आपको यह बताते हैं कि भारत की तरह चाइना में आतंकवाद की समस्या इतनी गहरी क्यों नहीं है और चाइना में आतंकी घटनाएं ना के बराबर आखिर क्यों होती है? तो सबसे बड़ा कारण यह है कि जिस पाकिस्तान को आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रायोजक
माना जाता है। उस पाकिस्तान को चाइना ने अपने कर्ज से दबाया हुआ है। आज पाकिस्तान का एक भी आतंकी संगठन चाइना के उईगर मुसलमानों की बात नहीं करता। जिन पर चाइना में सबसे ज्यादा जुल्म होते हैं। दूसरा चाइना में आतंकवादी हमले बहुत कम होते हैं क्योंकि चाइना में आतंकवाद के खिलाफ सबसे कठोर
कानून है। वहां आतंकवाद को लेकर राजनीति नहीं होती है। वहां की कम्युनिस्ट सरकार साफ शब्दों में यह कहती है आतंकवाद को धार्मिक कट्टरपन से जुड़ा हुआ ही माना जाएगा। तीसरा चाइना में आतंकवाद के खिलाफ सबसे मजबूत आंतरिक सुरक्षा और निगरानी तंत्र है। पूरे चाइना में सीसीटीवी कैमरों का ऐसा जाल है कि वहां छोटी से छोटी गतिविधियों की भी निगरानी होती है और लोगों
का चेहरा देखकर उनका रिकॉर्ड निकाला जा सकता है। इससे लोगों में यह डर रहता है कि अगर वह आतंकवाद की गतिविधियों में शामिल होते हैं तो सरकार उन्हें मरते दम तक जेल में रख सकती है। साल 2015 में चाइना में एक नया कानून आया था जिसके तहत एक ऐसी संस्था बनाई गई थी जो देश भर में आतंकवाद से संबंधित गतिविधियों संदिग्धों की पहचान करती है और पूरे चाइना में आतंकवाद से जुड़े मामलों में तुरंत कारवाई
होती है वहां ऐसे मामलों में 10 20 सालों तक जांच नहीं चलती चाइना में सोशल मीडिया पर भी सरकार का पूरा नियंत्रण होता है। भारत में अगर सोशल मीडिया पर आतंकियों ने कोई साजिश रची है तो उसका डाटा हमें कंपनियों से मांगना पड़ता है और यह कंपनियां सरकार को डाटा देने से इंकार भी कर सकती हैं। लेकिन चाइना में ऐसा नहीं है। चाइना में इंटरनेट कंपनियों को आरोपी
से जुड़ा हुआ सभी डाटा जांच एजेंसियों को फौरन देना होता है और इस वजह से वहां सोशल मीडिया के जरिए आतंक का नेटवर्क खड़ा ही नहीं किया जा सकता। युवाओं का ब्रेन वाश नहीं हो सकता। हालांकि चाइना के मामले में एक बड़ी बात यह है कि वहां होने वाली घटनाओं को सरकार की मंजूरी के बिना मीडिया में रिपोर्ट नहीं किया जा सकता और इस वजह से भी चाइना में होने वाली ज्यादातर घटनाएं दुनिया को पता ही नहीं चल पाती।
सोशल मीडिया पर इन दिनों ऋषभ और शेफाली की शादी की वीडियो खूब वायरल हो रही है और जैसे ही कोई चीज वायरल होती है प्यार करने वाले भी आ जाते हैं और बिना वजह ट्रोल करने वाले भी। आज हम आपको इस कपल की 11 साल की सच्ची लव स्टोरी और उनके स्ट्रगल और वायरल होने के बाद जो कुछ
हुआ वो सभी सरल दिल छू लेने वाले अंदाज में बताएंगे। दरअसल यह कहानी ऋषभ और शेफाली की है। दोनों ने 11 साल पहले एक साथ कॉलेज में पढ़ते हुए। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरर कविश अजीज के मुताबिक यह कहानी है ऋषभ और शेफाली की। दोनों ने 11 साल पहले एक साथ कॉलेज में पढ़ते हुए दोस्ती की थी। धीरे-धीरे दोस्ती प्यार में बदली और दोनों ने एक दूसरे को तब
से लेकर आज तक कभी अकेला नहीं छोड़ा। शेफाली के लिए ऋषभ सिर्फ एक बॉयफ्रेंड नहीं बल्कि उसका सबसे बड़ा सपोर्ट सिस्टम था और ऋषभ के लिए शेफाली उसकी सबसे बड़ी ताकत थी। ऋषभ ने इस शादी के लिए 11 साल का इंतजार किया है। एक लंबे इंतजार के बाद ऋषभ की नौकरी लगी और फिर शेफाली से शादी हो गई। ऋषभ की जिंदगी आसान नहीं थी। बचपन से ही उसकी स्किन कॉम्प्लेक्शन को लेकर लोग कमेंट
करते थे। काला है हीरो जैसा नहीं लगता। ऐसे ताने उसे रोज सुनने पड़ते थे। लेकिन शेफाली वो हर बार उसके सामने खड़ी हो जाती और कहती मुझे तेरी रंगत नहीं तेरी नियत पसंद है। यही भरोसा था जिसने ऋषभ को मजबूत बनाया। वक्त गुजर गया, संघर्ष बढ़ता गया लेकिन उसने मेहनत नहीं छोड़ी। आज वही ऋषभ एक हैंडसम सैलरी वाली नौकरी करता है और 11 साल के
लंबे इंतजार के बाद दोनों ने शादी कर ली। लेकिन खुशी के इन पलों के बीच सोशल मीडिया ने फिर वह पुरानी आदत दिखाई। उनकी शादी की वीडियोस वायरल हुई और लोग फिर वही घटिया कमेंट करने लगे। किसी ने रंग पर तंज कसा, किसी ने उनके जोड़े को अनमैच्ड कहा। तो किसी ने ब्यूटी वर्सेस बीस्ट जैसी लाइनें लिख दी। यह सब पढ़कर ऋषभ टूट गया। वो लड़का जिसने 11 साल मेहनत की जो अपनी शादी में सिर्फ खुश होना
चाहता था। उसे फिर से उसी बात पर ताना मिला जिसने उसे बचपन से परेशान किया था। जाहिर है ऋषभ इस बार भी ट्रोलिंग से बेहद परेशान हुआ होगा। हालांकि सोशल मीडिया सिर्फ ट्र्स नहीं करता। कभी-कभी दिल भी दिखाता है। बहुत सारे लोग आ गए और बोले यह सच्चा प्यार है। लोगों ने ऋषभ और शेफाली की लव स्टोरी की तारीफ करते हुए कई सारे रिएक्शन दिए हैं। एक यूजर ने लिखा शी इज हैप्पी एंड वेरी हैप्पी। मैगज़ ने लिखा यह हैंडसम है। इफ यू थिंक हैंडसम
