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  • कुछ तो लोग कहेंगे | Everyone Judges You – Real moral in hindi kahani

    किसी ने सही कहा है। कुछ तो लोग कहेंगे। यह कहानी इन्हीं पंक्तियों की सच्चाई दिखाती है। बहुत समय पहले एक बूढ़े आदमी ने नया घोड़ा खरीदा था। वो और उसका बेटा अक्सर इसी घोड़े पर सवार होकर गांव-गांव जाया करते थे। एक दिन उसने अपने बेटे के साथ उस गांव से दूर लंबी यात्रा पर जाने का फैसला किया। बूढ़ा आदमी होने के कारण उसने खुद घोड़े की सवारी की और अपने

    बेटे को बगल में चलने को कहा। कुछ दूर चलने के बाद रास्ते में उन्हें एक युवक मिला। युवक ने कहा, यह आदमी अपने बेटे से प्यार नहीं करता। खुद तो घोड़े पर सवार है और बेचारे बेटे को पैदल चला रहा है। यह सुनकर बूढ़ा आदमी घोड़े से उतर गया और अपने बेटे को उस घोड़े पर बैठा दिया और खुद घोड़े के बगल में चलने लगा। कुछ दूर चलने के बाद उन्हें एक बूढ़ी औरत मिली। बूढ़ी औरत ने उन्हें देखा और उस बेटे की

    आलोचना करते हुए कहा, “यह लड़का कितना निर्दयी और असभ्य है। यह घोड़े पर सवार है और अपने बूढ़े पिता को पैदल चला रहा है। बाप बेटे को लगा कि दोनों का साथ में सवारी करना ही उचित रहेगा। इससे यह धारणा बनेगी कि वह एक दूसरे की परवाह करते हैं। इस तरह दोनों घोड़े पर सवार होकर अपनी यात्रा पर निकल पड़े। कुछ समय बाद वो नजदीक के गांव से गुजरे। उस गांव में एक बड़े अस्तबल के पास कुछ लोग बैठे थे।

    अस्तबल के आसपास बैठे उन लोगों ने जब दोनों को उस घोड़े की सवारी करते हुए देखा तो वह हंसने लगे। उनमें से एक आदमी उनके पास आया और बोला तुम दोनों इस घोड़े पर सवार होकर इसे क्यों तड़पा रहे हो? तुम दोनों ने इस पर इतना वजन क्यों डाल रखा है? बाप बेटे को यह सुनकर दुख हुआ। तो बेटे ने कहा, अब हम इस घोड़े को आराम देंगे और बिना सवारी किए ही इसे ले जाएंगे। इतना कहकर वह दोनों उस घोड़े से उतर गए और पैदल चलने लगे और उनका घोड़ा उनके पीछेछे

    आने लगा। कुछ दूर आगे जाकर उन्हें आदमियों का एक और समूह मिला। उस आदमी और उसके बेटे को बिना सवार हुए जाता देखकर वह आदमी हंसने लगे। उन आदमियों में से एक आदमी उनके पास आया और यह बोला, “तुम दोनों कितने मूर्ख हो। इतना अच्छा घोड़ा होने के बावजूद भी पैदल चल रहे हो। यह सुनकर वह आदमी और उसका बेटा असमंजस में पड़ गए। अब वह इस घोड़े का क्या करें? आगे चलकर एक ऋषि रहते थे। उस व्यक्ति ने उनसे सलाह लेने का निर्णय लिया। ऋषि

    से मिलने पर उसने सारी घटना बताई तो ऋषि ने मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति से कहा तुम्हें दूसरों की टिप्पणियों की चिंता नहीं करनी चाहिए। लोग हर चीज को अपने अनुभव के आधार पर देखते हैं। जब आप घुड़सवारी कर रहे थे और आपका बेटा पैदल चल रहा था तो उस युवक ने आपको दोषी ठहराया। इस युवक को उसके पिता ने बहुत मेहनत करवाई थी। इसलिए उसे आपके बेटे पर भी दया आई। जब आपका बेटा घोड़े पर सवार था और आप पैदल चल रहे थे तो बूढ़ी औरत ने

    आपके बेटे पर आपको पैदल चलाने का आरोप लगाया। इस औरत का अपना बेटा आज्ञाकारी नहीं था। इस कारण उस बूढ़ी औरत को लगा कि आपका बेटा भी उसके अपने बेटे जैसा ही निर्दयी है। अस्तवल के पास खड़े लोग जिन्होंने आप दोनों पर घोड़े पर वजन डालने का आरोप लगाया था। वह सारे लोग घोड़े के व्यापारी थे। उन्हें लगा कि आपका घोड़ा ज्यादा वजन के कारण मर जाएगा। और वह लोग जिन्होंने घोड़े पर सवार ना

