Star Daily

Category: Stories

  1. Is website per dard bhari kahani se bhi relative script post kiye jaenge thank you ❤️🙏
  • Motivational Story: गुरु की अनोखी परीक्षा

    बहुत समय पहले की बात है। भारत के घने जंगलों के समीप एक छोटा-सा शांत गांव बसा हुआ था। गांव के किनारे एक साधारण-सा आश्रम था, जहां एक महान और अनुभवी गुरु निवास करते थे। लोग उन्हें श्रद्धा से “बाबा” कहकर पुकारते थे। उनके चेहरे पर अद्भुत शांति और आंखों में गहरा ज्ञान झलकता था। दूर-दूर से लोग उनके पास आते, उनसे शिक्षा लेते और जीवन को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शन पाते।

    गांव के लोग बाबा का अत्यंत सम्मान करते थे। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उनका शरीर अब कमजोर होने लगा था। इसी के साथ उनके मन में एक चिंता घर करने लगी — उनके बाद आश्रम की सेवा और परंपरा को कौन संभालेगा?

    बाबा के चार शिष्य थे, जो कई वर्षों से उनके साथ रहकर सेवा और साधना कर रहे थे। चारों ही शिष्य आज्ञाकारी, मेहनती और गुरु-भक्त थे। बाबा चारों से समान प्रेम करते थे, लेकिन जब उत्तराधिकारी चुनने की बात आती, तो वे किसी एक निर्णय पर नहीं पहुंच पा रहे थे।

    एक दिन बाबा ने तय किया कि वे अपने शिष्यों की एक अनोखी परीक्षा लेंगे।

    अगली सुबह बाबा ने चारों शिष्यों को बुलाया और गंभीर स्वर में बोले, “आज मैं तुम सभी की एक परीक्षा लेना चाहता हूँ।”चारों शिष्य ध्यान से गुरु की बात सुनने लगे।

    बाबा ने कहा, “मेरा पानी पीने का घड़ा सामने कीचड़ में गिर गया है। तुममें से जो भी उसे सही तरीके से निकालकर मेरे पास लाएगा, वही इस परीक्षा में सफल माना जाएगा।”गुरु का आदेश सुनते ही चारों शिष्य उस स्थान की ओर चले गए। तीन शिष्यों ने घड़े को कीचड़ में गिरा देखा और आपस में सोचने लगे, “अगर हम सीधे कीचड़ में

    उतर गए तो हमारे कपड़े खराब हो जाएंगे। बेहतर होगा पहले कोई लकड़ी, डंडा या रस्सी ढूंढ ली जाए, ताकि बिना गंदे हुए घड़ा निकाला जा सके।”

    तीनों शिष्य इधर-उधर साधन ढूंढने लगे।

    लेकिन चौथे शिष्य का मन बिल्कुल शांत था। उसके मन में केवल एक ही बात थी — गुरु का आदेश। उसने यह नहीं सोचा कि कपड़े गंदे होंगे या लोग क्या कहेंगे। बिना एक पल गंवाए वह सीधे कीचड़ में उतर गया। उसने

    दोनों हाथों से घड़ा उठाया, पास की नदी में जाकर उसे अच्छी तरह साफ किया और उसमें स्वच्छ जल भरकर सीधे गुरु के पास ले आया।

    गुरु ने घड़े को देखा। पानी बिल्कुल साफ था और घड़ा भी चमक रहा था। बाबा ने प्रेम भरी नजरों से शिष्य की ओर देखा और बोले, “बेटा, आज तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे मन में केवल सेवा और आज्ञा पालन है। तुमने कठिनाई, डर या समाज की चिंता नहीं की। तुमने सिर्फ गुरु के आदेश को महत्व दिया। यही एक सच्चे शिष्य की पहचान है।”

    इसके बाद बाबा ने उस शिष्य को अपने गले लगाया और सबके सामने घोषणा की, “आज से यही शिष्य इस आश्रम का उत्तराधिकारी होगा और हमारी परंपरा व सेवा को आगे बढ़ाएगा।”बाकी तीनों शिष्य अपनी भूल समझ चुके थे। उन्हें एहसास हुआ कि सच्चा शिष्य वही होता है, जो बिना स्वार्थ और बिना बहाने गुरु के निर्देशों का पालन करता है।

    सीख

    गुरु का आदेश केवल शब्द नहीं होता, वह जीवन को सही दिशा देने वाला मार्ग होता है। जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्य को निभाता है, वही सच्चे ज्ञान और सफलता को प्राप्त करता है।

    अगर आपको यह प्रेरणादायक कहानी पसंद आई हो, तो ऐसी और कहानियों के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहें।

  • अगर हार गए हो तो यह जरूर पढ़ो – चुप रहो और काम करते रहो

    अगर आज लोग तुम्हारी मेहनत पर हंस रहे हैं, तुम्हारे सपनों को छोटा समझ रहे हैं, तो इसे अपनी हार मत समझो। बल्कि इसे एक संकेत मानो कि तुम उस रास्ते पर हो, जहां हर कोई चलने की हिम्मत नहीं करता।

    इस दुनिया में एक अजीब सा नियम है — जब तक तुम सफल नहीं होते, लोग तुम्हें कमजोर साबित करने में लगे रहते हैं। कोई कहेगा, “यह तुम्हारे बस का नहीं है।” कोई मज़ाक उड़ाएगा, “देखो, खुद को क्या समझता है।” और कोई तुम्हारी कमज़ोरियां बार-बार गिनाएगा।