दिखना सिर्फ स्किन वाइट और ब्लैक होना होता है। तो आपको बहुत कुछ समझने की जरूरत है। मेजर्स ने लिखा आई डोंट थिंक पीपल आर डूइंग गुड बाय ट्रोलिंग देम। मेजर्स ने लिखा सारी लड़कियां गोल्डर्स नहीं होती। एंड नॉट एवरी मैन इज हैंडसम। सो बेसिकली आपने उसको एक पुअर और खराब लड़का दिखाया क्योंकि उसके पास कोई गवर्नमेंट जॉब नहीं और उसका कलर भी ठीक नहीं है। टेक्निकली यू आर अ गोल्ड डिगर एंड रेसिस्ट एज वेल। ने लिखा गोरी चमड़ी नहीं तो हैंडसम
नहीं। वाह बहन व्हाट स्टैंडर्ड एंड एजुकेशन शुड हैव जस्ट स्क्रोल्ड पास्ट। विकार्जन ने लिखा लोगों ने ऋषभ को उसके रंग पर ट्रोल किया जैसे उनकी खुद की जिंदगी 4K में चल रही हो। 11 साल का प्यार, मुश्किल दिनों का साथ और अब शादी लेकिन इंटरनेट आंटियां अंकल्स को बस बिल्टर चाहिए। सच्ची बात शेफाली ने रंग नहीं इंसान चुना। बाकी ट्रोलर्स अपना अकाउंट ही प्राइवेट कर लें तो बेहतर है। एक और ने लिखा आजकल किसी भी
इंसान के आलोचक ज्यादा है। जब इंसान अपनी मेहनत और धैर्य से कुछ हासिल करता है तो जलनखोर लोग आ जाते हैं उसकी आलोचना करने। बाकी भाई को दिली मुबारकबाद। तो ऋषभ और शेफाली की कहानी ये सिखाती है कि प्यार में रंग नहीं देखा जाता। खूबसूरती चेहरे की नहीं दिल की होती है और सबसे बड़ी बात जो साथी आपके मुश्किल समय में साथ खड़ा होता है वही आपका असली जीवन साथी होता है। अगर आपको ऐसी सच्ची कहानी पसंद है तो कमेंट करके जरूर लिखें।
कहानी की शुरुआत एक साधारण परिवार से होती है। उस परिवार की एक बेटी थी जिसने अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना देखा था। यूपीएससी पास करना। उसने दिन रात मेहनत की। किताबों में डूब कर पढ़ाई की। बस एक ही ख्वाहिश के साथ किसी भी तरह से एग्जाम में सफल होना है। लेकिन जब रिजल्ट आया तो वह परीक्षा पास नहीं कर पाई। यह खबर उसके लिए
किसी तूफान से कम नहीं थी। उसका आत्मविश्वास हिल गया। वह दिन रात उदास रहने लगी। अक्सर अकेले बैठकर सोचती क्या मैं वाकई इस काबिल नहीं हूं? बेटी की यह हालत देखकर उसके पिता का दिल टूट गया। वह अपनी बेटी को इस स्थिति में नहीं देख सकते थे। उन्होंने सोचा कि इसे हिम्मत देनी होगी। एक दिन पिता ने अपनी बेटी को बुलाया और कहा, बेटा चलो मेरे साथ किचन में। बेटी को समझ नहीं आया कि पापा अचानक किचन में क्यों बुला रहे हैं। लेकिन वह चुपचाप उनके
साथ चली गई। किचन में पहुंचकर उसने देखा कि गैस स्टो पर तीन बर्तन रखे हुए हैं। पहले बर्तन में पानी और अंडे थे। दूसरे बर्तन में पानी और आलू और तीसरे बर्तन में मेन पानी और कुछ कॉफी बींस। पिता ने गैस ऑन की और तीनों बर्तनों को उबलने के लिए छोड़ दिया। 5 मिनट बीते फिर 10 और फिर 20 मिनट। बेटी को अजीब लग रहा था। उसने झुंझुला कर पूछा पापा यह सब क्या कर रहे हो आप? पिता मुस्कुराए और बोले,
बस एक मिनट और फिर सब समझ आ जाएगा। थोड़ी देर बाद पिता ने गैस बंद कर दी। अब उन्होंने पहले बर्तन से आलू निकाले और एक प्लेट में रख दिए। दूसरे बर्तन से अंडे निकाले और दूसरी प्लेट में रखे। तीसरे बर्तन की कॉफी को छानकर एक कप में भर दिया। अब तीनों चीजें सामने थी। आलू, अंडे और कॉफी। पिता ने बेटी से कहा, “बताओ तुम्हें क्या दिख रहा है?” बेटी ने थोड़े गुस्से में कहा, “इसमें देखने जैसा क्या है? यह आलू है, यह अंडे हैं और यह कॉफी है। पिता ने धीरे से कहा, जरा गौर से देखो। बेटी ने आलओं को छुआ तो पाया कि वे
बिल्कुल नरम हो चुके थे। फिर अंडों को तोड़ा तो देखा कि वे अंदर से सख्त हो गए थे। अंत में जब उसने कॉफी को सूंघा तो उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। पिता ने समझाया देखो बेटा यह तीनों चीजें एक जैसे हालात में थी। तीनों को गर्म पानी यानी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन प्रतिक्रिया अलग-अलग रही। आलू पहले मजबूत थे लेकिन गर्म पानी में पड़कर कमजोर हो गए। अंडे पहले नाजुक थे लेकिन मुश्किलों
ने उन्हें अंदर से सख्त और मजबूत बना दिया और कॉफी उसने तो कमाल ही कर दिया। उसने मुश्किल हालात को बदलकर उन्हें अपने रंग और खुशबू में ढाल दिया। बेटी ध्यान से सुन रही थी। पिता ने आगे कहा, जिंदगी भी बिल्कुल ऐसी ही है। मुश्किलें हर किसी की जिंदगी में आती है। अब यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम किसकी तरह बनना चाहोगी। आलू की तरह जो कठिनाइयों में टूट जाता है। अंडे की तरह जो मुश्किलों से और मजबूत हो जाता है या फिर कॉफी की तरह जो मुश्किलों का सामना ही नहीं करता बल्कि माहौल को बदल देता है। बेटी के
चेहरे पर अब आत्मविश्वास लौट आया था। उसने पिता की ओर देखते हुए कहा पापा अब मुझे समझ आ गया है मैं मुश्किलों के सामने कभी हार नहीं मानूंगी बल्कि उनसे सीखकर और मजबूत बनूंगी और जहां जरूरत होगी मैं कॉफी की तरह अपने हालात को ही बदल दूंगी। उस दिन के बाद से उसकी सोच बदल गई। उसने अपनी असफलता को एक सीख की तरह लिया और और भी
