया होगा। लेकिन जो कैरली ने किया वो इतिहास बन गया। उसने उस हाथ पर फोकस
नहीं किया जो चला गया था। बल्कि उस पर फोकस किया जो अब भी उसके पास था। उसका लेफ्ट हैंड वो हाथ जिससे वह लिख भी नहीं सकता था जिससे उसे कुछ भी काम करने की आदत नहीं थी लेकिन उसने मन बना लिया था। अगर दाया हाथ चला गया तो क्या हुआ? अब मैं अपने लेफ्ट हैंड को दुनिया का सबसे अच्छा शूटिंग हैंड बनाऊंगा। एक महीने तक हॉस्पिटल में इलाज चलता रहा। लेकिन जैसे ही वह ठीक हुआ उसने एक भी दिन गवाए बिना फिर से ट्रेनिंग शुरू कर दी। हर दिन हर पल वो
अपने लेफ्ट हैंड से निशाना लगाने की प्रैक्टिस करता रहा। 1939 में जब नेशनल चैंपियनशिप हुई तो सारे शूटर वहां पहुंचे। सबने देखा कि वहां कैरली भी है। तो हर किसी को लगा कि वो सिर्फ देखने आया होगा। शायद अपने पुराने साथियों को सपोर्ट करने और उन्होंने कैरली से कहा कैरली तुम एक अच्छे इंसान हो। इतना सब होने के बाद भी तुम यहां हमें हौसला देने आए हो। यह बहुत बड़ी बात है। लेकिन वो मुस्कुराया और बोला, “मैं यहां तुम्हारा हौसला बढ़ाने नहीं आया हूं। मैं यहां तुम्हारे साथ
मुकाबला करने आया हूं। सभी हैरान रह गए। उस देश के बाकी खिलाड़ी अपने बेस्ट हैंड से खेल रहे थे। लेकिन सिर्फ अकेला कैरली अपने ओनली हैंड से खेल रहा था। लेकिन जब नतीजे आए तो जीत उसी की हुई लेफ्ट हैंड वाले कैरली की। हर कोई हैरान हुआ। लेकिन कैरली यहीं नहीं रुका। अब उसका लक्ष्य था 1940 के ओलंपिक। लेकिन उसी वक्त सेकंड वर्ल्ड वॉर हो गई और ओलंपिक रद्द कर दिए गए। उसने हार नहीं मानी और इंतजार किया। अब उसका
लक्ष्य था 4 साल बाद होने वाले ओलंपिक। दिन रात वो मेहनत करता रहा। हर दिन प्रैक्टिस करता रहा। लेकिन जब ओलंपिक का समय आया तो वह भी कैंसिल हो गए। सब लोगों ने कैरली से कहा कि अब तुम्हारी उम्र बीत चुकी है। अब तुम यह सपना यहीं छोड़ दो। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने अपना सारा ध्यान 1948 के ओलंपिक पर केंद्रित किया। अब वो 38 का हो चुका था। युवा शूटरों के बीच मुकाबला करना मुश्किल था। लेकिन कैरली की डिक्शनरी में मुश्किल शब्द तो है ही नहीं।
1948 के लंदन ओलंपिक में दुनिया के सबसे अच्छे शूटर अपने बेस्ट हैंड से खेल रहे थे और वो कैरली सिर्फ अपने एक हाथ से और जब नतीजा आया तो गोल्ड मेडल गया कैरली को। उसका सपना आज पूरा हो चुका था। लेकिन वो यहीं नहीं रुका। अगली बार होने वाले 1952 के ओलंपिक में उसने दोबारा हिस्सा लिया और वहां क्या हुआ? फिर से जीत हुई कैरली की। उसने एक और गोल्ड मेडल जीता और इतिहास में पहला व्यक्ति बना जिसने लगातार दो
ओलंपिक गोल्ड मेडल जीते। वो भी एक हाथ से शूटिंग करके। हर हारने वाला व्यक्ति अपनी असफलता की एक लंबी लिस्ट बनाता है। मैं इसलिए नहीं कर पाया। मेरे पास यह नहीं था या वक्त नहीं था। लेकिन हर जीतने वाले के पास सिर्फ एक वजह होती है। मुझे करना है। कैरली की कहानी से हम सीख सकते हैं कि बहाने बंद करो और एक्शन शुरू करो। क्योंकि