    होने के लिए आपका मजाक उड़ाया था वे सब कसाई थे। वह जानवरों के प्रति बहुत ही क्रूर थे। शिक्षा इसलिए आपको अपने आसपास के लोगों की राय पर विश्वास नहीं करना चाहिए। जब भी आपको संदेह हो तो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके यह सोें कि आप सही हैं या गलत। यदि आपका विचार, आपकी वाणी और आपका कार्य किसी इंसान के लिए मददगार है तो आप बिल्कुल सही हैं। और यदि आपका कार्य किसी को शारीरिक या मानसिक रूप से चोट पहुंचाता है तो आप गलत हैं।

  • Life Changing Story – आराम तुम्हे ख़त्म कर देगा motivational quotes in Hindi

    भारत के एक बड़े शहर में एक साधारण सा लड़का रहता था राहुल। राहुल की उम्र ज्यादा नहीं थी, लेकिन उसके मन में सपने बहुत बड़े थे। वह चाहता था कि उसका भी नाम हो। उसकी भी पहचान बने। लोग उसे जाने और उसकी बातें सुने। उसका सपना था कि वह अपना खुद का YouTube चैनल शुरू करें और लोगों को प्रेरित करें। लेकिन हकीकत अक्सर सपनों से अलग

    होती है। राहुल एक साधारण नौकरी करता था। दिनभर अपने ऑफिस में मेहनत करता लेकिन उसे संतोष नहीं मिल पाता। उसे लगता जैसे वह किसी जेल में फंसा हुआ है। वो नौकरी से निकलना चाहता था लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता। मन ही मन गुड़ता रहता और हर दिन अपने आप से यही पूछता क्या मेरी जिंदगी हमेशा ऐसी ही रहेगी? क्या मैं अपने सपनों को जी पाऊंगा?

    समय गुजरता गया लेकिन राहुल की हालत वैसी ही रही। एक दिन वह परेशान होकर अपने घर से निकल गया और पास के पार्क में जाकर एक लकड़ी की बेंच पर बैठ गया। राहुल के चेहरे पर निराशा साफ झलक रही थी। वो चुपचाप सामने देख रहा था जैसे उसकी आंखों में कोई उम्मीद बाकी ना बजी हो। उसी समय पार्क में एक बुजुर्ग व्यक्ति टहलते हुए आए। वह शहर के सबसे

    अमीर और सफल व्यक्तियों में से एक थे। जब उन्होंने राहुल को उदास देखा तो रुक गए और नरम आवाज में उससे पूछा क्या हुआ बेटे? तुम इतने परेशान क्यों दिख रहे हो? राहुल के पास खोने को कुछ नहीं था। उसने अपनी कहानी बुजुर्ग को बता दी। कैसे वह नौकरी में अटका हुआ है? कैसे वह अपने सपनों को नहीं जी पा रहा? कैसे उसकी जिंदगी नाकाम लगने लगी है। बुजुर्ग

    आदमी ने अच्छी तरह राहुल की बातें सुनी। फिर राहुल की आंखों में देखा और मुस्कुराते हुए बोले, मैं तुम्हारी उदासी की वजह समझ गया हूं और मुझे उसका हल भी पता। राहुल उत्साहित होकर बोला, “प्लीज अंकल, मुझे बताइए ना। मुझे रास्ता दिखाइए।” बुजुर्ग व्यक्ति बोले, हल जानने से पहले तुम्हें मेरे साथ आना होगा।” चलो यहां से कुछ दूरी पर एक बड़ा सा कुत्ता बैठा है। उसके

    पास चलते हैं। राहुल को थोड़ी हैरानी हुई। फिर भी वह उस आदमी के साथ आगे चल पड़ा। जब वह दोनों वहां पहुंचे तो राहुल ने देखा एक बड़ा सा कुत्ता जमीन पर बैठा रो रहा है। राहुल को लगा शायद इसे भूख लगी है। बुजुर्ग व्यक्ति ने तुरंत उसे कुछ रोटियां दी। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि कुत्ता रोटी खाने के बाद भी रोता ही रहा। थोड़ी देर वह चुप हो जाता। फिर से रोने लगता। रावण को समझ नहीं आया और उसने उत्सुकता से