मेहनत करने लगी। मुश्किलें कभी हमें रोकने के लिए नहीं आती बल्कि हमें यह सिखाने आती है कि हम अंदर से कितने मजबूत हैं। अगर आलू मत बनो, अंडे मत बनो बल्कि कॉफी बनो जो अपने हालात को ही बदल देते।
भारत के किसी गांव के पास एक घना और रहस्यमई जंगल था। उस जंगल में एक बहुत ही पुराने पीपल के पेड़ पर एक नन्ही सी गौरैया रहती थी। मिनी, मिनी छोटी थी। मासूम थी और सपनों से भरी हुई थी। लेकिन वो उड़ नहीं पाती थी। जंगल के बाकी पक्षी सुबह होते ही आसमान में ऊंचा उड़ते। कलाबाजियां मारते, बादलों के ऊपर निकल जाते। लेकिन मिनी वो हर किसी को
देखकर चुपचाप अपने घोंसले के कोने में बैठ जाती। उसके दिल में भी यही इच्छा थी। काश मैं भी उड़ पाती। काश मैं भी उन बादलों को छू पाती और सूरज की किरणों में नहा पाती। लेकिन जब भी वह कोशिश करने जाती उसका दिल डर से कांप उठता। जैसे ही वह अपने पंख उठाती और कूदने की हिम्मत जुटाती। तभी उसका संतुलन बिगड़ जाता और वह सीधे जमीन पर आ गिरती। जंगल के बाकी पक्षी उस पर हंसते और उससे कहते अरे तू तो उड़ ही नहीं सकती। डरपोक है तू मिनी। उनकी हंसी से मिनी की आंखों में आंसू आ जाते।
लेकिन वो कभी भी पलट कर कुछ नहीं कहती। चुपचाप सुन लेती। रात को अकेले में मिनी आसमान की ओर देखती और अपने आप से कहा करती शायद मैं कमजोर हूं। लेकिन मेरे इरादे मजबूत हैं और मुझे अपने आप पर यकीन है। अगले दिन एक रंग बिरंगी तोता उसी पेड़ पर आया। उसकी आंखों में चमक और आवाज में आत्मविश्वास झलक रहा था। उसने मिनी से कहा, गिरने से उड़ान नहीं रुकती। असली उड़ान कभी भी पंखों से नहीं होती। वो हमारे हौसलों से होती है और तेरे अंदर
वह हौसला है। याद रख असली जीत उसी की होती है जो हर बार गिरकर भी उठता है। तोते की बातों ने मिनी के दिल में एक उम्मीद की आग जलाई। उस रात वो मुस्कुराई। पहली बार उसके होठों पर विश्वास की मुस्कान थी। उसने अपने आप से कहा हां मैं फिर दोबारा कोशिश करूंगी क्योंकि मुझे अपने आप पर यकीन है। अगली सुबह ना कोई हति की आवाज थी ना ही कोई दूसरा पक्षी था। बस मिनी और उसकी इच्छा। उसने बिना किसी की परवाह किए पंख उठाए और नीचे कूद
गई। इस बार कुछ अलग हुआ। वो कुछ देर तक हवा में टिकी रही। फिर भले ही वह नीचे गिर गई लेकिन वो मुस्कुरा रही थी। उसने महसूस किया हां अब मैं उड़ रही हूं। भले ही चाहे कुछ देर दिन बीतते गए। हर दिन मिनी गिरती उठती और फिर दोबारा उड़ने की कोशिश करती। धीरे-धीरे उसकी उड़ान लंबी होने लगी। हंसी की जगह अब लोग उसकी हिम्मत देखने लगे। फिर एक दिन जंगल में तेज आंधी आई। जंगल के सारे पक्षी अपने-अपने घोंसले में छुप गए। सब डरे हुए थे। लेकिन मिनी उसने सोचा यही वो पल है जब मैं अपने आप को
साबित कर सकती हूं। वो अपने घोंसले से निकली। पंख उठाए और आंधियों के बीच उड़ चली। हवाओं से टकराई। शाकाओं से भिड़ी। कभी नीचे गिरी लेकिन हर बार ऊपर उठ खड़ी हुई। उसका हौसला डगमगाया नहीं। जब आंधी रुकी आसमान निखरा तो हर किसी ने देखा। मिनी अब आसमान के ऊपर उड़ रही थी। वही पक्षी जो कभी उसे डरपोक समझते थे। अब उसकी उड़ान देखकर चुप थे। उनकी आंखों में हैरानी और इज्जत दोनों थी। उसी तोते ने मिनी को देखा और उससे बोला, मिनी तूने अपने आप पर भरोसा किया और यही तेरी
सबसे बड़ी ताकत है। याद रख डर हर किसी को लगता है पर उड़ता वही है जो कोशिश करना नहीं छोड़ता। सालों बाद एक नन्ही चिड़िया उड़ने से डर रही थी। उसने मिनी से कहा, मैं गिर जाऊंगी इसलिए कोशिश नहीं कर रही। मिनी मुस्कुराई और उससे बोली डर तो सबको लगता है पर उड़ता वही है जो नीचे गिरने के बाद भी हार नहीं मानता। कोशिश करने से मत डरो क्योंकि कोशिश ही तुझे तेरी असली उड़ान देगी। दोस्तों गिरने से मत
डरो। तानों से अपनी हार मत मानो क्योंकि कोशिश करने वाला ही एक दिन आसमान की ऊंचाई तक
पहुंचता है। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह दूसरी कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
एक शांत गांव था। उसी गांव में एक साधारण आदमी रहता था। मोहन गांव में लोग उसे सोचू मोहन कहते थे। वजह यह थी कि वह हर बात पर बहुत सोचता था। खेत में काम करे तो सोचता, घर बैठे तो सोचता। यहां तक कि किसी से बात भी करे तो बाद में घंटों उसके शब्दों के बारे में सोचता रहता। गांव वाले हंसकर कह दे। अरे इसे कोई काम मत देना। यह 2 घंटे सिर्फ सोचता ही रहेगा। करेगा कुछ नहीं। मोहन की यही सबसे बड़ी समस्या थी। वह जीवन को बहुत ही मुश्किल मानता था। फसल
अच्छी हो या बेकार, घर में झगड़ा हो या सुकून उसे हर चीज बस बोझ ही दिखाई देती। वो अक्सर अपने आप से पूछता क्यों जिंदगी इतनी मुश्किल है? क्यों मैं चैन से नहीं जी सकता? एक साल की मेहनत के बाद जब मोहन की फसल तैयार हुई तो अचानक ही उस पर कीड़ों ने हमला कर दिया। महीनों का पसीना, मेहनत सब मिट्टी में मिल गया। मोहन का दिल टूट गया। घर लौटकर उसने अपनी पत्नी से कहा, अब मैं और नहीं कर सकता। जिंदगी मुझसे संभलती नहीं है। हर चीज
