
सोचिए दरवाजे पर दस्तक देते ही हर बार वही आवाज आती है। नहीं आप अपनी पूरी मेहनत लगाते हैं। पूरी तैयारी करते हैं। लेकिन नतीजा हमेशा वही होता है। अस्वीकृति यह चुभती है। यह दिल को तोड़ती है। यह आपको यह सोचने पर मजबूर करती है। क्या मैं सच में लायक हूं? क्या मैं कभी सफल हो पाऊंगा? यह कहानी है आदित्य की। उत्तर प्रदेश के लखनऊ में रहने वाला
एक साधारण नौजवान। हाल ही में आदित्य ने कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरी करी थी और अब उसका सपना था किसी अच्छी कंपनी में नौकरी हासिल करने का और अपने परिवार को गर्व महसूस कराने का। हर सुबह आदित्य साफ सुथरे कपड़े पहनकर और अपना बायोडाटा लेकर इंटरव्यू देने निकल पड़ता। लेकिन हर बार उसे एक ही जवाब मिलता। सॉरी आपको सिलेक्ट नहीं किया गया। शुरुआत में आदित्य ने अपने आप को समझाया। कोई बात नहीं अगली बार हो जाएगा। लेकिन जब वह
लगातार 10वीं बार रिजेक्ट हुआ तो उसका मन टूट गया। रात को अपने कमरे में अकेले बैठकर उसने अपने आप से कहा शायद मैं काबिल नहीं हूं। शायद मैं सफल नहीं हो पाऊंगा। थका हुआ और निराश आदित्य अगले दिन ट्रेन में बैठकर वाराणसी चला गया। वहां उसने गंगा किनारे एक पुराना मंदिर देखा। मंदिर के आंगन में एक बुजुर्ग साधु बैठे थे जो पत्ते उठा रहे थे। आदित्य ने जाकर उनसे पूछा, क्या मैं यहां कुछ देर बैठ सकता हूं? साधु मुस्कुराए और बोले बिल्कुल बेटे यह आंगन हमेशा
परेशान लोगों का स्वागत करता है। और फिर आदित्य ने अपना सारा दुख साधु को सुना दिया और बोला मैंने इतनी बार कोशिश की लेकिन हर जगह रिजेक्ट हो रहा हूं। अब मैं अपने आप को बेकार महसूस करता हूं। साधु ने आराम से अपना सिर हिलाया और फिर मुस्कुराते हुए बोले बेटे रिजेक्शन अंत नहीं होता। यह तो एक दिशा परिवर्तन है। देखो जब किसान खेत में बीज बोता है तो कुछ बीज सूखी जमीन पर गिरकर मर जाते हैं। कुछ-कु कीड़े-मकोड़े खा लेते हैं। लेकिन कुछ बीज सही मिट्टी में
जाकर अंकुरित होते हैं और आगे जाकर पेड़ बनते हैं। किसान उन बीजों पर रोता नहीं जो नष्ट हो गए। वह तो बस बीज बोता रहता है क्योंकि उसे इस बात का यकीन है कि एक दिन उसे अच्छी फसल मिलेगी। तुम भी उस किसान जैसे हो। हर इंटरव्यू एक नया बीज है। कुछ नहीं उगेंगे, कुछ बेकार हो जाएंगे। लेकिन एक दिन एक अच्छा बीज अंकुरित होगा। आदित्य उनकी बातें पूरे मन से सुन रहा था। साधु ने आगे कहा, क्या तुम बांस के पेड़ का रहस्य जानते हो? आदित्य ने सिर हिलाया, नहीं।
साधु ने कहा, बांस का पेड़ पहले कुछ सालों तक जमीन के ऊपर दिखाई नहीं देता। लोग हंसते हैं, मजाक उड़ाते हैं और यह कहते हैं यह पौधा बेकार है। लेकिन असल में शुरुआत के साल वह जमीन के अंदर अपनी जड़े मजबूत करता है और फिर अचानक कुछ साल के बाद इतनी तेजी से पढ़ता है कि कुछ ही महीनों में बहुत ऊंचाई तक पहुंच जाता है। तुम भी उसी बांस के पेड़ जैसे हो। यह हार तुम्हारे वो साल हैं जो तुम्हें अंदर से
मजबूत बना रहे हैं और जब अच्छा समय आएगा तो तुम भी बांस के पेड़ की तरह ऊंचाई पर जाओगे। आदित्य की आंखों में आंसू आ गए। लेकिन इस बार यह आंसू दुख के नहीं थे। इस बार उसके अंदर उम्मीद की लौ जल उठी थी। उसने साधु को प्रणाम किया और उनसे बोला धन्यवाद गुरु जी अब से मैं हार नहीं मानूंगा। बस अपनी जड़ों को मजबूत करूंगा। साधु मुस्कुराए और बोले याद रखना बेटे हर हार तुम्हारी जिंदगी का दरवाजा बंद नहीं करती। वो तुम्हें अच्छे मौके की तरफ ले जाती है।
आदित्य नई ऊर्जा के साथ लखनऊ लौटा। इंटरव्यू अब भी मुश्किल थे। अभी भी उसे रिजेक्शन मिलते थे। लेकिन अब उसका नजरिया बदल चुका था। उसे किसान के बीज याद आते हैं। बांस के पेड़ का रहस्य याद आता और आखिरकार एक दिन उसे एक अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह थी आदित्य को जिंदगी जीने का नजरिया मिल गया। अस्वीकृति अंत नहीं है। यह तो केवल नया मोड़ है। यह
यह साबित करने नहीं आती कि तुम बेकार हो। यह तो बस तुम्हें सही दिशा देने आती है। हर नहीं सिर्फ रास्ता साफ कर रहा है ताकि तुम्हें सही हां मिल सके। तो याद रखो किसान की तरह अपना बीज बोते रहो। बांस की तरह चुपचाप अपनी जड़े मजबूत करते रहो। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
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