    पूछा, “अंकल, यह कुत्ता क्यों रो रहा है? आपने इसे खाना भी दे दिया। उसके बावजूद यह दुखी है। बुजुर्ग व्यक्ति मुस्कुराए और बोले, “यह इसलिए रो रहा है बेटा क्योंकि जिस जगह पर यह बैठा है, वहां नीचे एक नुकीला पत्थर पड़ा है। वो पत्थर इसे बार-बार चुभ रहा है। राहुल और हैरान होकर बोला, “अगर इतना दर्द हो रहा है, तो यह उठ क्यों नहीं जाता? अपनी जगह बदल क्यों नहीं लेता?” बुजुर्ग ने राहुल की तरफ देखा और

    मुस्कुराते हुए बोले, यही तो बात है बेटा। अभी इसे इतना दर्द नहीं हो रहा कि यह उठ जाए। यह बस थोड़ी तकलीफ झेल लेता है। फिर आराम से उसी जगह बैठा रहता है। यह अपने कंफर्ट ज़ोन में है। जब तक कि यह दर्द असहनीय ना हो। यह यहां से उठेगा नहीं। यह सुनकर राहुल की आंखें फटी रह गई। बुजुर्ग ने आगे कहा, तुम्हारी भी यही समस्या है। राहुल, तुम सफलता चाहते हो, लेकिन अपनी पुरानी जिंदगी और आराम को नहीं त्यागना चाहते। जब तक इंसान अपने आराम के

    दायरे से बाहर नहीं निकलता, वह कभी ऊंचे मुकाम पर नहीं पहुंच सकता। सफलता त्याग मांगती है, मेहनत मांगती है और सबसे बड़ी बात हिम्मत मांगती है। उस पल राहुल को अपनी गलती समझ में आ गई। उसने यह तय कर लिया कि अब वो अपनी जिंदगी को उदासी में नहीं बिताएगा। उस दिन के बाद राहुल ने अपनी जिंदगी बदल ली। दिन में वो नौकरी करता लेकिन रात में जाग कर अपने YouTube चैनल पर मेहनत करता। उसे

    नींद नहीं मिल पाती। कभी उसके दोस्त उसका मजाक उड़ाते। यह सबसे कुछ नहीं होगा। लेकिन राहुल ने हार नहीं मानी। 2 साल तक उसने दिन रात मेहनत की। धीरे-धीरे उसका चैनल लोगों तक पहुंचने लगा। उसकी मेहनत रंग लाई और एक दिन राहुल उस शहर के सफल व्यक्तियों में गिना जाने लगा। जिस तरह वह कभी उदासी में पार्क की पेंच पर बैठा था। अब उसी पार्क में लोग उसे पहचानते और उसकी मिसाल दिया करते थे। दोस्तों

    अगर जिंदगी में सचमुच बड़ा बनना है तो कुत्ते की तरह मत रोते रहो। उठो अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलो और वह कदम बढ़ाओ जिसकी तुम्हें जरूरत है। सफलता वहीं मिलती है जहां हिम्मत और त्याग होता है। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आप एक   शेयर जरूर करे।

  • दो भाइयों की कहानी // Life Changing Story

    अन्याय का जवाब आइये जानते है

    इस सच्ची कहानी में

    पूरा राज

    बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गांव में दो भाई रहते थे। मोहन और सोहन दोनों ही बेहद मेहनती थे और अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का सपना देखते थे। गांव में रोजगार के अवसर बहुत कम थे। इसलिए दोनों ने तय किया कि अब उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए शहर जाना होगा। शहर पहुंचकर दोनों

    भाइयों ने मिलकर कालीन बुनाई का काम शुरू किया। छोटा भाई सोहन अच्छे कालीन बुना करता था। वो दिन रात मेहनत करके खूबसूरत कालीन तैयार करता और उसका बड़ा भाई मोहन उन कालीनों को अपने घोड़े पर लादकर शहर के बाजार में बेचकर आता था। शाम को लौटकर मोहन अपनी कमाई थोन के साथ बांटता। धीरे-धीरे उनका काम अच्छा चल निकला और वह दोनों भाई

    खुशी से रहने लगे। लेकिन एक दिन एक ऐसी घटना घटी जिसने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। उस दिन मोहन हमेशा की तरह अपने कालीन बेचकर लौट रहा था। घोड़े की काटी पर उसने एक हल्की सी पोटली बांधी हुई थी जिसमें उसने सोने के सिक्के रखे हुए थे। रास्ते में बाजार से कुछ सामान खरीदते समय एक दुकानदार मोहन के पास आकर बोला, “अरे भाई, मैं