मुझे भारी लगती है। उसकी पत्नी ने धीरे से उत्तर दिया, “अगर तुम्हें इसका जवाब ढूंढना है, तो दूसरों से मत पूछो। या तो अपने आप से पूछ कर देखो या फिर किसी ऐसे से जो जिंदगी को सच में समझ गया हो।” उस रात मोहन देर तक जागता रहा। उसकी आंखों में अचानक एक नाम चमका। गौतम बुद्ध उसे बचपन में दादी की कहानियां याद आई। कैसे बुद्ध राजमहल त्याग कर
सच्चाई की तलाश में निकल गए थे। मोहन को पता चला कि पास के पहाड़ों के नीचे एक विशाल पीपल का पेड़ है। जहां पर एक महात्मा साधु ध्यान करते हैं। लोगों का यह मानना था कि उन्होंने बुद्ध से ही सीख ली है। मोहन ने यह ठान लिया। अगर कहीं जवाब मिलेगा तो उसी महात्मा के पास मिलेगा। सुबह सूरज निकलते ही उसने सर पर पगड़ी बांधी और निकल पड़ा। रास्ता आसान नहीं था। कांटे, पथरीले पत्थर, धूप लेकिन उसके अंदर
की बेचैनी इन सब मुश्किलों से आगे थी। दोपहर ढल रही थी जब वह आखिरकार उस पीपल के पेड़ के नीचे पहुंचा। वहां पर एक साधु शांत भाव से ध्यान में बैठे थे। उनके चेहरे से शांति टपक रही थी। ना उनके पास कोई वस्तु थी, ना कोई शिष्य, बस गहरी निरवता। मोहन कुछ देर तक बैठा रहा। फिर हिम्मत जुटाकर उनसे बोला, महात्मा जी, मैं एक सवाल लेकर आया। साधु ने आराम से अपनी आंखें खोली और मुस्कुराते हुए मोहन से कहा, “तुम सवाल लेकर नहीं जवाब की तलाश में यहां पर
आए हो। बोलो।” मोहन नीचे बैठ गया। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा जिंदगी मुझे बहुत मुश्किल लगती है। छोटी-छोटी बातें बहुत परेशान करती हैं। रिश्ते टूटते हैं। लोग बदल जाते हैं। मेहनत का हक नहीं मिलता। क्या यही जीवन है? साधु ने मुस्कुरा कर जमीन से एक हल्का सा पत्थर उठाया और बोले, “इसे हाथ में लो।” मोहन ने वो पत्थर उठा लिया। फिर साधु बोले, अब मुट्ठी कसकर बंद करो और इसे जोर से दबाओ।” मोहन
ने वैसा ही किया। 1 मिनट बाद फिर साधु ने पूछा क्या महसूस हो रहा है? मोहन बोला हल्का दर्द हो रहा है। हाथ में झनझनाहट है। साधु ने कहा क्यों? क्योंकि तुमने इस हल्के से पत्थर को कसकर पकड़ा है। यही जिंदगी की हकीकत है। जीवन मुश्किल नहीं होता बल्कि हम उसकी छोटी-छोटी बातों को कसकर पकड़े रहते हैं। जैसे ही तुम इस पत्थर को अपने हाथ से निकाल दोगे, दर्द भी चला जाएगा और तुम्हारा बोझ भी। मोहन जैसे जाग गया। वापस लौटते हुए रास्ते में उसने हर वस्तु को
हल्के में लेना शुरू किया। सूखे पत्ते, धूप की किरण, हवा सब में उसको सुंदरता दिखने लगी। गांव पहुंचा तो उसकी पत्नी ने पूछा, कोई जवाब मिला? मोहन ने मुस्कुरा कर बस इतना कहा। अब मैंने अपने हाथ से पत्थर निकाल लिया है। धीरे-धीरे लोगों ने उसके अंदर बदलाव देखने शुरू किए। अब वह शिकायत नहीं करता था। अगर उसकी फसल बेकार होती तो कहता इस बार मिट्टी को आराम की जरूरत थी। अगर कोई उसे ताना मारता तो वह बस मुस्कुरा देता। लोग हैरान होते। यही वो मोहन है जो पहले हर बात पर दुखी हो जाता था।
अब हर चीज को स्वीकार कर रहा। अब मोहन हर शाम गांव के परगद के नीचे बैठता। कोई भी परेशान होकर वहां से गुजरता तो मोहन बस उससे एक ही बात कहता। जिंदगी की सारी उलझनें मुट्ठी में दबे पत्थर जैसी होती है। बस उसे हाथ से निकालना सीखो। दोस्तों, इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है। जिंदगी मुश्किल नहीं है। हम ही उसे अपने विचार और परेशानियों से मुश्किल बना देते हैं। ज्यादा सोचना बंद करो और हल्का जीना सीखो। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है, तो आपको यह दूसरी कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसने अनगिनत असफलताओं का सामना किया। एक ऐसे लड़के की जो बचपन में अखबार बेचा करता था जो अपनी क्लास में सबसे पीछे बैठता था। लेकिन उसी लड़के ने आगे चलकर इंडिया को मिसाइल्स की ताकत दी। देश का सबसे अच्छा वैज्ञानिक और अंत में राष्ट्रपति बना। हम
बात कर रहे हैं एपीजे अब्दुल कलाम की। अब्दुल कलाम का जन्म अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। अब्दुल कलाम बहुत ही साधारण परिवार से थे। उनका बचपन बहुत सरल था। उनके पिता नाव चलाते थे और उनकी मां घर पर काम किया करती थी। अब्दुल कलाम का परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए कई बार उनके घर में ऐसा होता था कि भरपेट खाना नहीं हो
पाता था। लेकिन यह गरीबी अब्दुल कलाम के सपनों को नहीं दबा सकी। स्कूल जाने से पहले वह अखबार बांटते थे ताकि स्कूल की फीस निकल सके। सुबह जल्दी उठना, मंदिर के पास बैठे बूढ़े आदमी से अखबार की गड्डी लेना, फिर गलियों में दौड़ लगाकर अखबार डालना। यही उनकी रोजमर्रा की जिंदगी थी। लेकिन इन सब मुश्किलों के बावजूद अब्दुल कलाम के मन में आसमान को लेकर एक अजीब सा आकर्षण होता रहता। एक
