
बहुत समय पहले की बात है। घने जंगल के बीचों-बीच दो युवा बुद्ध साधु सूरज और नीरज अपने आश्रम लौट रहे थे। आसमान में फैला सुनहरा सूरज मिट्टी की हल्की सुगंध और हर तरफ बिखरी हुई शांति उनकी साधना की गहराई को और बढ़ा रही थी। दोनों के चेहरों पर शांति की एक अलग ही चमक थी। जैसे-जैसे वह जंगल के भीतर आगे बढ़ते गए, अचानक उन्हें किसी की आवाज सुनाई दी। दोनों ने अपना चलना रोक दिया। आगे
बढ़कर देखा तो एक महिला कीचड़ के बड़े गड्ढे में बुरी तरह फंसी हुई है। उसके कपड़े कीचड़ से लथपथ हैं और उसका चेहरा डरा हुआ है। वो कीचड़ से बाहर निकलने के लिए अपने हाथ पैर मार रही है। महिला दोनों साधुओं को देखकर बोली कृपया मेरी मदद कीजिए। मैं यहां से बाहर नहीं निकल पा रही हूं। महिला की बात सुनकर सूरज झिझक गया। उसके मन में विचारों का तूफान उठने लगा। उसने सोचा मुझे इस महिला को निकालने
के लिए इसे हाथ लगाना पड़ेगा। कीचड़ में उतरना पड़ेगा कि यह तो नियमों के विपरीत है और क्या ऐसा करना सही होगा? सन्यासियों के लिए किसी भी महिला को हाथ लगाना अनुचित होता है। सूरज असमंजस में वहीं खड़ा रहा। वो महिला की हालत देखकर दुविधा में था लेकिन उसने कदम आगे नहीं बढ़ाया। उधर नीरज बिना एक भी पल गवाए तुरंत कीचड़ में उतरा। उसने अपना हाथ महिला की ओर बढ़ाया और उससे कहा, डरिए
मत, मेरा हाथ पकड़ लीजिए। महिला ने अपने कांपते हाथों से नीरज का हाथ पकड़ा। कीचड़ में उसके हाथ पैर फिसल रहे थे। लेकिन नीरज पूरी हिम्मत लगाकर उसे ऊपर खींच रहा था। महिला का हाथ और कसता जा रहा था। मानो वह जीवन की आखिरी उम्मीद को पकड़ कर बैठी हो। कुछ ही क्षणों में नीरज उस महिला को सुरक्षित बाहर निकाल लेता है। महिला की सांस अब भी तेज चल रही थी। लेकिन उसके चेहरे पर कृतज्ञता थी। वो बोली धन्यवाद। अगर आप ना होते तो शायद मैं बाहर नहीं निकल पाती। नीरज मुस्कुराया और बोला आप
सुरक्षित हैं। बस इतना ही काफी है। महिला अपने रास्ते चली गई और वह दोनों साधु भी आगे बढ़ने लगे। लेकिन सूरज के मन में अब तूफान और भी तेज हो चुका था। वो लगातार सोचता जा रहा था इसने किसी महिला को हाथ कैसे लगाया? वो भी इतने नजदीक जाकर यह तो नियमों के विरुद्ध है। जंगल का रास्ता लंबा था लेकिन हर तरफ शांति फैली हुई थी। लेकिन सूरज का मन
बिल्कुल भी शांत नहीं था। वो पूरे रास्ते बार-बार उसी घटना को दिमाग में दोहरा रहा था। आखिरकार 2 घंटे चलने के बाद वह दोनों आश्रम पहुंचे। आश्रम में प्रवेश करते ही सूरज आखिर अपनी बात रोक ना सका। वो नीरज की ओर मुड़ा और लगभग गुस्से से बोला, तुमने उस महिला को हाथ कैसे लगाया? तुम उसके इतने नजदीक कैसे गए? क्या तुम्हें जरा भी संकोच नहीं हुआ? क्या तुम नियम भूल गए हो? नीरज अभी भी शांत था।
उसने हल्की मुस्कुराहट के साथ कहा, सूरज, मैंने उस महिला को कीचड़ से निकालकर उसी समय वहीं छोड़ दिया था। लेकिन तुम तो उसे अभी तक अपने मन में ढो रहे हो। तुम पूरी यात्रा उसके विचारों में उलझे रहे। तुम्हारा मन उस कीचड़ से भी ज्यादा गंदा हो गया क्योंकि तुम अपने विचारों को शुद्ध नहीं रख पाए। सूरज पत्थर बन गया। उसे एहसास हुआ कि उसने पूरे रास्ते अपने साथी के बारे में संदेह किया और आलोचना भरे
विचार अपने मन में रखे। जबकि उसका मित्र तो केवल किसी की मदद कर रहा था। धीरे-धीरे उसका सिर झुक गया। उसने विनम्रता से कहा, मित्र, असल में मेरी सोच ही अशुद्ध थी। नीरज मुस्कुराया और बोला गलती करना मनुष्य का स्वभाव है लेकिन उससे सीख लेना ही बुद्ध का मार्ग है। दूसरों की मदद करना पाप नहीं लेकिन गलत सोच रखना सबसे बड़ा पाप
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