    तुम्हारा घोड़ा खरीदना चाहता हूं। बताओ कितने में बेचोगे?” मोहन कुछ सोच ही रहा था कि दुकानदार ने कहा, “मैं पांच सिक्के दूंगा।” यह सुनकर मोहन अंदर ही अंदर मुस्कुराने लगा। उस समय घोड़े की कीमत सिर्फ एक सिक्का हुआ करती थी और यह दुकानदार पांच सिक्के देने को तैयार था। मोहन ने खुशी-खुशी हामी भर दी और बोला जी बिल्कुल मैं घोड़ा आपको बेचने को

    तैयार हूं। दुकानदार ने तुरंत अपनी जेब से पांच सिक्के निकाले और मोहन के हाथ में रखकर बोला, अब यह पूरा घोड़ा मेरा हुआ। मोहन ने सिक्के लेते हुए कहा, “जी हां, यह पूरा घोड़ा आपका है। मोहन घोड़े की काठी से अपनी पोटली निकालने लगा। लेकिन उसी वक्त दुकानदार ने उसे धक्का देते हुए कहा, नहीं यह पोटली भी अब मेरी है। तुमने पांच सिक्कों के बदले पूरा घोड़ा मुझे बेच दिया है। काटी हो या पोटली यह सब कुछ मेरा है। मोहन हैरान रह गया और उसने कहा, “अरे यह तो

    गलत है। मैंने तुम्हें घोड़ा भेजा है ना कि मेरी पोटली?” लेकिन दुकानदार चालाकी से बोला नहीं तुमने अभी सबके सामने मुझे कहा था कि पूरा घोड़ा तुम्हारा है। अब यह सब मेरी संपत्ति है। आसपास खड़े लोग भी दुकानदार की तरफदारी करने लगे। मोहन लाचार और उदास होकर अपने घर लौट आया। उसने रोते हुए सारी कहानी सोहन को बताई। सोहन ने धैर्यपूर्वक मोहन की बात सुनी और फिर बोला, परेशान मत हो भैया। जैसा उसने हमारे साथ किया, अब हम भी वैसा ही करेंगे।

    कुछ दिनों के बाद सोहन उस दुकानदार की दुकान पर गया। दुकान सचमुच सुंदर थी और पूरी तरह ग्राहकों से भरी हुई थी। सोहन ने दुकानदार से कहा, “अरे भाई, आपकी दुकान तो बहुत अच्छी है। मैं इसे 1000 सोने के सिक्कों में खरीदना चाहता हूं।” दुकानदार यह सुनकर अंदर ही अंदर झूं उठा। उसकी दुकान की असली कीमत सिर्फ 800 सोने की सिक्के थी और कोई उसे 1000 सोने के सिक्के दे रहा था। उसने तुरंत हामी भर दी और

    बोला, “जी हां बिल्कुल। अब यह दुकान आपकी है। सोन ने अपनी जेब से पोटली निकाली और 1000 सिक्के दुकानदार को थमाते हुए बोला, “अब यह पूरी दुकान मेरी है।” दुकानदार बोला, “जी हां बिल्कुल। यह पूरी दुकान आपकी है।” दुकानदार अपनी दुकान के अंदर जाकर अपना सामान समेटने लगा। लेकिन उसी वक्त सोहन ने उसे रोकते हुए कहा, रुको। अब यह सामान

    तुम नहीं ले जा सकते। आपने अभी सबके सामने कहा है कि पूरी दुकान मेरी है। यह सामान भी अब मेरा हो चुका है। दुकानदार गुस्से से लाल हो गया। उसने चिल्लाकर कहा, “यह क्या मजाक है? यह तो मेरी मेहनत की कमाई है।” सोहन ने भी उसी तरह चालाकी की जिस तरह दुकानदार ने मोहन के साथ की थी। उसने आसपास खड़े ग्राहकों से गवाही दिलाई और इस बार

    सब ने सोहन का साथ दिया। अब दुकानदार बेबस होकर रोने लगा। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया। उसने समझ लिया कि धोखा देकर कभी भी किसी का भला नहीं होता। जो जैसा करता है उसे वैसा ही फल मिलता है। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में कभी भी किसी के साथ अन्याय नहीं करना चाहिए। क्योंकि जैसा हम दूसरों के साथ करते हैं, वैसा ही हमारे साथ लौट कर आता है।