बार अब्दुल कलाम के स्कूल टीचर पक्षियों के उड़ने का सिद्धांत समझाने के लिए सभी बच्चों को नदी तट पर ले गए। वहां पर उड़ते हुए पक्षियों को देखकर सभी बच्चों को उड़ने का सिद्धांत सिखाया। उन बच्चों में अब्दुल कलाम भी थे। उड़ते हुए पक्षियों को देखकर ना जाने अब्दुल कलाम के मन में क्या भावना पैदा हुई और उस दिन उन्होंने मन बना लिया कि एक दिन वह भी उड़ेंगे। स्कूल के बाद उन्होंने सेंट जोसेफ से फिजिक्स में पढ़ाई
की। अब्दुल कलाम अच्छे कॉलेज में पढ़ना चाहते थे। उनका उत्साह देखकर उनकी बड़ी बहन ने अपने गहने गिरवी रखकर कॉलेज की फीस भरी और फिर अब्दुल कलाम अपनी आंखों में आंसू लिए एमआईटी पहुंचे। लेकिन यहां पर उनकी असल परीक्षा शुरू हुई। उस कॉलेज में रहना खाना बहुत महंगा था। अब्दुल कलाम कभी-कभी भूखे रहकर पढ़ाई किया करते थे। एक बार वह कोई प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर पाए और उन्हें उस
कॉलेज से निकाल देने की धमकी मिली। अब्दुल कलाम इतना डर गए कि उस रात उन्होंने बिना सोए वो प्रोजेक्ट बनाया और अगले दिन सबको चौंका दिया और उन्हें यह बताया कि वह कुछ कर सकते हैं। डिग्री के बाद उन्होंने एयरफोर्स में पायलट के लिए अप्लाई किया। अब्दुल कलाम ने सोचा कि यहां से उनका सपना पूरा हो जाएगा। लेकिन किस्मत ने उन्हें एक बड़ा झटका दिया। अब्दुल कलाम नौवें स्थान पर आए और केवल आठ
लोग सिलेक्ट होने थे। उनका सपना वहीं टूट गया। कई दिनों तक अब्दुल कलाम अकेले उदास बैठे रहे। लेकिन फिर उन्होंने अपने आप से कहा, शायद मुझे एक बार और कोशिश करनी चाहिए। इस असफलता ने अब्दुल कलाम को इसरो की तरफ मोड़ दिया। यहीं से इंडिया की मिसाइल यात्रा शुरू हुई। इसरो में पहुंचकर उन्होंने एसएलवी प्रोजेक्ट संभाला। इंडिया का फर्स्ट सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल। उन्होंने इस प्रोजेक्ट के लिए दिन रात मेहनत की। कई रातें जागकर अब्दुल कलाम ने
एसएलवी को पंख दिए। लेकिन जब इसकी टेस्टिंग हुई तो सेटेलाइट ब्लास्ट हो गई। अब्दुल कलाम की महीनों की मेहनत कुछ ही सेकंड में बर्बाद हो गई। यह उनके लिए एक बड़ा झटका था। कुछ दिन तक अब्दुल कलाम ऑफिस नहीं गए। इसरो की इस हार पर पूरा इंडिया हंसने लगा। लेकिन अब्दुल कलाम ने अपने आप को संभाला और अपनी टीम को टूटने नहीं दिया। उन्होंने कहा असफलता मुझ पर काबू नहीं पा सकती जब तक मेरी लगन मजबूत है। कई महीनों की मेहनत के बाद
अब्दुल कलाम ने फिर सेटेलाइट तैयार किया और फिर 1980 में वो दिन आया जिसने इतिहास बदल दिया। एसएलवी ने रोहिणी सेटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इंडिया अब उन देशों में शामिल हो गया था जिन्होंने अपनी सेटेलाइट ल्च की थी। हर अखबार ने लिखा कि इंडिया में अब मिसाइल पैदा हो चुकी है। इसके बाद कई असफलताओं के बाद अब्दुल कलाम ने अग्नि, पृथ्वी, त्रिशूल जैसी मिसाइलें ल्च की और दुनिया ने अब्दुल कलाम को नाम दिया मिसाइल मैन। 1998 में आया पोखरण टेस्ट। अमेरिकी सेटेलाइट के बीच से
बचकर इंडिया ने अपने एटॉमिक वेपन को टेस्ट करके दुनिया को चौंका दिया। धरती हिल गई और दुनिया समझ गई कि भारत चुप ना बैठने वाला देश है। इस ऑपरेशन के पीछे का दिमाग था एपीजे अब्दुल कलाम। 2002 में देश ने अखबार बेचने वाले उस बच्चे को इंडिया का राष्ट्रपति बनने का मौका दिया। लेकिन राष्ट्रपति होकर भी वो वही सरल इंसान था। बच्चों से मिलना, उन्हें सपने दिखाना, उनकी मुश्किलें आसान करना और अपनी किताबें लिखना यह सब उनका
रूटीन बन गया। अब्दुल कलाम कहा करते थे अगर आप सूरज की तरह चमकना चाहते हैं तो पहले उसकी तरह जलना सीखिए। 27 जुलाई का वो दिन जब वो आईएम शिलांग में लेक्चर दे रहे थे। तभी वह मंच पर गिर पड़े और कुछ ही मिनटों में दुनिया ने अपना सबसे बड़ा प्रेरक, सबसे बड़ा वैज्ञानिक और एक अच्छा इंसान खो दिया। लेकिन उन्होंने जाते-जाते हम सबको एक
चीज सिखाई कि जीवन की असली उड़ान गरीबी और मुश्किलों से नहीं रुकती। अब्दुल कलाम की जिंदगी हमें बताती है कि अगर एक गरीब नावचालक का बेटा अखबार बेचते-बेचते इंडिया का मिसाइल मैन बन सकता है तो इस दुनिया में हम भी कुछ कर सकते है।
भारत के एक हरेभरे गांव में रमेश नाम का किसान रहता था। रमेश मेहनती था, ईमानदार था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी। वह हमेशा पुराने तरीकों से ही खेती करता था। उसके पिताजी ने जिस तरह हल चलाया था, जिस तरह बीज बोए थे, रमेश आज भी वही तरीके अपनाता था। हर दिन वह सुबह सूरज उगने से पहले अपने खेतों में पहुंच जाता। बैलों से हल चलाता, हाथ से बीज बोता और पूरे दिन पसीना बहाता। लेकिन असली
समस्या यह थी कि दुनिया अब बदल चुकी थी। उसके आसपास के किसान नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे थे। ट्रैक्टर, मोटर, ड्रिप इरीगेशन, अच्छी क्वालिटी के बीज। उससे उनकी फसलें भी ज्यादा होती, मेहनत भी कम लगती और आमदनी भी अच्छी होती। रमेश यह सब देखकर भी अनदेखा कर देता। वो कहता, “मेरे पिताजी ने यही तरीके अपनाए थे। मैं भी इन्हें ही अपनाऊंगा। मशीन पर भरोसा करके किसानी का