    लेकिन सवाल यह है — क्या हर आवाज़ पर ध्यान देना ज़रूरी है? नहीं।

    शोर नहीं, सबूत बनाओ

    जिंदगी में सबसे बड़ी ताकत है शांति के साथ लगातार मेहनत करना। लोगों को समझाने में अपनी ऊर्जा मत गंवाओ। अपनी योजनाओं का ढिंढोरा मत पीटो।

    क्योंकि सच्चाई यह है कि

    असली खिलाड़ी मैदान के बाहर खड़े लोगों को जवाब नहीं देता, वह खेलता है… और जीत कर जवाब देता है।

    दुनिया आपकी थकान नहीं देखती। दुनिया आपकी नींद से भरी रातें नहीं देखती। दुनिया वह दर्द नहीं देखती जो आप अकेले झेलते हो।

    दुनिया सिर्फ एक चीज देखती है — रिजल्ट

    जब रिजल्ट आता है, तब कहानी बदलती है

    जिस दिन परिणाम सामने आता है, उसी दिन वही लोग तालियां बजाने लगते हैं। वही लोग तारीफ करने लगते हैं।

    इसलिए याद रखो — दिखावा किसी को महान नहीं बनाता। महान वही बनता है जो चुपचाप अपने काम में लगा रहता है।

    गिरना कमजोरी नहीं, रुक जाना हार है

    जब एक पंछी उड़ना सीखता है, तो वह कई बार गिरता है, चोट खाता है। लेकिन वह तानों की परवाह नहीं करता। वह बार-बार पंख फैलाता है… और एक दिन इतनी ऊंचाई पर उड़ता है कि बाकी सब सिर्फ देखते रह जाते हैं।

    इंसान की जिंदगी भी कुछ ऐसी ही होती है।

    तुम गिरोगे। तुम्हें अकेलापन महसूस होगा। लोग बातें बनाएंगे।

    लेकिन जो इंसान हार नहीं मानता, वही आखिरकार मंज़िल तक पहुंचता है।

    असली ताकत शांति में होती है

    पेड़ जब फल से भर जाता है, तो वह और झुक जाता है।

    समंदर जितना गहरा होता है, उतना ही शांत होता है।

    ठीक वैसे ही, असली महानता शोर में नहीं, संयम और मेहनत में होती है।

    कमज़ोर लोग बोलते हैं, मजबूत लोग काम करते हैं।

    याद रखने वाली बात

    यह मत गिनो कि कितनी बार तुम हारे। यह मत सोचो कि कितने लोगों ने तुम्हें नीचा दिखाया।

    बस यह याद रखो — हर बार जब तुम उठे हो, तुम पहले से ज्यादा मजबूत बने हो।

    अगर किसी ने कहा “तुमसे नहीं होगा”, तो यह उसकी सोच की सीमा है, तुम्हारी नहीं।

    सबसे बड़ा जवाब क्या है?

    बदला लेने की जरूरत नहीं। शिकायत करने की जरूरत नहीं।

    सबसे बड़ा जवाब सिर्फ एक है — चुप रहो और काम करो।

    एक दिन वही लोग, जो आज तुम्हारी मेहनत पर हंसते हैं, तुम्हारी सफलता की कहानियां सुनाएंगे।

    लेकिन उस दिन तक — शांत रहो। डटे रहो। और लगातार काम करते रहो।

    क्योंकि

    सपने चुपचाप पूरे होते हैं, और सफलता का शोर अपने आप गूंजता है।

  • साधु का भरोसा टूटा… लेकिन इंसानियत जीत गई | Moral Story in Hindi

    जिस तरह एक माँ को अपने बेटे को देखकर सुकून और खुशी मिलती है, ठीक उसी तरह बाबा भारती को अपने घोड़े को देखकर आत्मिक आनंद मिलता था। भगवान की पूजा और भजन के बाद जो भी समय बचता, वह पूरा अपने घोड़े के लिए समर्पित कर देते थे।

    वह घोड़ा असाधारण रूप से सुंदर, शक्तिशाली और तेज़ था। पूरे इलाके में उसके जैसा दूसरा कोई घोड़ा नहीं था। बाबा भारती प्यार से उसे “सुल्तान” कहकर पुकारते थे। अपने हाथों से उसकी सेवा करते, खुद उसे चारा खिलाते और रोज़ उसकी साफ-सफाई करते।

    बाबा भारती गाँव से कुछ दूरी पर एक छोटे से मंदिर में रहते थे। सुल्तान से उनका लगाव इतना गहरा था कि वे कहते थे— “अगर सुल्तान मुझसे अलग हो गया, तो शायद मैं जीवित नहीं रह पाऊँगा।”

    हर शाम वे सुल्तान पर सवार होकर आठ-दस मील की सैर करते, तब जाकर उनके मन को शांति मिलती।

    डाकू की नज़र सुल्तान पर

    उसी इलाके में खड़क सिंह नाम का एक कुख्यात डाकू रहता था। लोग उसका नाम सुनकर डर जाते थे। एक दिन सुल्तान की प्रशंसा उसके कानों तक पहुँची। उसका मन घोड़े को देखने के लिए बेचैन हो उठा।

    एक दोपहर वह बाबा भारती के पास पहुँचा। बाबा ने शांत स्वर में पूछा, “आओ खड़क सिंह, कैसे आना हुआ?”