अगर एक आदमी एक हाथ के बिना दुनिया का बेस्ट शूटर बन सकता है तो तुम्हें रोकने वाला कोई नहीं है सिवाय तुम्हारे खुद के। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह दूसरी कहानी भी सुननी चाहिए।
अगर आप अपनी जिंदगी में कुछ हासिल करना चाहते हैं तो एक चीज है जो जरूर आपको अपने अंदर पैदा करनी होगी और वह है आत्मविश्वास। आत्मविश्वास से भरा इंसान वो सब कुछ कर दिखाता है जो किसी और इंसान के लिए असंभव होता है। आइए एक अच्छी
कहानी के माध्यम से आत्मविश्वास की अद्भुत शक्ति को पहचानते हैं। यह कहानी है दो छोटे बच्चों की जो एक मामूली से गांव में रहते थे। एक बच्चा था 11 साल का और दूसरा था सिर्फ 8 साल का। दोनों एक दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त थे। ऐसा कहा जाता था जैसे वह दोनों दो शरीर में एक जान हो। दोनों हर वक्त एक साथ रहते साथ खेलते, साथ खाना खाते और साथ
ही हंसते। कभी-कभी तो लगता जैसे दोनों एक ही मां की दो संताने हो। लेकिन वो दोनों दोस्त यह नहीं जानते थे कि उनके साथ क्या होने वाला है। एक दिन वो दोनों खेलतेखेलते गांव से कुछ दूर निकल गए। दोपहर का वक्त था। सूरज सिर पर था। खेलतेखेलते वह दोनों बच्चे गांव के पुराने कुएं के पास पहुंच गए। कुआं बहुत ही पुराना था लेकिन वह ज्यादा गहरा नहीं था।
खेलतेखेलते अचानक एक हादसा हो गया। वो बड़ा बच्चा जो 11 साल का था फिसल गया और सीधा कुएं में गिर पड़ा। वो घबराकर जोर-जोर से चिल्लाने लगा क्योंकि उसे तैरना नहीं आता था। कुएं के पानी में हाथ-पांव मारते हुए वो डूबने लगा। अब वहां और कोई नहीं था। ना कोई बड़ा आदमी ना कोई मदद करने वाला। सिर्फ वो छोटा सात साल का बच्चा। उसने चारों तरफ देखा। किसी को आवाज दी पर कोई
जवाब नहीं मिला। फिर उसकी नजर पड़ी पास ही एक लोहे की बाल्टी पर जिसमें एक रस्सी बंधी हुई थी। उस सात साल के बच्चे ने एक भी सेकंड नहीं गवाया। वो भाग कर गया। उसने बाल्टी उठाई और उस बाल्टी को नीचे कुएं में फेंक दी और अपने दोस्त की तरफ कहा ले पकड़ जल्दी पकड़ ले। बड़ा बच्चा बाल्टी पकड़ लेता है। और अब शुरू होती है असली लड़ाई। 7 साल के बच्चे और असंभव के बीच वो छोटा
बच्चा पूरी शक्ति से बाल्टी को ऊपर खींचता है। उसके नन्हे हाथ दर्द से कांप रहे होते हैं। सांसे तेज चल रही होती है। लेकिन वो रुक नहीं रहा था। खींचता रहा खींचता रहा। इतनी देर के बाद आखिरकार उसने अपने दोस्त को कुएं से बाहर निकाल लिया। दोनों जमीन पर गिर पड़े। भीगे हुए लेकिन जिंदा। दोनों बच्चे गले लगकर रोने लगे। खुश भी थे और हल्का डर भी गए थे। उन्हें लगा अब तो घर जाकर बहुत डांट पड़ेगी।
लेकिन जब वह दोनों गांव लौटे और सबको बताया तो किसी ने विश्वास ही नहीं किया। लोगों ने कहा अरे कैसे हो सकता है? इतना छोटा सात साल का बच्चा और वो किसी को ऊपर खींच ले असंभव है। सभी को लगता था कि यह बच्चे कोई बहाना बना रहे हैं। उस वक्त गांव के सबसे समझदार और बूढ़े व्यक्ति थे रहीम चाचा। सब लोग उनके पास पहुंचे और बोले रहीम चाचा आप बताइए क्या यह सच हो सकता है? रहीम चाचा ने पूरी कहानी सुनी और दोनों बच्चों की तरफ मुस्कुरा कर देखा। फिर बोले बिल्कुल हो सकता है। गांव वाले हैरान रह गए और बोले लेकिन कैसे इस बच्चे में इतनी