असली मजा नहीं आता। उस गांव के और किसान धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। लेकिन रमेश उसी जगह अटका हुआ था। उसकी हालत ऐसी हो गई थी कि परिवार का गुजारा भी मुश्किल होने लगा। एक दिन गांव में एक नौजवान आया। उसका नाम अर्जुन था। वो शहर से पढ़ाई करके लौटा था। अर्जुन ने देखा कि रमेश अब भी बैलों से ही हल चला रहा है। अर्जुन ने मुस्कुरा कर कहा, “अरे चाचा, आप भी पुराने तरीकों से ही किसाने कर रहे हो।” क्यों ना आप एक ट्रैक्टर किराए पर ले लें। इससे आपका समय भी बचेगा और आपकी पैदावार भी
बढ़ेगी। रमेश ने हंसते हुए कहा, “अरे बेटा, यह सब दिखावा है। असली किसानी तो पसीना बहाने से होती है। मशीनों में वह आत्मा कहां जो किसान अपने हाथ से काम करने में लाता है।” अर्जुन ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसने मन बना लिया कि रमेश को समय के साथ आगे बढ़ना जरूर सिखाएगा। अगले दिन अर्जुन ने रमेश को अपने घर बुलाया और फिर उन्हें खेतों पर ले गया। वहां उसने रमेश को दिखाया कि कैसे सिर्फ 2 घंटे में ट्रैक्टर से पूरा खेत जोत दिया जाता है जो रमेश अकेले अपने बैल
से 2 दिन में करता। उसने दिखाया कि नई तकनीक की मदद से पानी की बर्बादी नहीं होती और अच्छी क्वालिटी की फसल भी मिलती है। रमेश हैरान रह गया। उसे लगा कि सचमुच मेहनत तो वही है लेकिन नतीजा कितना अलग है। अर्जुन ने समझाया चाचा समय बदल गया है। बदलते वक्त के साथ हमें भी बदलना पड़ता है। वरना हम पीछे रह जाते हैं। मेहनत जरूरी है लेकिन अकल और मेहनत को मिलाना भी जरूरी है। रमेश को पहली बार महसूस हुआ कि उसकी ज़िद ही उसे गरीबी की तरफ
धकेल रही थी। आखिरकार रमेश ने अपनी सोच बदली। उसने पहली बार ट्रैक्टर किराया पर लिया। अच्छी क्वालिटी के बीज भी खरीदे और नई सिंचाई तकनीक अपनाई। नतीजा यह हुआ कि उसकी फसल और दो गुना बढ़ गई। उसका परिवार भी खुशहाल था। गांव वाले हैरान थे कि रमेश जैसे जिद्दी किसान ने आखिरकार किस तरह बदलाव को अपना लिया। रमेश अब हर
किसी से कहता मेरे दोस्तों मेहनत करो लेकिन समय के साथ बदलो। अगर हम अब भी पुराने तरीकों से ही चिपके रहेंगे तो जिंदगी आसान नहीं होगी। बदलाव ही जीवन का नियम है। उस दिन से रमेश की सोच बदल गई। वो गांव के और किसानों को भी समझाने लगा। समय के साथ आगे बढ़ना सीखो। यही असली सफलता है। दोस्तों, समय के साथ आगे बढ़ो। तभी हमारा जीवन
आसान और सफल बनता है। जो समय के साथ बदलता है वही आगे बढ़ता है। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
कभी एक समय था जब कपिलवस्तु नगरी का राजकुमार सिद्धार्थ अपने वैभव और सुख सुविधाओं के लिए प्रसिद्ध था। महल के दरवाजे सोने से बने थे और सेवक हमेशा आदेश की प्रतीक्षा में खड़े रहते थे। राजकुमार सिद्धार्थ एक सुंदर बुद्धिमान और करुणामय युवक जिसकी मुस्कान से पूरा महल जगमगा उठता था। लेकिन इस चमकदमक के बीच कहीं ना कहीं उनके
भीतर एक खालीपन था। एक ऐसा प्रश्न जो उन्हें हर दिन परेशान करता था। क्या यही जीवन का सच्चा उद्देश्य है? क्या केवल सुख सुविधा में जीना ही जीना है? राजा शुद्धोधन उनके पिता नहीं चाहते थे कि सिद्धार्थ का मन सन्यास की ओर जाए। उन्होंने अपने बेटे को दुनिया के दुखों से दूर रखने के लिए हर मनोरंजन और हर खुशी उसके आसपास सजाई। महल के बाहर क्या है? यह
सिद्धार्थ को कभी देखने नहीं दिया गया। लेकिन नियति को कौन रोक सकता है? एक दिन जब सिद्धार्थ अपने रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकले तो उन्होंने पहली बार जीवन की कठोर सच्चाई देखी। रास्ते में उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा। झुकी हुई कमर, कांपते हुए हाथ और चेहरे पर थकान की लकीरें। सिद्धार्थ ने सारथी से पूछा, “यह क्या है?” सारथी बोला, “यह बुढ़ापा है राजकुमार।” हर मनुष्य को एक दिन बूढ़ा होना पड़ता
है। सिद्धार्थ स्तब्ध रह गए। पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि यौवन सदा नहीं रहता। कुछ दिन बाद उन्होंने फिर बाहर जाने की अनुमति मांगी। इस बार उन्होंने देखा एक बीमार व्यक्ति जो दर्द से करा रहा था। सिद्धार्थ का दिल पसीज गया। उन्होंने पूछा क्या हर व्यक्ति बीमार पड़ सकता है? सारथी ने सिर झुकाकर कहा, हां राजकुमार यह जीवन का हिस्सा है। तीसरी बार उन्होंने देखा एक
मृत व्यक्ति जिसे चार लोग कंधे पर उठाकर श्मशान की ओर ले जा रहे थे। सिद्धार्थ की आंखें नम हो गई। उन्होंने धीरे से पूछा, क्या मृत्यु सबको आती है? सारथी ने उत्तर दिया, हां राजकुमार चाहे राजा हो या रंक मृत्यु से कोई नहीं बच सकता। उस रात सिद्धार्थ बहुत देर तक सो नहीं पाए। उनके मन में बस एक ही प्रश्न गूंजता रहा। यदि जीवन का अंत मृत्यु है तो फिर इसका अर्थ क्या है? और फिर एक दिन जब उन्होंने एक साधु को देखा शांत चेहरा