    खड़क सिंह ने सिर झुकाकर कहा, “आपकी कृपा से सब ठीक है। सुल्तान को देखने की इच्छा मुझे यहाँ खींच लाई।”

    बाबा मुस्कुराए और बोले, “जो सुल्तान को एक बार देख ले, वह उसे कभी भूल नहीं सकता।”

    वे उसे अस्तबल में ले गए। बाबा के चेहरे पर गर्व झलक रहा था। खड़क सिंह ने सुल्तान को देखा और दंग रह गया। उसने जीवन में कई घोड़े देखे थे, लेकिन ऐसा अनुपम घोड़ा कभी नहीं।

    उसके मन में लालच जाग उठा— “ऐसा घोड़ा तो मेरे पास होना चाहिए। इस साधु को इसकी क्या ज़रूरत?”

    उसने कहा, “बाबा जी, अगर इसकी चाल न देखी तो क्या देखा?”

    धमकी और डर

    बाबा खुशी-खुशी सुल्तान को बाहर लाए, उसकी पीठ थपथपाई और उस पर सवार हो गए। सुल्तान बिजली की तरह दौड़ पड़ा। उसकी रफ्तार देखकर खड़क सिंह के दिल में जलन भर गई।

    जाते-जाते उसने कहा, “बाबा जी, यह घोड़ा ज़्यादा दिन आपके पास नहीं रहेगा।”

    यह सुनकर बाबा भारती भयभीत हो गए। कई रातों तक वे सो नहीं पाए। हर समय सुल्तान की रखवाली करते रहे। लेकिन महीने बीत गए, खड़क सिंह नहीं आया। धीरे-धीरे बाबा का डर कम हो गया।

    विश्वास की परीक्षा

    एक शाम बाबा भारती सुल्तान पर सवार होकर घूमने निकले। तभी रास्ते में करुण स्वर सुनाई दिया— “बाबा… इस गरीब पर दया करो…”

    उन्होंने देखा, एक अपाहिज व्यक्ति ज़मीन पर पड़ा था। उसने विनती की, “मुझे सामने वाले गाँव पहुँचा दीजिए। भगवान आपका भला करेगा।”

    बिना सोचे बाबा घोड़े से उतर गए और उस व्यक्ति को सुल्तान पर बैठा दिया। वे खुद लगाम पकड़कर चलने लगे।

    अचानक एक झटका लगा— लगाम उनके हाथ से छूट गई।

    उन्होंने देखा, वह अपाहिज सुल्तान को तेज़ी से दौड़ाए जा रहा था। वह और कोई नहीं, खड़क सिंह था।

    साधु का महान हृदय

    बाबा भारती कुछ क्षण शांत रहे, फिर ऊँची आवाज़ में बोले, “ठहरो! एक बात सुनते जाओ।”

    खड़क सिंह रुका। बाबा ने कहा, “घोड़ा अब तुम्हारा है। मैं इसे वापस नहीं माँगूँगा। बस एक प्रार्थना है—इस घटना के बारे में किसी को मत बताना।”

    खड़क सिंह स्तब्ध रह गया। उसने पूछा, “बाबा जी, आपको यह डर क्यों है?”

    बाबा ने उत्तर दिया, “अगर लोगों को यह पता चल गया, तो वे किसी गरीब पर विश्वास करना छोड़ देंगे।”

    इतना कहकर बाबा वहाँ से चले गए।

    डाकू का हृदय परिवर्तन

    उन शब्दों ने खड़क सिंह को भीतर तक झकझोर दिया। जिस घोड़े के बिना बाबा जी जीने की बात करते थे, उसी घोड़े को उन्होंने इंसानियत के लिए त्याग दिया।

    रात के अंधेरे में खड़क सिंह मंदिर पहुँचा। सुल्तान की लगाम उसके हाथ में थी। वह चुपचाप अस्तबल में गया, सुल्तान को उसकी जगह बाँधा और लौट गया। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थे।

    इंसानियत की जीत

    सुबह बाबा भारती स्नान के बाद अस्तबल की ओर बढ़े। सुल्तान की आवाज़ सुनते ही वे दौड़ पड़े। अपने घोड़े को देखकर वे भावुक हो गए। उसे गले लगाकर रो पड़े।

    उन्होंने कहा, “अब कोई भी गरीबों की मदद से मुँह नहीं मोड़ेगा।”

    उनकी आँखों से बहते आँसू इस बात के गवाह थे कि सच्चा भरोसा कभी व्यर्थ नहीं जाता।

    🌼 शिक्षा (Moral)

    जब इंसान स्वार्थ से ऊपर उठकर विश्वास करता है, तो सबसे कठोर दिल भी बदल सकता है।

  • सोच से बनते है अमीर // Best Motivational Story in Hindi

    एक बार की बात है। भारत के एक बड़े और व्यस्त शहर में एक आलीशान कोठी के बाहर एक भिखारी कई दिनों से बैठा हुआ था। उसके कपड़े फटे हुए थे। चेहरा थका हारा और आंखों में मायूसी साफ झलक रही थी। वह दो दिन से लगातार उसी जगह बैठा था। बिना कुछ खाए पिए। बस लोगों से रोटी के कुछ टुकड़े मांगकर पेट भर रहा था। उस आलीशान बंगले का मालिक एक बहुत

    अमीर उद्योगपति था। तीसरे दिन जब वो अमीर आदमी अपने घर से बाहर निकला तो उसकी नजर भिखारी पर पड़ी। उसने उस भिखारी को गौर से देखा और उसके पास जाकर बोला अरे तुम तो एकदम लंबे चौड़े लगते हो। फिर क्यों भीख मांग रहे हो? मेहनत मजदूरी से अपना पेट क्यों नहीं भरते? भिखारी ने जवाब दिया, “साहब, मेरे पास कोई भी काम नहीं है। कोई मुझे

