Sacrifice Struggle | The Woman Behind
His Rise | Bihar CM

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का नाम स्थायित्व और राजनीतिक दाव पेच का दूसरा नाम है और आज उन्होंने 10वीं बार बिहार का पदभार संभाला है। लेकिन नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर के पीछे एक ऐसी दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानी है जिसने उन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचाया। यह कहानी है उनकी पत्नी मंजू कुमारी सिन्हा की जिनका साथ उन्हें बहुत कम समय के लिए मिला था। अब
कैसे एक विद्रोही इंजीनियर ने दहेज लेने से साफ इंकार कर दिया और शादी के कार्ड तक बदलवा दिए और कैसे चुनाव हारने पर उनकी पत्नी ने अपनी ढाई साल की सैलरी उन्हें सौंप दी और क्यों शादी के बाद भी एक जाली ही उनके मिलन का जरिया बनी। आज हम आपको नीतीश कुमार की इस पूरी लव स्टोरी से जुड़ी हर इमोशनल मोड़ के बारे में बताएंगे। जिसने
उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। यह कहानी शुरू होती है 1967 में जब नीतीश कुमार पटना कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में दाखिला लेते हैं। पढ़ाई में तेज नीतीश को उनका परिवार इंजीनियर बनाना चाहता था। इंजीनियरिंग के आखिरी साल में परिवार ने नीतीश कुमार का रिश्ता पटना की मंजू कुमारी सिन्हा से तय कर दिया। लेकिन यह उनकी
लव स्टोरी में एक बड़ा मोड़ लाता है। नितीश के दोस्तों को जब पता चला कि मंजू भी पटना यूनिवर्सिटी में ही पढ़ती हैं तो वह उन्हें देखने के लिए सोशियोलॉजी विभाग तक पहुंच गए। नितीश के दोस्तों ने वहां शरारत की और मंजू को रोकने की कोशिश की जिससे मंजू शर्माकर वहां से भाग गई। दोस्त वापस आए और नितीश को बताया कि उन्होंने मंजू को पास कर दिया है। नितीश इस बात से बेहद खुश हुए।
लेकिन खास बात यह रही कि दोस्तों ने भले ही मंजू को देख लिया था लेकिन नितीश ने खुद उन्हें शादी के मंडप में ही पहली बार देखा था। शादी की तारीख तय हो गई कार्ड बट गए। लेकिन तभी नीतीश को पता चला कि तिलक में ₹22,000 लेनदेन की बात तय हुई है। नीतीश कुमार ने बहुत पहले ही दहेज ना लेने की कसम खाई थी। जब उन्हें तिलक में पैसे लेने की बात पता चली तो वह बहुत नाराज हुए। उन्होंने अपने
और मंजू के परिवार से साफ कह दिया कि वह तिलक या दहेज के नाम पर कोई भी पैसा नहीं लेंगे। नीतीश ने अपनी शादी के लिए जो दो शर्तें रखी थी। पहली सबसे जरूरी शर्त यह थी कि जैसे उनसे सहमति ली गई है वैसे ही मंजू से भी उनके बारे में सहमति पूछी जाए। तो वहीं दूसरी शर्त थी कि अगर मंजू को कोई आपत्ति ना हो तो बिना बारात और बिना किसी बड़े दिखावे के सिर्फ करीबियों की
मौजूदगी में सादगी से शादी होगी। तो वहीं मंजू को इनमें से कोई भी चीजों में आपत्ति नहीं थी। इसके बाद पुराने कार्ड वापस लिए गए और नए कार्ड छपवाए गए। जिन पर एक बड़ा संदेश लिखा था तिलक दहेज एवं शोषण युक्त कुप्रथाओं से मुक्त। अब शादी के बाद नितीश की दांपत्य जिंदगी शुरू हुई। लेकिन राजनीति का रास्ता उन्हें सीधा जेल ले गया। नीतीश ने इंजीनियरिंग के बाद नौकरी करने से मना कर दिया और जेपी आंदोलन में कूद पड़े। इसी
आंदोलन के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा। वहीं पत्नी मंजू अक्सर उन्हें जेल में मिलने आया करती थी। लेकिन गया सेंट्रल जेल का सुपरिटेंडेंट बहुत सख्त था। नितीश ने एक इंटरव्यू में बताया था कि हफ्ते में एक बार मिलने देता था वो भी जाली के आर-पार से। जाली इतनी घनी थी कि उससे छोटी उंगली तक निकल नहीं पाते थे। नितीश चाहते थे कि मंजू अपनी पढ़ाई जारी रखें। इसलिए मंजू वापस पटना लौटी
और जीडी हॉस्टल में रहकर अपना बीए, बीएड और एमए की पढ़ाई पूरी की। तो वहीं नितीश अक्सर उन्हें रिक्शे पर फिल्म दिखाने के लिए ले जाते थे और रोमांटिक गाने भी मंजू के लिए गुनगुनाते थे। शादी के बाद के 12 साल नीतीश कुमार के लिए बहुत मुश्किल थे। वह राजनीति में व्यस्त थे और लगातार दो चुनाव हार चुके थे। शादी से पहले मंजू ने कभी पैसों की कमी नहीं देखी थी। लेकिन अब घर चलाना मुश्किल हो गया था। वहीं साल 1982 में मंजू ने घर चलाने के लिए बिहार सरकार में शिक्षिका की नौकरी शुरू कर