ना कोई भय ना कोई लालच। बस एक असीम शांति। सिद्धार्थ ने सोचा शायद यही मार्ग है सच्ची शांति का, सच्चे अर्थों में जीवन का। उस रात जब पूरा महल नींद में था। सिद्धार्थ ने एक निर्णय लिया। एक ऐसा निर्णय जिसने इतिहास बदल दिया। उन्होंने अपने नवजात पुत्र राहुल को अंतिम बार देखा। पत्नी यशोधरा की ओर प्यार भरी निगाह डाली। और बिना कुछ कहे चुपचाप महल के द्वार से निकल गए। उनके साथ केवल एक वस्त्र और
एक संकल्प था। सत्य की खोज का संकल्प वो चल पड़े। जंगलों, पहाड़ों और नदियों के बीच भोजन की तलाश में नहीं बल्कि सत्य की तलाश में। उन्होंने कठोर तपस्या की। वर्षों तक भोजन और सुख का त्याग किया। लेकिन उन्हें अभी भी वो उत्तर नहीं मिला जिसकी उन्हें तलाश थी। एक दिन निराश होकर वह बोधगया के पास एक पीपल वृक्ष के नीचे बैठ गए। उन्होंने मन ही मन कहा
जब तक सत्य नहीं मिलेगा। मैं यहां से नहीं उठूंगा। दिन बीतते गए, ध्यान गहराता गया और एक रात जब चारों ओर सन्नाटा था। उन्होंने उस सत्य को पा लिया जिसकी उन्हें वर्षों से खोज थी। वो क्षण वही था जब सिद्धार्थ बुद्ध बने। जागे हुए व्यक्ति। अब उन्हें समझ आ गया था। दुख का कारण इच्छा है और शांति का मार्ग त्याग में है। उन्होंने सीखा कि जब मन से लालच, क्रोध और मोह मिट जाता है तभी सच्चा आनंद मिलता है। उस दिन के बाद उन्होंने अपना जीवन दूसरों को सिखाने में लगा
दिया। उन्होंने कहा सुख बाहर नहीं तुम्हारे भीतर है। जो स्वयं को जीत लेता है वही सच्चा विजेता है। लोग उन्हें गौतम बुद्ध कहने लगे। एक सम्राट जिसने अपने भीतर का राज्य पाया था। उनकी शिक्षा ने पूरी दुनिया को बदल दिया। राजा से लेकर आम इंसान तक हर किसी ने सीखा। जीवन का उद्देश्य सिर्फ जीना नहीं बल्कि समझ कर जीना है। सम्राट से साधु बनने की यात्रा हमें यह
सिखाती है कि असली सुख, धन, दौलत या वैभव में नहीं बल्कि आत्मिक शांति और आत्मबोध में है। जब हम बाहरी चीजों की तलाश छोड़कर भीतर झांकते हैं, तभी हमें सच्ची स्वतंत्रता मिलती है।
ऐसा लड़का जिसने 12 साल की उम्र में पिता को खो दिया। इतनी सी उम्र में पूरे घर का बोझ उसके कंधों पर आ गया। कैसे उसने इतनी गरीबी से करोड़ों का साम्राज्य बनाया। तो चलिए जानते हैं अमन की कहानी। छोटे से गांव से लेकर करोड़ों की सफलता तक की यात्रा। बिहार के छोटे से गांव में अमन नाम का लड़का रहता था। उसके पिता एक साधारण किसान थे जो दिन रात
मेहनत करते हुए भी अच्छे पैसे नहीं कमा पा रहे थे। अमन की मां दूसरों के घर में काम करके कुछ रुपए कमाती थी। घर में तीन बच्चे थे और अमन सबसे बड़ा था। अमन की उम्र बस 11 साल की थी जब एक दिन उसके पिता खेत से घर लौटे और अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा। गांव में अच्छा इलाज नहीं था और उसी रात अमन के पिता का निधन हो गया। घर में मातम का
माहौल था। अमन की मां ने रोते हुए कहा, “अमन, तू ही अब घर का सहारा है। बेटा।” अमन की आंखों में आंसू थे लेकिन उसके दिल में एक अजीब सी आग जल रही थी। उसने अपनी मां से कहा मां मैं पढ़ाई नहीं करूंगा। अब मुझे कोई अच्छा सा काम करना है। पर अमन की मां ने मना कर दिया। नहीं बेटा पढ़ाई मत छोड़ना। मैं दिन रात काम करूंगी और घर संभाल लूंगी। लेकिन अमन जानता था कि सिर्फ मां की मेहनत से घर नहीं
चल सकता। वो अक्सर यह सोचा करता अगर मैं कुछ अच्छा कर पाऊं तो शायद मां की तकलीफें कम हो जाए। एक दिन उसने गांव के किसी व्यक्ति से सुना कि दिल्ली में काम आसानी से मिल जाता है। बस उसी पल उसने फैसला कर लिया। उसने गांव के एक आदमी से कुछ रुपए उधार लिए। छोटे से बैग में दो जोड़े कपड़े डाले और ट्रेन पकड़ ली। जब वो अपने घर से निकला तो मां की आंखों में आंसू थे। मां बार-बार बस एक ही बात कह रही थी। जल्दी लौट आना बेटा। और अमन ने
मुस्कुराते हुए कहा, “मां जब लौटूंगा ना, तो सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी।” दिल्ली पहुंचकर अमन के सपनों से ज्यादा परेशानियां उसका इंतजार कर रही थी। ना कोई ठिकाना, ना जान पहचान। रात को उसे स्टेशन पर ही सोना पड़ा। जब सुबह उठा, तो जेब में केवल ₹10 बचे थे। भूख लगी थी लेकिन उसने अपने आप से कहा, “अगर अगर यह ₹10 भी खर्च कर दिए, तो कल क्या करूंगा?” वो स्टेशन के पास घूमने लगा। तभी उसने देखा कि लोग हर जगह चाय पी रहे हैं। अमन सोचने लगा अगर यहां इतनी भीड़ है तो क्यों ना मैं भी चाय
बेचने का काम शुरू करूं। उसने आसपास के चाय वालों से पूछा। भैया अच्छी चाय कैसे बनाते हैं? दुकानदार ने हंसकर कहा, “अबे बच्चे, यह कोई मजाक नहीं है।” अमन बोला, “भैया, जरूरत है। सीखना चाहता हूं।” उस दिन अमन ने ₹10 में चीनी, थोड़ी चाय पत्ती और हल्का दूध खरीदा। उसने किसी से टूटा हुआ बर्तन मांगा और उसी में पहली बार चाय बनाई। पहली बार चाय बनाते समय अमन का हाथ जल गया। दूसरी बार उसकी चाय में नमक पड़ गया। लेकिन तीसरी बार अच्छी चाय बनी। मीठी चाय बनी। उसने किसी चाय वाले से पुरानी केतली मांगी और स्टेशन पर निकल पड़ा। गरम चाय, गरम