    आपका साथ

    आपका ईमान

    फिर मिलते है

    नेस्ट बार

    राधे राधे

    जय हिन्द

    🇮🇳

  • बीरबल का जादुई सुरमा – Birbal Ki Kahani | Akbar Birbal Ki kahani

    अकबर का साला हमेशा से ही बीरबल की जगह लेना चाहता था। अकबर जानते थे कि बीरबल की जगह ले सके ऐसा बुद्धिमान इस संसार में कोई नहीं है। फिर भी जोरू के भाई को वह सीधी ना नहीं बोल सकते थे। ऐसा करके वह अपनी लाडली बेगम की बेरुखी मोल नहीं लेना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने अपने साले साहब को एक कोयले से भरी बोरी दे दी और कहा कि जाओ और इसे हमारे राज्य के सबसे मक्कार और लालची सेठ सेठ

    दमधी लाल को बेच कर दिखाओ। अगर तुम यह काम कर गए तो तुम्हें बीरबल की जगह वजीर बना दूंगा। अकबर की इस अजीब शर्त को सुनकर उनका साला अचंभे में पड़ गया। वह कोयले की बोरी लेकर चला तो गया पर उसे पता था कि वह सेठ किसी की बातों में नहीं आने वाला। ऊपर से वह उल्टा उसे ही छूना लगा देगा। हुआ भी यही। सेठ दमद्दी लाल ने कोयले की बोरी के बदले एक ढेला भी देने से इंकार कर दिया। साला अपना

    सा मुंह लेकर महल वापस लौट आया और अपनी हार स्वीकार कर ली। अब अकबर ने वही काम बीरबल को करने को कहा। बीरबल कुछ सोचे और फिर बोले कि सेठ दमद्दी लाल जैसे मक्कार और लालची सेठ को यह कोयले की बोरी क्या? मैं सिर्फ कोयले का एक टुकद्दा ही 50 सोने के सिक्कों में बेच आऊंगा। यह बोलकर वह तुरंत वहां से रवाना हो गए। सबसे पहले उसने एक दर्जी के पास जाकर एक मखमली कुर्ता खरीदा। हीरे मोती वाली मालाएं गले में डाली। महंगी जूती पहनी और

    कोयले को बारीक सुरमे जैसा पिसवा लिया। फिर उसने पिसे कोयले को एक सुरमे की छोटी चमकदार डिब्बी में भर लिया। इसके बाद बीरबल ने अपना भेष बदल लिया और एक मेहमान घर में रुक कर इश्तहार दे दिया कि बगदाद से बद्े शेख आए हैं जो करिश्मा एक सुरमा बेचते हैं जिसे आंखों में लगाने से मरे हुए पूर्वज दिख जाते हैं और यदि उन्होंने कहीं कोई धनगाधा है तो उसका पता बताते हैं। यह बात शहर में आग की तरह

    फैली। सेठ दमद्दी लाल को भी यह बात पता चली। उसने सोचा जरूर उसके पूर्वजों ने कहीं ना कहीं धन काटा होगा। उसने तुरंत शेख बने बीरबल से संपर्क किया और सुरमे की डिब्बी खरीदने की पेशकश की। शेख ने डिब्बी के 100 सोने के सिक्के मांगे और मोल भाव करते-करते 50 सोने के सिक्कों में बात तय हुई। पर सेठ भी होशियार था। उसने कहा मैं अभी तुरंत यह सुरमा लगाऊंगा। और अगर मुझे मेरे पूर्वज नहीं दिखे तो मैं

    सिक्के वापस ले लूंगा। बीरबल बोला बिल्कुल आप ऐसा कर सकते हैं। चलिए शहर के चौराहे पर चलिए और वहां इसे जांच लीजिए। सुरमे का चमत्कार देखने के लिए भी डाज इकट्ठा हो गई। तब बीरबल ने ऊंची आवाज में कहा यह सेठ अभी यह चमत्कारी सुरमा लगाएंगे और अगर यह उन्हीं की औलाद हैं जिन्हें यह अपना मां-बाप समझते हैं तो इन्हें इनके पूर्वज दिखाई देंगे और गड्डी धन के बारे में बताएंगे। लेकिन अगर आपके मां-बाप में से

    किसी ने भी बेईमानी की होगी और आप उनकी असल औलाद नहीं होंगे तो आपको कुछ भी नहीं दिखेगा। और ऐसा कहते ही बीरबल ने सेठ की आंखों में सुरमा लगा दिया। फिर क्या था? सिर खुजाते हुए सेठ ने आंखें खोली। अब दिखना तो कुछ था नहीं। पर सेठ करे भी तो क्या करें? अपनी इज्जत बचाने के लिए सेठ ने 50 सोने के सिक्के बीरबल के हाथ थमा दिए और मुंह फुलाते हुए आगे बढ़ गए। बीरबल फौरन अकबर के पास पहुंचे और रुपए थमाते हुए सारी कहानी सुना दी। अकबर का