दी। हालांकि नौकरी के कारण मंजू और बेटा निशांत सेवदा में रहते थे और नितीश पटना में जिससे परिवार बट गया था। वही 1985 में विधानसभा चुनाव में नितीश ने फैसला किया कि यह उनका आखिरी चुनाव होगा। यह उनकी आखिरी कोशिश होगी। चुनाव लड़ने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। तो वहीं तब उनकी पत्नी मंजू ने अपनी ढाई साल की पूरी
सैलरी यानी कि करीब ₹00 उन्हें सौंप दिए। यह पैसा उस वक्त नितीश के लिए डूबते को तिनके का सहारा साबित हुआ। अब पैसे मिलने के बाद नीतीश कुमार ने 1985 में लोकदल की तरफ से हरनौत विधानसभा सीट पर जीत दर्ज की। चुनाव जीतने के बाद जब नीतीश बख्तियारपुर अपने घर पहुंचे, तो उनकी आंखें सिर्फ पत्नी मंजू को खोज रही थी। जो उस वक्त अपने मायके सेवह में थी। अब पत्नी से मिलने के लिए अतुर नितीश आधी रात को ही एक साथी के साथ मोटरसाइकिल पर सेवह के लिए निकल पड़े। उनके
दोस्त बताते हैं कि मंजू रात से ही उनका इंतजार कर रही थी। तो वहीं 5 साल तक साथ रहने के बाद 1989 में जब नीतीश लोकसभा का चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचे तो उन्हें फिर से पत्नी से दूर रहना पड़ा। मंजू ने भी अपनी डेपुटेशन बिहार सूचना केंद्र नई दिल्ली में करा ली ताकि वह पति के साथ रह सके। अब जैसे ही यह खबर बिहार के अखबारों में छपी
वही सियासी गलियारों में हड़कंप मच गया। नीतीश कुमार पर पत्नी को दिल्ली बुलाने के लिए नियम तोड़ने और पद का गलत इस्तेमाल करने के गंभीर आरोप लगे। इन आरोपों से परेशान होकर नीतीश कुमार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को खुद पत्र लिखकर मंजू जी की प्रतिनियुक्ति रद्द कर दी। तो वहीं आरोप से बचने के लिए मंजू को फिर पटना लौटना पड़ा। नीतीश को जब भी दिल्ली से दिल्ली के कामों से फुर्सत मिलती थी, वह पत्नी और बेटे से मिलने के लिए पटना चले आते थे। वहीं
राजनीति में कदम रखने के बाद नीतीश और मंजू को एक दूसरे से बार-बार दूर रहना पड़ा और यही दूरी उनकी कहानी का सबसे दुखद हिस्सा बनी। वहीं साल 2005 में जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तब भी स्थिति बिल्कुल नहीं बदली। मुख्यमंत्री आवास उन्हें 4 महीने बाद अलॉट किया गया और इस दौरान भी मंजू बेटे निशांत के साथ मायके में ही रह रही थी और नीतीश कुमार को सरकारी इंतजाम वाले घर में अकेले रहना पड़ा। तो वहीं 2007 में मंजू जी को निमोनिया
हो गया था। जिसके बाद नितीश उन्हें तुरंत दिल्ली के मैक्स अस्पताल ले आए और इलाज के दौरान पूरे समय उनके साथ ही रहे। अस्पताल में नितीश अक्सर मंजू के पास बैठकर इस बात का अफसोस करते थे कि वह उन्हें ज्यादा समय नहीं दे पाए। तब मंजू ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा था मेरे रिटायरमेंट के बाद हम सभी साथ रहेंगे। वहीं मंजू जी 2012 में रिटायर होने वाली थी, लेकिन यह सपना अधूरा रह गया। रिटायरमेंट के 5 साल पहले ही यानी कि 14 मई
2007 को मंजू जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक अपनी जीवन संगनी की मौत पर नीतीश कुमार फूट-फूट कर रोए थे क्योंकि राजनीति के चलते उन्होंने अपना सबसे कीमती समय खो दिया था। और आज भी नीतीश कुमार हर साल अपनी पत्नी की पुण्यतिथि पर उनके नाम पर बने मंजू कुमारी स्मृति पार्क जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जैसे वह कोई वादा निभा रहे हो। तो वहीं नीतीश कुमार और मंजू सिन्हा की यह कहानी
दिखाती है कि एक बड़े नेता के राजनीतिक संघर्ष में उनकी पत्नी और परिवार का बल-ब बलिदान कितना बड़ा होता है। पैसों की तंगी हो या जेल की जाली। मंजू जी का टूट साथ ही नीतीश कुमार को 10वीं बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले आया है। यह कहानी हमेशा याद दिलाएगी कि सत्ता की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।
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