    नौकरी देने को तैयार नहीं होता। अगर आप मुझे कोई नौकरी दे दे, तो मैं अभी भीख मांगना बंद कर दूंगा।” भिखारी की यह बात सुनकर अमीर आदमी मुस्कुराया। उसने कुछ पल सोचा फिर बोला, नौकरी तो मैं तुम्हें नहीं दे सकता, लेकिन अगर तुम सच में मेहनत करने को तैयार हो, तो मैं तुम्हें अपना बिजनेस पार्टनर बना सकता हूं। मेरे पास एक साबुन की फैक्ट्री है। मैं चाहता हूं कि

    तुम साबुन को बाजार में सप्लाई करो और महीने के अंत में जो भी मुनाफा होगा, उसका एक हिस्सा मुझे दे देना। भिखारी ने हैरानी के साथ पूछा। मतलब आप 80% लोगे और मुझे 20% दोगे। अमीर आदमी हंस पड़ा और बोला नहीं मुझे सिर्फ 10% देना। बाकी पूरा 90% तुम्हारा होगा। इस तरह तुम ज्यादा मेहनत करोगे और जल्दी-जल्दी तरक्की करोगे। भिखारी को अपनी किस्मत पर यकीन ही नहीं हुआ। उसे लगा जैसे उसकी

    जिंदगी अचानक बदल गई हो। उसने तुरंत हामी भर दी। अगले दिन वह भिखारी उस अमीर आदमी की फैक्ट्री में गया और मेहनत के साथ काम शुरू कर दिया। वह सुबह से रात तक दुकानों पर साबुन सप्लाई करता, ग्राहकों से बातें करता और नए-नए ऑर्डर्स लेकर आता। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई। महीने के अंत तक उसने ₹1 लाख का मुनाफा कमा लिया था। शाम को जब वह

    अपने कमरे में बैठा था तो वह सोचने लगा। सारा काम तो मैंने ही किया है। फैक्ट्री वाला तो बस आराम से बैठा था। अब मैं क्यों अपनी मेहनत का 10% उसे दूं? यह तो मेरे साथ नाइंसाफी होगी। लालच उसके मन में डेरा जमा चुका था। महीने के अंत में जब अमीर आदमी आया और उसने बड़े आराम से पूछा। तो बताओ इस महीने कितना मुनाफा हुआ? भिखारी झूठे आंसू बहाते हुए बोला। अरे साहब इस महीने तो मुझे एक भी रुपए का मुनाफा नहीं हुआ। उल्टा मेरे ऊपर कर्ज हो गया है।

    अमीर आदमी उसकी आंखों में देखते ही समझ गया कि वह झूठ बोल रहा है। मगर उसने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराया और चुपचाप वहां से चला गया। भिखारी अंदर ही अंदर बहुत खुश होने लगा। उसने सोचा देखा मैंने उसे मूर्ख बना दिया। अब यह सारा मुनाफा सिर्फ मेरा है। अगले कुछ हफ्तों में वो नया-नया अमीर बना भिखारी उन पैसों को मौजमस्ती में उड़ाने लगा। महंगे कपड़े, शराब, दोस्तों पर खर्च। उसने उस पैसे को पानी की तरह बहा दिया। लेकिन उसने यह नहीं सोचा कि

    असली तरक्की मेहनत और ईमानदारी से होती है। मौजमस्ती और धोखे से नहीं। कुछ ही महीनों में वह ₹1 लाख खत्म हो गए। जो दोस्त उसके आसपास मंडराते थे, वही दोस्त अब उससे दूर चले गए। अब उसके पास ना पैसा बचा, ना काम, ना ही इज्जत। आखिरकार मजबूरी में वह उसी जगह लौट आया। उसी आशान बनने के बाद जहां उसे इतना अच्छा मौका मिला था और वहीं बैठकर दोबारा भीख मांगने लगा। जब उस अमीर आदमी ने उस भिखारी को दोबारा वहीं बैठे देखा तो मन

    ही मन सोचने लगा यही फर्क है गरीब की सोच में और अमीर की सोच में। अमीर इंसान यह सोचता है कि दूसरों के साथ मैं अपना मुनाफा कैसे करूं। पर गरीबी की सोच वाला इंसान सोचता है सारा मुनाफा मैं अकेले ही रख लूं। दोस्तों अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी हो तो आपको यह कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।

  • कुछ तो लोग कहेंगे | Everyone Judges You – Real moral in hindi kahani

    किसी ने सही कहा है। कुछ तो लोग कहेंगे। यह कहानी इन्हीं पंक्तियों की सच्चाई दिखाती है। बहुत समय पहले एक बूढ़े आदमी ने नया घोड़ा खरीदा था। वो और उसका बेटा अक्सर इसी घोड़े पर सवार होकर गांव-गांव जाया करते थे। एक दिन उसने अपने बेटे के साथ उस गांव से दूर लंबी यात्रा पर जाने का फैसला किया। बूढ़ा आदमी होने के कारण उसने खुद घोड़े की सवारी की और अपने

    बेटे को बगल में चलने को कहा। कुछ दूर चलने के बाद रास्ते में उन्हें एक युवक मिला। युवक ने कहा, यह आदमी अपने बेटे से प्यार नहीं करता। खुद तो घोड़े पर सवार है और बेचारे बेटे को पैदल चला रहा है। यह सुनकर बूढ़ा आदमी घोड़े से उतर गया और अपने बेटे को उस घोड़े पर बैठा दिया और खुद घोड़े के बगल में चलने लगा। कुछ दूर चलने के बाद उन्हें एक बूढ़ी औरत मिली। बूढ़ी औरत ने उन्हें देखा और उस बेटे की