    साला बिना कुछ कहे अपने घर लौट गया और अकबर बीरबल एक दूसरे को देखकर मंदमंद मुस्काने लगे। इस किस्से के बाद फिर कभी अकबर के साले ने बीरबल का स्थान नहीं मांगा।

  • 3 गलतियां जो कभी नहीं करनी चाहिए | रावण की अनमोल शिक्षा | Dusshera Specia

    दोस्तों आज हम बात करेंगे रावण की उस महान विद्वान की जिसे वेद पुराणों का गहरा ज्ञान था। जो एक अद्वितीय राजा और असाधारण योद्धा था। लेकिन उसी रावण की तीन गलतियों ने उसका सर्वनाश कर दिया। दशहरे के इस अवसर पर जब हम रावण दहन देखते हैं तो हमें सिर्फ आतिशबाजी और

    उत्सव नहीं देखना चाहिए। बल्कि यह समझना चाहिए कि रावण की इन तीन गलतियों से हमें क्या सीख मिलती है। क्योंकि बुद्धिमान वही है जो दूसरों की गलतियों से सीख ले। पहली गलती अहंकार। रावण जितना महान विद्वान था उतना ही बड़ा उसका अहंकार भी था। वह अपने ज्ञान और शक्ति पर इतना गर्व करने लगा कि उसने सोचना शुरू कर दिया। इस संसार में मेरे बराबर कोई नहीं है। यह अहंकार ही था

    जिसने उसे अंधा कर दिया। उसने शिवजी को भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की कोशिश की। उसने कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया और वहीं शिवजी के क्रोध से उसकी उंगलियां दब गई। सोचिए इतना ज्ञान, इतनी शक्ति लेकिन अहंकार ने उसकी सारी अच्छाइयों को मिटा दिया। यही हमारी पहली शिक्षा है। चाहे आपके पास कितना भी ज्ञान, पैसा या

    शक्ति क्यों ना हो। अहंकार आपको पतन की ओर ले जाएगा। दूसरी गलती असयमित इच्छाएं। रावण की दूसरी गलती थी। उसकी बेकाबू इच्छाएं वह जानता था कि सीता श्री राम की पत्नी है। फिर भी उसने उन्हें हरण कर लिया। उसके मन की अनियंत्रित इच्छाएं ही उसका सबसे बड़ा जाल बन गई। सोचिए अगर उसने अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखा होता तो शायद

    उसका अंत कभी ना होता। आज भी हमारी जिंदगी में यही होता है। एक छोटी सी गलती, एक गलत लालच हमें बर्बादी की ओर धकेल सकती है। इसीलिए याद रखिए सफलता पाने के लिए अपनी इच्छाओं और भावनाओं पर नियंत्रण रखना जरूरी है। तीसरी गलती अच्छी सलाह को ना मानना। रावण का छोटा भाई विभीषण बार-बार उसे समझाता रहा। भैया युद्ध मत करो। यह तुम्हारे साम्राज्य और जीवन के लिए

    सही नहीं है। लेकिन रावण ने कभी उसकी सलाह नहीं मानी। उसका अहंकार और जिद इतनी बड़ी हो गई थी कि उसने अपने ही भाई को राज्य से निकाल दिया और यही उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। अगर उसने विभीषण की सही सलाह मानी होती तो शायद उसकी लंका आज भी सोने की होती। जीवन में हमें भी यही सीख मिलती है। कभी भी सही सलाह देने वालों की अनदेखी मत कीजिए। क्योंकि कई बार हमारे अपनों की बात ही हमें बड़े संकट से बचा

    सकती है। तो दोस्तों, रावण का अंत सिर्फ राम जी के बाण से नहीं हुआ था। उसका असली विनाश हुआ था। उसके अहंकार से, उसकी अनियंत्रित इच्छाओं से और सही सलाह ना मानने की जिद से। आज जब दशहरे पर हम रावण का पुतला जलाते हैं, तो असली सवाल यह है क्या हम अपने भीतर बैठे अहंकार, लालच और जिद को भी जला पाते हैं? तो इस दशहरे

    पर आइए हम संकल्प लें कि हम कभी भी इन तीन गलतियों को अपनी जिंदगी में जगह नहीं देंगे। यही है रावण की सबसे बड़ी शिक्षा। तीन गलतियां जो कभी नहीं करनी चाहिए