ताकत आई कहां से? रहीम चाचा ने गहरी सांस ली और फिर बोले देखो सवाल यह नहीं है कि उसने यह कैसे किया? सवाल यह है कि उसने यह क्यों किया? सब हैरान रह गए। रहीम चाचा बोले उस वक्त वहां कोई नहीं था जो उसे यह कहे कि तू नहीं कर सकता। कोई नहीं था जो उसे डराए या रोक दे। यहां तक कि वह यह खुद भी नहीं सोच रहा था। उसको बस अपने दोस्त को बचाना था और उसने वही किया। रहीम चाचा आगे बोले जब इंसान के अंदर
आत्मविश्वास होता है तो वह कुछ भी कर सकता है। हमारी हदें बाहर के लोग नहीं बनाते हम अपने आप भी बनाते हैं। जिस दिन हम यह मान लेते हैं कि हम नहीं कर सकते उसी दिन हम हार जाते हैं। उस दिन उस बच्चे ने ना सिर्फ अपने दोस्त को बचाया बल्कि उस गांव को एक सबक भी सिखाया। अगर तुम अपने आप पर विश्वास रखते हो तो असंभव भी संभव बन जाता है।
रथ सुनकर हमको TV में दिखाए गए रथ ही दिमाग मे आते हैं जो पैसे बचाने के चक्कर मे बैलगाड़ी की तरह बना दिये जाते हैं।
मेरा अनुमान है कि रथ भी 2-3 तरह के होते होंगे
1. तेज गति से चलने वाले रथ जो एक यात्री के लिए बनते होंगे। ये आकार में छोटे होते थे। कोई सुख सुविधा नही होती थी। छोटी दूरी के लिए इस्तेमाल होते होंगे।
2. यात्री रथ- मान लीजिए द्रौपदी अपने मायके जा रही हो तो क्या वो पूरे समय पीछे खड़े रहती होगी जैसा TV में दिखाते हैं। कई दिनों की यात्रा होती थी तो कोई भी आराम पसन्द करेगा !! उनके लिए थोड़ा बड़ा रथ होता होगा जिसमें बैठने, सोने की जगह और खाने पीने का सामान भी रखा जाता होगा।
3. युद्ध रथ- ये रथ बहुत बड़ा नही रख सकते क्योंकि तेजी से भी चलने की ज़रूरत है। पर भारी मात्रा में तीर, गदा, भाले इत्यादि भी रखना पड़ेगा। बल्कि मुझे तो लगता है कि खास योद्धाओं के लिए
कुछ जड़ी-बूटी (फर्स्ट एड किट) या वैद्य को भी रथ में रखा जाता होगा। ये रथ इतने भी खुले नही होते थे जितना tv में दिखाते हैं, योद्धा जितना ढका रहे उतना अच्छा।
ट्रेनिंग या प्रशिक्षण क्या होता है? इसमें आप हर तरह की स्थितियों का अभ्यास करते है। सबसे बुरा क्या हो सकता है उसके लिए खुद को तैयार करते हैं। जैसे कमांडो ट्रेनिंग में सांप खाना तक सिखाते हैं, बिना हथियार के लड़ना सिखाते हैं।
क्या आपको लगता है कि अर्जुन, भीम, दुर्योधन, कर्ण, भीष्म जैसे योद्धाओं को जब युद्ध का प्रशिक्षण मिला होगा तब इनको बिना रथ के युद्ध करना नही सिखाया गया होगा? सारथि की मृत्यु होने पर खुद ही मुहँ से लगाम पकड़कर रथ चलाते हुए युद्ध करना भी सिखाते थे।
इसलिए मुझे तो कर्ण के बिना रथ के युद्ध करने को इतना महत्व देना ही बकवास लगता है।
जब घोष यात्रा में गन्धर्वो ने दुर्योधन को पकड़ लिया तो अर्जुन और भीम गंधर्वों को हराया था तब इनके पास कोई रथ नही थे, राम-लक्ष्मण ने लगभग पूरा युद्ध बिना रथ के लड़ा था जबकि रावण के हर योद्धा के पास रथ होते थे।
बिना रथ के लड़ना एक disadvantage ज़रूर है पर महारथी, अतिरथी ऐसे ही नही बनते थे। जब कर्ण ने बिना रथ के युद्ध कर रहे अभिमन्यु पर दया नही की तो उस पर क्यों दया की जाए ??