    आलोचना करते हुए कहा, “यह लड़का कितना निर्दयी और असभ्य है। यह घोड़े पर सवार है और अपने बूढ़े पिता को पैदल चला रहा है। बाप बेटे को लगा कि दोनों का साथ में सवारी करना ही उचित रहेगा। इससे यह धारणा बनेगी कि वह एक दूसरे की परवाह करते हैं। इस तरह दोनों घोड़े पर सवार होकर अपनी यात्रा पर निकल पड़े। कुछ समय बाद वो नजदीक के गांव से गुजरे। उस गांव में एक बड़े अस्तबल के पास कुछ लोग बैठे थे।

    अस्तबल के आसपास बैठे उन लोगों ने जब दोनों को उस घोड़े की सवारी करते हुए देखा तो वह हंसने लगे। उनमें से एक आदमी उनके पास आया और बोला तुम दोनों इस घोड़े पर सवार होकर इसे क्यों तड़पा रहे हो? तुम दोनों ने इस पर इतना वजन क्यों डाल रखा है? बाप बेटे को यह सुनकर दुख हुआ। तो बेटे ने कहा, अब हम इस घोड़े को आराम देंगे और बिना सवारी किए ही इसे ले जाएंगे। इतना कहकर वह दोनों उस घोड़े से उतर गए और पैदल चलने लगे और उनका घोड़ा उनके पीछेछे

    आने लगा। कुछ दूर आगे जाकर उन्हें आदमियों का एक और समूह मिला। उस आदमी और उसके बेटे को बिना सवार हुए जाता देखकर वह आदमी हंसने लगे। उन आदमियों में से एक आदमी उनके पास आया और यह बोला, “तुम दोनों कितने मूर्ख हो। इतना अच्छा घोड़ा होने के बावजूद भी पैदल चल रहे हो। यह सुनकर वह आदमी और उसका बेटा असमंजस में पड़ गए। अब वह इस घोड़े का क्या करें? आगे चलकर एक ऋषि रहते थे। उस व्यक्ति ने उनसे सलाह लेने का निर्णय लिया। ऋषि

    से मिलने पर उसने सारी घटना बताई तो ऋषि ने मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति से कहा तुम्हें दूसरों की टिप्पणियों की चिंता नहीं करनी चाहिए। लोग हर चीज को अपने अनुभव के आधार पर देखते हैं। जब आप घुड़सवारी कर रहे थे और आपका बेटा पैदल चल रहा था तो उस युवक ने आपको दोषी ठहराया। इस युवक को उसके पिता ने बहुत मेहनत करवाई थी। इसलिए उसे आपके बेटे पर भी दया आई। जब आपका बेटा घोड़े पर सवार था और आप पैदल चल रहे थे तो बूढ़ी औरत ने

    आपके बेटे पर आपको पैदल चलाने का आरोप लगाया। इस औरत का अपना बेटा आज्ञाकारी नहीं था। इस कारण उस बूढ़ी औरत को लगा कि आपका बेटा भी उसके अपने बेटे जैसा ही निर्दयी है। अस्तवल के पास खड़े लोग जिन्होंने आप दोनों पर घोड़े पर वजन डालने का आरोप लगाया था। वह सारे लोग घोड़े के व्यापारी थे। उन्हें लगा कि आपका घोड़ा ज्यादा वजन के कारण मर जाएगा। और वह लोग जिन्होंने घोड़े पर सवार ना

    होने के लिए आपका मजाक उड़ाया था वे सब कसाई थे। वह जानवरों के प्रति बहुत ही क्रूर थे। शिक्षा इसलिए आपको अपने आसपास के लोगों की राय पर विश्वास नहीं करना चाहिए। जब भी आपको संदेह हो तो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके यह सोें कि आप सही हैं या गलत। यदि आपका विचार, आपकी वाणी और आपका कार्य किसी इंसान के लिए मददगार है तो आप बिल्कुल सही हैं। और यदि आपका कार्य किसी को शारीरिक या मानसिक रूप से चोट पहुंचाता है तो आप गलत हैं।

  • Life Changing Story – आराम तुम्हे ख़त्म कर देगा motivational quotes in Hindi

    भारत के एक बड़े शहर में एक साधारण सा लड़का रहता था राहुल। राहुल की उम्र ज्यादा नहीं थी, लेकिन उसके मन में सपने बहुत बड़े थे। वह चाहता था कि उसका भी नाम हो। उसकी भी पहचान बने। लोग उसे जाने और उसकी बातें सुने। उसका सपना था कि वह अपना खुद का YouTube चैनल शुरू करें और लोगों को प्रेरित करें। लेकिन हकीकत अक्सर सपनों से अलग

    होती है। राहुल एक साधारण नौकरी करता था। दिनभर अपने ऑफिस में मेहनत करता लेकिन उसे संतोष नहीं मिल पाता। उसे लगता जैसे वह किसी जेल में फंसा हुआ है। वो नौकरी से निकलना चाहता था लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता। मन ही मन गुड़ता रहता और हर दिन अपने आप से यही पूछता क्या मेरी जिंदगी हमेशा ऐसी ही रहेगी? क्या मैं अपने सपनों को जी पाऊंगा?