  • गुस्सैल राजकुमारी को गुरुजी ने दिया अनोखा सबक | Motivational Story

    बहुत समय पहले की बात है। भारत के एक राज्य में एक राजा रहा करता था। राजा बहुत ही दयालु और न्यायप्रिय था। लेकिन राजा की एक छोटी सी समस्या थी। उसकी इकलौती बेटी बहुत गुस्सैल थी। राजकुमारी को जरा-जरा सी बात पर गुस्सा आ जाता था। कोई उसकी बात नहीं माने तो गुस्सा। कोई चीज ना मिले तो गुस्सा। जब भी उसे गुस्सा आता वो यह नहीं देखती कि उसके सामने कौन खड़ा है। चाहे सेवक हो या उसकी

    दासियां हो या फिर उसके अपने माता-पिता। गुस्से में उसके मन में जो भी आता वह सब कुछ कह देती। कभी-कभी तो अपने आसपास की चीजें उठाकर तोड़ने लगती। राजा अपनी राजकुमारी से बहुत प्रेम करते थे। उन्होंने कई बार राजकुमारी को समझाने की कोशिश की। कभी लाड़ से तो कभी डांट कर। लेकिन राजकुमारी की आदतें बदलने का नाम ही नहीं ले रही थी। राजा अब बहुत चिंतित रहने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि

    अपनी राजकुमारी को सही रास्ते पर कैसे लाया जाए। आखिरकार राजा ने अपने राजगुरु को बुलाया। राजगुरु बहुत ही ज्ञानी और एक बुद्धिमान व्यक्ति थे। उन्होंने राजा की परेशानी सुनी और मुस्कुराते हुए बोले महाराज आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। आने वाले कुछ ही दिनों में राजकुमारी का गुस्सा पूरी तरह खत्म हो जाएगा। राजा को यह सुनकर राहत तो मिली लेकिन वह चकित भी थे। उन्होंने सोचा यह कैसे संभव होगा? लेकिन

    उन्होंने अपने राजगुरु पर यकीन किया। अगले दिन जब राजगुरु राजकुमारी को पढ़ाने गए तो उन्होंने उससे कहा आज हम कोई पढ़ाई नहीं करेंगे। आज हम एक खेल खेलेंगे। खेल का नाम सुनते ही राजकुमारी मुस्कुराने लगी। राजगुरु उसे महल के पीछे की एक बड़ी दीवार के पास ले गए। दीवार के पास कुछ कीलें रखी हुई थी। राजगुरु बोले यह खेल आसान है। जब भी तुम्हें गुस्सा आए तुम्हें एक कील उठानी है और इस दीवार पर लगा

    देनी है। राजकुमारी ने हैरानी से पूछा लेकिन इससे क्या होगा? राजगुरु ने मुस्कुराते हुए कहा जब यह खेल खत्म होगा तब तुम्हें एक बहुत ही सुंदर पीला गुलाब मिलेगा और तुम्हें गुलाब अच्छे लगते हैं ना। गुलाब का नाम सुनकर राजकुमारी मुस्कुराने लगी और उन्होंने इस खेल के लिए हां कर दी। अब जब भी राजकुमारी को गुस्सा आता वह दीवार की ओर भागती और वहां पर एक हल्की सी कील लगा देती। अगले ही दिन दीवार में 10 से ज्यादा कीलें लग चुकी थी। लेकिन धीरे-धीरे

    राजकुमारी को यह एहसास हुआ कील को लगाने में बहुत मेहनत लगती है। दीवार तक जाना पड़ता है। कील उठानी पड़ती है और फिर उसे लगानी पड़ती है। यह सब आसान नहीं था। राजकुमारी ने सोचा जितनी मेहनत मैं कील लगाने में लगाती हूं उससे तो आसान है कि मैं अपना गुस्सा ही रोक लूं। और इसी सोच के साथ अगले दिन दीवार में सिर्फ आठ कीले लगी। फिर उससे अगले दिन और कम और उससे अगले दिन और कम। धीरे-

    धीरे यह संख्या कटती गई। एक दिन ऐसा भी आया जब राजकुमारी को एक भी बार गुस्सा नहीं आया और उन्हें एक भी कील लगानी नहीं पड़ी। खुश होकर वह भागती हुई राजगुरु के पास गई और बोली गुरु जी आज मैंने एक भी कील नहीं लगाई क्योंकि मुझे एक बार भी गुस्सा नहीं आया। राजगुरु मुस्कुराए और बोले बहुत अच्छा किया लेकिन अभी यह खेल खत्म नहीं हुआ। अब से जब भी तुम्हें एक बार भी गुस्सा नहीं आया। उस दिन के अंत में तुम्हें इस दीवार से एक कील निकाल देनी होगी।