ये सब कर्ण प्रेमियों के मनगढ़ंत तर्क सामने आते रहते हैं जिसमे एक घटिया व्यक्ति को हीरो बनाने की कोशिश की जाती है। एक साहब तो शिवाजी सावंत को सच्चा और वेद व्यास को झूठा बता चुके हैं।
महाभारत में कुंती के चार पुत्र थेः कर्ण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव। हालाँकि, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन पांडु से उनके विवाह के बाद उनके पुत्र थे,
जबकि कर्ण का जन्म विवाह से पहले ही हो गया था और उन्हें छोड़ दिया गया था। नकुल और सहदेव कुंती की सौतेली माद्री के पुत्र थे, लेकिन कुंती ने उनकी भी देखभाल की थी।
कर्णः कुंती ने विवाह से पहले ऋषि दुर्वासा के मंत्र का उपयोग करके सूर्य देव को आमंत्रित किया और कर्ण को जन्म दिया।
युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनः ये कुंती के पति पांडु से उनके विवाह के बाद के पुत्र थे।
नकुल और सहदेवः ये माद्री के पुत्र थे, लेकिन कुंती ने उनकी भी परवरिश की थी।
नियम अनुसार कुंती के विवाह से पहले एक पुत्र थे, विवाह के बाद तीन पुत्र हुआ,
How man was invented, Manav ka janm kaise hua ( मानव का जीवन धरती पर कैसे हुआ )
एवोल्यूशन सिर्फ एक थ्योरी है या फैक्ट है? हमारे सबसे पुराने पूर्वज एक्चुअली में आए कहां से? नमस्कार मित्रों, आज से करीब 4 बिलियन साल पहले लाइफ की शुरुआत होती है धरती पर। बिलियंस ऑफ इयर्स एवोल्यूशन के बाद अनगिनत प्रकार के प्लांट्स और एनिमल स्पीशीज उभर कर आते हैं। ये सारे पेड़-पौधे, जानवर और जीव जो आप देखते हैं आज के दिन वो सब आए एववोल्यूशन के चलते। इनमें से एक स्पीशीज होती है होमोसेपियंस की भी यानी इंसान। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर इंसान बंदरों से आए तो आज के दिन भी हमें बंदर क्यों देखने को मिलते हैं? ये सारे बंदर
चिंपांजीज और गोरिल्लास ये सब इंसानों में इवॉल्व क्यों नहीं हो जाते? ऐसे सवाल अक्सर उठाए जाते हैं लोगों के द्वारा। कुछ लोग तो एवोल्यूशन को ही नकार देते हैं। कहते हैं ये झूठ है? आखिर कितनी सच्चाई है इस एवोल्यूशन की थ्योरी में। यह थ्योरी है या फैक्ट भी है? और कैसे ये अलग-अलग प्रकार के जीव इवॉल्व किए? आइए जानते हैं आज के इस वीडियो में। [संगीत] शुरुआत से ही दोस्तों सबसे बड़े मिसकसेप्शन को क्लियर कर देते हैं। एववोल्यूशन की थ्योरी कभी यह नहीं कहती कि बंदर इंसान बन गए बल्कि यह कहा जाता है कि सारे चिंपांजीस गोरिल्लास, बंदरों और
इंसानों के पूर्वज एक ही रहे हैं और वो पूर्वज आज के दिन जिंदा नहीं है। एववोल्यूशन को अगर आप विजुअलाइज करना चाहते हो तो एक पेड़ इमेजिन कीजिए। एक पेड़ की शुरुआत होती है सिर्फ एक स्टेम से। फिर ऊपर जाकर टहनियां बनती है। फिर उन टहनियों से और छोटी-छोटी टहनियां बनती हैं। ऐसे ही अगर आप आगे चलते रहे तो जो टिप आप देखेंगे इस पेड़ का एंड पॉइंट जो है वो आज के दिन सारे जिंदा जीव है। लेकिन एक सवाल तो आपके दिमाग में अभी-अभी आएगी कि जो हमारे पूर्वज थे इनमें से कुछ इंसान बने, कुछ चिंपांजी बने और कुछ बंदर बने। ऐसा क्यों हुआ? इसका जवाब वीडियो में आगे