    समय गुजरता गया लेकिन राहुल की हालत वैसी ही रही। एक दिन वह परेशान होकर अपने घर से निकल गया और पास के पार्क में जाकर एक लकड़ी की बेंच पर बैठ गया। राहुल के चेहरे पर निराशा साफ झलक रही थी। वो चुपचाप सामने देख रहा था जैसे उसकी आंखों में कोई उम्मीद बाकी ना बजी हो। उसी समय पार्क में एक बुजुर्ग व्यक्ति टहलते हुए आए। वह शहर के सबसे

    अमीर और सफल व्यक्तियों में से एक थे। जब उन्होंने राहुल को उदास देखा तो रुक गए और नरम आवाज में उससे पूछा क्या हुआ बेटे? तुम इतने परेशान क्यों दिख रहे हो? राहुल के पास खोने को कुछ नहीं था। उसने अपनी कहानी बुजुर्ग को बता दी। कैसे वह नौकरी में अटका हुआ है? कैसे वह अपने सपनों को नहीं जी पा रहा? कैसे उसकी जिंदगी नाकाम लगने लगी है। बुजुर्ग

    आदमी ने अच्छी तरह राहुल की बातें सुनी। फिर राहुल की आंखों में देखा और मुस्कुराते हुए बोले, मैं तुम्हारी उदासी की वजह समझ गया हूं और मुझे उसका हल भी पता। राहुल उत्साहित होकर बोला, “प्लीज अंकल, मुझे बताइए ना। मुझे रास्ता दिखाइए।” बुजुर्ग व्यक्ति बोले, हल जानने से पहले तुम्हें मेरे साथ आना होगा।” चलो यहां से कुछ दूरी पर एक बड़ा सा कुत्ता बैठा है। उसके

    पास चलते हैं। राहुल को थोड़ी हैरानी हुई। फिर भी वह उस आदमी के साथ आगे चल पड़ा। जब वह दोनों वहां पहुंचे तो राहुल ने देखा एक बड़ा सा कुत्ता जमीन पर बैठा रो रहा है। राहुल को लगा शायद इसे भूख लगी है। बुजुर्ग व्यक्ति ने तुरंत उसे कुछ रोटियां दी। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि कुत्ता रोटी खाने के बाद भी रोता ही रहा। थोड़ी देर वह चुप हो जाता। फिर से रोने लगता। रावण को समझ नहीं आया और उसने उत्सुकता से

    पूछा, “अंकल, यह कुत्ता क्यों रो रहा है? आपने इसे खाना भी दे दिया। उसके बावजूद यह दुखी है। बुजुर्ग व्यक्ति मुस्कुराए और बोले, “यह इसलिए रो रहा है बेटा क्योंकि जिस जगह पर यह बैठा है, वहां नीचे एक नुकीला पत्थर पड़ा है। वो पत्थर इसे बार-बार चुभ रहा है। राहुल और हैरान होकर बोला, “अगर इतना दर्द हो रहा है, तो यह उठ क्यों नहीं जाता? अपनी जगह बदल क्यों नहीं लेता?” बुजुर्ग ने राहुल की तरफ देखा और

    मुस्कुराते हुए बोले, यही तो बात है बेटा। अभी इसे इतना दर्द नहीं हो रहा कि यह उठ जाए। यह बस थोड़ी तकलीफ झेल लेता है। फिर आराम से उसी जगह बैठा रहता है। यह अपने कंफर्ट ज़ोन में है। जब तक कि यह दर्द असहनीय ना हो। यह यहां से उठेगा नहीं। यह सुनकर राहुल की आंखें फटी रह गई। बुजुर्ग ने आगे कहा, तुम्हारी भी यही समस्या है। राहुल, तुम सफलता चाहते हो, लेकिन अपनी पुरानी जिंदगी और आराम को नहीं त्यागना चाहते। जब तक इंसान अपने आराम के

    दायरे से बाहर नहीं निकलता, वह कभी ऊंचे मुकाम पर नहीं पहुंच सकता। सफलता त्याग मांगती है, मेहनत मांगती है और सबसे बड़ी बात हिम्मत मांगती है। उस पल राहुल को अपनी गलती समझ में आ गई। उसने यह तय कर लिया कि अब वो अपनी जिंदगी को उदासी में नहीं बिताएगा। उस दिन के बाद राहुल ने अपनी जिंदगी बदल ली। दिन में वो नौकरी करता लेकिन रात में जाग कर अपने YouTube चैनल पर मेहनत करता। उसे

    नींद नहीं मिल पाती। कभी उसके दोस्त उसका मजाक उड़ाते। यह सबसे कुछ नहीं होगा। लेकिन राहुल ने हार नहीं मानी। 2 साल तक उसने दिन रात मेहनत की। धीरे-धीरे उसका चैनल लोगों तक पहुंचने लगा। उसकी मेहनत रंग लाई और एक दिन राहुल उस शहर के सफल व्यक्तियों में गिना जाने लगा। जिस तरह वह कभी उदासी में पार्क की पेंच पर बैठा था। अब उसी पार्क में लोग उसे पहचानते और उसकी मिसाल दिया करते थे। दोस्तों

    अगर जिंदगी में सचमुच बड़ा बनना है तो कुत्ते की तरह मत रोते रहो। उठो अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलो और वह कदम बढ़ाओ जिसकी तुम्हें जरूरत है। सफलता वहीं मिलती है जहां हिम्मत और त्याग होता है। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आप एक   शेयर जरूर करे।