चाय। पहले ग्राहक ने चाय पी और अमन को ₹3 दिए। अमन की आंखों में ऐसी चमक आई जैसे उसने करोड़ों रुपए कमा लिए हो। शुरुआत के दिन आसान नहीं थे। कभी दूध कम पड़ जाता, कभी चाय जल जाती। कभी अमन पूरे दिन में सिर्फ ₹30 ही कमा पाता था। रात को स्टेशन पर ही सोना पड़ता था। एक दिन बरसात में भीगते हुए उसने अपने आप से कहा, शायद मैंने गलती कर दी। उसने घर फोन किया। मां ने पूछा तू कैसा है अमन? अमन ने झूठी मुस्कान के साथ कहा, बहुत अच्छा हूं मां तू फिक्र मत करना। लेकिन फोन रखने के बाद उसकी आंखों में आंसू थे। उस रात अमन ने अपने आप से वादा किया मैं हार नहीं मानूंगा। जो भी हो मैं
सफल बनकर दिखाऊंगा। धीरे-धीरे लोग अमन को पहचानने लगे। स्टेशन के यात्री कहते अरे वो मुस्कुराने वाला चाय वाला आ गया। अमन हमेशा हर ग्राहक से मुस्कुरा कर बोलता धन्यवाद सर। फिर आइएगा। लोगों को उसका व्यवहार अच्छा लगता। कुछ महीनों बाद एक ऑफिस के कर्मचारी ने उससे कहा, “अरे भाई, रोज हमारे ऑफिस में आकर चाय दे दिया कर। हम रोज तुझे पैसे दे देंगे।” यह अमन के लिए एक अच्छा मौका था। अब उसकी रोज की कमाई ₹200 ₹300 तक आ गई थी। उसने छोटा सा कमरा किराए पर लिया और चाय
बेचने के लिए स्टॉल भी खरीदा। लेकिन अमन इस चीज से अनजान था कि एक बहुत बड़ा मौका उसका इंतजार कर रहा है। एक दिन बड़ी कंपनी का ड्राइवर अमन के यहां चाय पीने आया। उसने अमन की चाय पी और उससे बोला साहब कह रहे हैं कि तुम बहुत अच्छी चाय बनाते हो। वो तुमसे मिलना चाहते हैं। अमन कुछ घबराया लेकिन वो हिम्मत जुटाकर मिलने चला गया। साहब ने पूछा अरे बेटा तुम कहां से हो? अमन ने सब कुछ ईमानदारी से बता दिया। साहब बोले वाह तुम बहुत हिम्मत वाले लड़के हो बेटा। मैं तुम्हारी मदद करना
चाहता हूं। मैं बड़ी कंपनी चलाता हूं। तुम मेरी कंपनी में आकर अपनी चाय बेचो। रोज तुम्हें 200 आदमियों के लिए दो टाइम चाय बनानी है। अमन को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। 200 लोगों के लिए रोज दो वक्त चाय बनाना। अमन के लिए यह किसी सपने की तरह था। अमन ने हां कह दी। उसने दो लड़के रखे, बड़े बर्तन खरीदे और पूरी मेहनत से काम शुरू किया। धीरे-धीरे उसके पास और भी कंपनियों के ऑर्डर आने लगे। अब अमन अपने आप को एक बिजनेसमैन की तरह देखने लगा। उसने अपने काम का नाम रखा अमन टी सर्विस।
2 साल बाद अमन ने एक बड़ी दुकान खोली। अब उसके साथ 10 लोग काम करते थे। वो सिर्फ चाय नहीं बल्कि नाश्ता भी बेचने लगा। एक दिन अमन को नया आईडिया आया। क्यों ना मैं अपनी चाय को पैकेट में बेचना शुरू करूं। उसने मार्केट रिसर्च की और पाया कि लोग अपने घर के लिए अच्छी क्वालिटी की चाय ढूंढते हैं। अमन ने एक मशीन खरीदी और अपनी चाय को नाम दिया अमन स्पेशल टी। धीरे-धीरे उसकी पैकेट वाली चाय लोगों के बीच मशहूर हो गई। एक दिन बड़े मॉल के मैनेजर ने अमन से बात की और उससे कहा, “हें हर महीने
5,000 पैकेट चाहिए।” अमन को यकीन नहीं हुआ। उसने तुरंत छोटी सी फैक्ट्री का इंतजाम किया और 50 लोगों को नौकरी दी। अब उसकी हर महीने की कमाई 10 लाख तक पहुंच गई थी। सब कुछ अच्छा चल रहा था। लेकिन उसी वक्त अमन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई। डॉक्टर्स ने कहा ऑपरेशन करना पड़ेगा और ₹1 लाख लगेंगे। अमन के पास इतने पैसे नहीं थे। सारे पैसे उसने बिजनेस में लगा दिए थे। उसने अपनी कुछ मशीनें बेची और मां का इलाज कराया। जब मां का ऑपरेशन हो गया तो अमन ने उन्हें दिल्ली बुला लिया। जब अमन की मां ने उसकी फैक्ट्री देखी तो उनकी
आंखों से आंसू बह निकले। आज अमन 28 साल का है और उसकी कंपनी अमन टी कॉरपोरेशन का हर साल का टर्नओवर 20 करोड़ है। तीन फैक्ट्रियों में 300 से अधिक वर्कर्स हैं। अब अमन की चाय 12 राज्यों में बिकती है और उसने ऑनलाइन बिजनेस भी शुरू कर दिया है। लेकिन आज भी जब वो अपनी फैक्ट्री में जाता है तो सबसे पहले खुद चाय बनाता है और यह कहता है कि यह चाय मुझे याद दिलाती है कि मैं कहां से आया था। पिछले साल अमन जब अपने गांव लौटा तो गांव वालों को यकीन नहीं हुआ कि यह वही लड़का है जो
कभी हमसे कुछ रुपए उधार लेकर गया था। दोस्तों जब आप अगली बार चाय पिए तो अमन की कहानी जरूर याद कीजिएगा क्योंकि जब एक गरीब लड़का ₹10 से शुरुआत करके करोड़ों तक पहुंच सकता है तो आप भी अपने सपने पूरे कर सकते हैं। हर बड़ी सफलता की शुरुआत सिर्फ एक ही कदम से होती है। बस आपको जरूरत है हिम्मत की, खुद पर विश्वास की और अटूट मेहनत की। और हां अगर आपको यह कहानी पसंद आई है तो आपको यह दूसरी कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।
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