आप समझेंगे। साल 1859 में चार्ल्स डार्विन ने अपनी एक ऐतिहासिक किताब लिखी थी ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज। इस किताब में उन्होंने थ्योरी ऑफ नेचुरल सेक्शन के बारे में बात करी थी। अब थ्योरी ऑफ़ नेचुरल सिलेक्शन सुनकर आपको लगेगा कि कोई बड़ी मिस्टिकल सी चीज होने लग रही है। सभी जीव में कोई इनर इंजीनियरिंग चलने लग रही है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। बड़ा सिंपल फंडा है। जब भी रिप्रोडक्शन होती है इंसानों में, जानवरों में, पेड़-पौधों में तो जींस जो है वो एक से दूसरे जिम में जाती है। हमारी जींस बच्चों में पास ऑन होती है और जब भी यह
होता है तो जींस में म्यूटेशन देखने को मिलती है। थोड़े बहुत बदलाव आ जाते हैं जींस में और कुछ वेरिएशंस देखने को मिलते हैं। जैसे कि फॉर एग्जांपल आपकी ब्राउन आंखें हैं और आपके बच्चों में ग्रीन आंखें देखने को मिलती है। इसका मतलब है कि अचानक से एक म्यूटेशन आ गई है उनके जींस में। आंखों को कलर देने वाली जींस में। हो सकता है आगे आने वाले बच्चों में भी ग्रीन आंखें देखने को मिले। अक्सर ये जो वेरिएशंस होती है इनमें से कुछ फायदेमंद होती है तो कुछ नुकसानदायक रहती है अपने एनवायरमेंट के चलते। तो कुछ सर्वाइव कर
पाते हैं। कुछ डायट हो जाती हैं। इसी प्रोसेस को कहा जाता है नेचुरल सेक्शन। फॉर एग्जांपल मान लो एक मेंढक है जो ब्राउन कलर का है। जंगल में रहता है। इसके पांच बच्चे हैं जिनमें से चार ब्राउन कलर के हैं और एक ग्रीन कलर का है। यह ग्रीन कलर का मेंढक बड़े अच्छे से डिसगाइस कर पाता है। अपने आप को कैमोफ्लाज कर पाता है ग्रीन कलर के पेड़-पौधों में। इसके चलते इसको एक एडवांटेज मिलता है। एक दिन एक सांप आकर ब्राउन कलर के मेंढकों को खा जाता है क्योंकि वह आसानी से दिख पाते हैं। लेकिन ये ग्रीन कलर का मेंढक दिख नहीं पाता पाता बच जाता है और आगे आने
वाली पीढ़ियां अब इसकी ग्रीन कलर की। कुछ इसी तरीके से मोटे-मोटे तौर पर थ्योरी ऑफ नेचुरल सिलेक्शन काम करता है। यहां पर एक टर्म को यूज़ किया जाता है सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट। कई मोटिवेशनल स्पीकर्स इस टर्म का मिसयूज करते हैं यह कहकर कि जो फिजिकली फिट लोग हैं, सिर्फ वही लोग सर्वाइव कर पाएंगे। लोग इमेजिन करते हैं कि जिसके बड़े-बड़े बाईसेप्स होंगे, ट्राइसेप्स होंगे, सिक्स पैक्स होंगे, उन्हीं लोगों का यहां पर सर्वाइवल देखने को मिलेगा। लेकिन यह कहना एक्चुअली में गलत होगा। चार्ल्स डार्विन के अकॉर्डिंग फिट का मतलब
है कि जो अपने आसपास के एनवायरमेंट में सबसे अच्छे से फिट बैठ पाए। अब आपने बेसिक समझ लिए है। आप समझते हैं कि एववोल्यूशन एक्चुअली में हुआ कैसे? एवोल्यूशन के ट्री में अगर आप टाइम में पीछे जाते रहे तो हर किसी में आपको एक कॉमन एनसेेस्टर देखने को मिलेगा। कई बिलियन साल आगे चले तो एक बड़ा खास किस्म का बैक्टीरिया उभर कर आता है एववोल्यूशन के चलते साइनोबक्टीरिया यह पहला ऐसा बैक्टीरिया होता है जो फोटोसिंथेसिस कर पाता है यानी धूप का इस्तेमाल करके एनर्जी जनरेट करना इसमें पानी को भी एक फ्यूल की तरह इस्तेमाल किया
जाता है और एंड प्रोडक्ट यहां पर निकलता है ऑक्सीजन जो सारी स्पीशीज आज के दिन एक्सिस्ट करती है ये सब एक इक्विलिब्रियम में एकिस्ट करती है। एक ऐसा इक्विलिब्रियम जहां हर कोई फिट बैठा है।
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