  • दो भाइयों की कहानी // Life Changing Story

    अन्याय का जवाब आइये जानते है

    इस सच्ची कहानी में

    पूरा राज

    बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गांव में दो भाई रहते थे। मोहन और सोहन दोनों ही बेहद मेहनती थे और अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का सपना देखते थे। गांव में रोजगार के अवसर बहुत कम थे। इसलिए दोनों ने तय किया कि अब उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए शहर जाना होगा। शहर पहुंचकर दोनों

    भाइयों ने मिलकर कालीन बुनाई का काम शुरू किया। छोटा भाई सोहन अच्छे कालीन बुना करता था। वो दिन रात मेहनत करके खूबसूरत कालीन तैयार करता और उसका बड़ा भाई मोहन उन कालीनों को अपने घोड़े पर लादकर शहर के बाजार में बेचकर आता था। शाम को लौटकर मोहन अपनी कमाई थोन के साथ बांटता। धीरे-धीरे उनका काम अच्छा चल निकला और वह दोनों भाई

    खुशी से रहने लगे। लेकिन एक दिन एक ऐसी घटना घटी जिसने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। उस दिन मोहन हमेशा की तरह अपने कालीन बेचकर लौट रहा था। घोड़े की काटी पर उसने एक हल्की सी पोटली बांधी हुई थी जिसमें उसने सोने के सिक्के रखे हुए थे। रास्ते में बाजार से कुछ सामान खरीदते समय एक दुकानदार मोहन के पास आकर बोला, “अरे भाई, मैं

    तुम्हारा घोड़ा खरीदना चाहता हूं। बताओ कितने में बेचोगे?” मोहन कुछ सोच ही रहा था कि दुकानदार ने कहा, “मैं पांच सिक्के दूंगा।” यह सुनकर मोहन अंदर ही अंदर मुस्कुराने लगा। उस समय घोड़े की कीमत सिर्फ एक सिक्का हुआ करती थी और यह दुकानदार पांच सिक्के देने को तैयार था। मोहन ने खुशी-खुशी हामी भर दी और बोला जी बिल्कुल मैं घोड़ा आपको बेचने को

    तैयार हूं। दुकानदार ने तुरंत अपनी जेब से पांच सिक्के निकाले और मोहन के हाथ में रखकर बोला, अब यह पूरा घोड़ा मेरा हुआ। मोहन ने सिक्के लेते हुए कहा, “जी हां, यह पूरा घोड़ा आपका है। मोहन घोड़े की काठी से अपनी पोटली निकालने लगा। लेकिन उसी वक्त दुकानदार ने उसे धक्का देते हुए कहा, नहीं यह पोटली भी अब मेरी है। तुमने पांच सिक्कों के बदले पूरा घोड़ा मुझे बेच दिया है। काटी हो या पोटली यह सब कुछ मेरा है। मोहन हैरान रह गया और उसने कहा, “अरे यह तो

    गलत है। मैंने तुम्हें घोड़ा भेजा है ना कि मेरी पोटली?” लेकिन दुकानदार चालाकी से बोला नहीं तुमने अभी सबके सामने मुझे कहा था कि पूरा घोड़ा तुम्हारा है। अब यह सब मेरी संपत्ति है। आसपास खड़े लोग भी दुकानदार की तरफदारी करने लगे। मोहन लाचार और उदास होकर अपने घर लौट आया। उसने रोते हुए सारी कहानी सोहन को बताई। सोहन ने धैर्यपूर्वक मोहन की बात सुनी और फिर बोला, परेशान मत हो भैया। जैसा उसने हमारे साथ किया, अब हम भी वैसा ही करेंगे।

    कुछ दिनों के बाद सोहन उस दुकानदार की दुकान पर गया। दुकान सचमुच सुंदर थी और पूरी तरह ग्राहकों से भरी हुई थी। सोहन ने दुकानदार से कहा, “अरे भाई, आपकी दुकान तो बहुत अच्छी है। मैं इसे 1000 सोने के सिक्कों में खरीदना चाहता हूं।” दुकानदार यह सुनकर अंदर ही अंदर झूं उठा। उसकी दुकान की असली कीमत सिर्फ 800 सोने की सिक्के थी और कोई उसे 1000 सोने के सिक्के दे रहा था। उसने तुरंत हामी भर दी और

    बोला, “जी हां बिल्कुल। अब यह दुकान आपकी है। सोन ने अपनी जेब से पोटली निकाली और 1000 सिक्के दुकानदार को थमाते हुए बोला, “अब यह पूरी दुकान मेरी है।” दुकानदार बोला, “जी हां बिल्कुल। यह पूरी दुकान आपकी है।” दुकानदार अपनी दुकान के अंदर जाकर अपना सामान समेटने लगा। लेकिन उसी वक्त सोहन ने उसे रोकते हुए कहा, रुको। अब यह सामान

    तुम नहीं ले जा सकते। आपने अभी सबके सामने कहा है कि पूरी दुकान मेरी है। यह सामान भी अब मेरा हो चुका है। दुकानदार गुस्से से लाल हो गया। उसने चिल्लाकर कहा, “यह क्या मजाक है? यह तो मेरी मेहनत की कमाई है।” सोहन ने भी उसी तरह चालाकी की जिस तरह दुकानदार ने मोहन के साथ की थी। उसने आसपास खड़े ग्राहकों से गवाही दिलाई और इस बार

    सब ने सोहन का साथ दिया। अब दुकानदार बेबस होकर रोने लगा। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया। उसने समझ लिया कि धोखा देकर कभी भी किसी का भला नहीं होता। जो जैसा करता है उसे वैसा ही फल मिलता है। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में कभी भी किसी के साथ अन्याय नहीं करना चाहिए। क्योंकि जैसा हम दूसरों के साथ करते हैं, वैसा ही हमारे साथ लौट कर आता है।

    आपका साथ

    आपका ईमान

    फिर मिलते है

    नेस्ट बार

    राधे राधे

    जय हिन्द

    🇮🇳

  • बीरबल का जादुई सुरमा – Birbal Ki Kahani | Akbar Birbal Ki kahani

    अकबर का साला हमेशा से ही बीरबल की जगह लेना चाहता था। अकबर जानते थे कि बीरबल की जगह ले सके ऐसा बुद्धिमान इस संसार में कोई नहीं है। फिर भी जोरू के भाई को वह सीधी ना नहीं बोल सकते थे। ऐसा करके वह अपनी लाडली बेगम की बेरुखी मोल नहीं लेना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने अपने साले साहब को एक कोयले से भरी बोरी दे दी और कहा कि जाओ और इसे हमारे राज्य के सबसे मक्कार और लालची सेठ सेठ

    दमधी लाल को बेच कर दिखाओ। अगर तुम यह काम कर गए तो तुम्हें बीरबल की जगह वजीर बना दूंगा। अकबर की इस अजीब शर्त को सुनकर उनका साला अचंभे में पड़ गया। वह कोयले की बोरी लेकर चला तो गया पर उसे पता था कि वह सेठ किसी की बातों में नहीं आने वाला। ऊपर से वह उल्टा उसे ही छूना लगा देगा। हुआ भी यही। सेठ दमद्दी लाल ने कोयले की बोरी के बदले एक ढेला भी देने से इंकार कर दिया। साला अपना

    सा मुंह लेकर महल वापस लौट आया और अपनी हार स्वीकार कर ली। अब अकबर ने वही काम बीरबल को करने को कहा। बीरबल कुछ सोचे और फिर बोले कि सेठ दमद्दी लाल जैसे मक्कार और लालची सेठ को यह कोयले की बोरी क्या? मैं सिर्फ कोयले का एक टुकद्दा ही 50 सोने के सिक्कों में बेच आऊंगा। यह बोलकर वह तुरंत वहां से रवाना हो गए। सबसे पहले उसने एक दर्जी के पास जाकर एक मखमली कुर्ता खरीदा। हीरे मोती वाली मालाएं गले में डाली। महंगी जूती पहनी और

    कोयले को बारीक सुरमे जैसा पिसवा लिया। फिर उसने पिसे कोयले को एक सुरमे की छोटी चमकदार डिब्बी में भर लिया। इसके बाद बीरबल ने अपना भेष बदल लिया और एक मेहमान घर में रुक कर इश्तहार दे दिया कि बगदाद से बद्े शेख आए हैं जो करिश्मा एक सुरमा बेचते हैं जिसे आंखों में लगाने से मरे हुए पूर्वज दिख जाते हैं और यदि उन्होंने कहीं कोई धनगाधा है तो उसका पता बताते हैं। यह बात शहर में आग की तरह

    फैली। सेठ दमद्दी लाल को भी यह बात पता चली। उसने सोचा जरूर उसके पूर्वजों ने कहीं ना कहीं धन काटा होगा। उसने तुरंत शेख बने बीरबल से संपर्क किया और सुरमे की डिब्बी खरीदने की पेशकश की। शेख ने डिब्बी के 100 सोने के सिक्के मांगे और मोल भाव करते-करते 50 सोने के सिक्कों में बात तय हुई। पर सेठ भी होशियार था। उसने कहा मैं अभी तुरंत यह सुरमा लगाऊंगा। और अगर मुझे मेरे पूर्वज नहीं दिखे तो मैं

    सिक्के वापस ले लूंगा। बीरबल बोला बिल्कुल आप ऐसा कर सकते हैं। चलिए शहर के चौराहे पर चलिए और वहां इसे जांच लीजिए। सुरमे का चमत्कार देखने के लिए भी डाज इकट्ठा हो गई। तब बीरबल ने ऊंची आवाज में कहा यह सेठ अभी यह चमत्कारी सुरमा लगाएंगे और अगर यह उन्हीं की औलाद हैं जिन्हें यह अपना मां-बाप समझते हैं तो इन्हें इनके पूर्वज दिखाई देंगे और गड्डी धन के बारे में बताएंगे। लेकिन अगर आपके मां-बाप में से

    किसी ने भी बेईमानी की होगी और आप उनकी असल औलाद नहीं होंगे तो आपको कुछ भी नहीं दिखेगा। और ऐसा कहते ही बीरबल ने सेठ की आंखों में सुरमा लगा दिया। फिर क्या था? सिर खुजाते हुए सेठ ने आंखें खोली। अब दिखना तो कुछ था नहीं। पर सेठ करे भी तो क्या करें? अपनी इज्जत बचाने के लिए सेठ ने 50 सोने के सिक्के बीरबल के हाथ थमा दिए और मुंह फुलाते हुए आगे बढ़ गए। बीरबल फौरन अकबर के पास पहुंचे और रुपए थमाते हुए सारी कहानी सुना दी। अकबर का

    साला बिना कुछ कहे अपने घर लौट गया और अकबर बीरबल एक दूसरे को देखकर मंदमंद मुस्काने लगे। इस किस्से के बाद फिर कभी अकबर के साले ने बीरबल का स्थान नहीं मांगा।