    राजकुमारी ने अगले दिन वैसा ही करना शुरू किया। धीरे-धीरे उस दीवार से कीलें निकलने लगी क्योंकि कीलें बहुत ज्यादा थी। उन्हें निकालने में एक महीने से भी ज्यादा का समय लग गया और आखिरकार वो दिन भी आ गया जब दीवार से सारी कीलें निकल चुकी थी। राजकुमारी खुशी-खुशी गुरु जी के पास गई और बोली गुरु जी अब दीवार में एक भी कील नहीं बची। गुरुजी मुस्कुराए और उस दीवार के सामने गए और राजकुमारी से बोले ध्यान से इस दीवार को देखो। क्या तुम्हें कुछ

    नजर आ रहा है? राजकुमारी ने कहा कि नहीं गुरु जी इस दीवार में तो कुछ भी नहीं है। राजगुरु ने फिर से कहा कि ध्यान से देखो शायद कुछ नजर आया। राजकुमारी ने देखा और फिर कहा हां जहां-जहां पर मैंने कील लगाई थी उस जगह पर कुछ निशान रह गए हैं। गुरु जी मुस्कुराए और अपनी गहरी आवाज में बोले बिल्कुल सही। देखो जैसे कीले निकलने के बाद भी इस दीवार पर निशान रह गए हैं। उसी तरह जब भी तुम गुस्से में अपने माता-पिता से बुरी बातें कहती हो तो उनके दिल

    पर भी एक निशान लग जाता है। भले ही बाद में तुम उनसे माफी मांग लो लेकिन वो निशान याद बनकर उनके दिल पर हमेशा लगा रहता है। यह सुनते ही राजकुमारी की आंखों में आंसू आ गए। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वह दौड़ती हुई अपने पिता राजा के पास गई। उन्हें गले लगाया और रोते हुए बोली, “पिताजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं वादा करती हूं कि आज के बाद कभी भी गुस्सा नहीं करूंगी। अब मैं समझ गई हूं कि मैंने आपका दिल कितना दुखाया है।” राजा की आंखों में भी आंसू आ गए। उन्होंने अपनी बेटी को

    गले लगाया और उसे वह पीला गुलाब दिया जिसका वादा राजगुरु ने उससे किया था। उस दिन के बाद से राजकुमारी ने कभी भी किसी पर गुस्सा नहीं किया। वह समझ चुकी थी कि असली हिम्मत अपने गुस्से को काबू करना है और अपने माता-पिता का दिल दुखाना सबसे बड़ी गलती

  • ठुकराए जाने से मत डरो – Story of Young Man | Motivational Story

    सोचिए दरवाजे पर दस्तक देते ही हर बार वही आवाज आती है। नहीं आप अपनी पूरी मेहनत लगाते हैं। पूरी तैयारी करते हैं। लेकिन नतीजा हमेशा वही होता है। अस्वीकृति यह चुभती है। यह दिल को तोड़ती है। यह आपको यह सोचने पर मजबूर करती है। क्या मैं सच में लायक हूं? क्या मैं कभी सफल हो पाऊंगा? यह कहानी है आदित्य की। उत्तर प्रदेश के लखनऊ में रहने वाला

    एक साधारण नौजवान। हाल ही में आदित्य ने कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरी करी थी और अब उसका सपना था किसी अच्छी कंपनी में नौकरी हासिल करने का और अपने परिवार को गर्व महसूस कराने का। हर सुबह आदित्य साफ सुथरे कपड़े पहनकर और अपना बायोडाटा लेकर इंटरव्यू देने निकल पड़ता। लेकिन हर बार उसे एक ही जवाब मिलता। सॉरी आपको सिलेक्ट नहीं किया गया। शुरुआत में आदित्य ने अपने आप को समझाया। कोई बात नहीं अगली बार हो जाएगा। लेकिन जब वह

    लगातार 10वीं बार रिजेक्ट हुआ तो उसका मन टूट गया। रात को अपने कमरे में अकेले बैठकर उसने अपने आप से कहा शायद मैं काबिल नहीं हूं। शायद मैं सफल नहीं हो पाऊंगा। थका हुआ और निराश आदित्य अगले दिन ट्रेन में बैठकर वाराणसी चला गया। वहां उसने गंगा किनारे एक पुराना मंदिर देखा। मंदिर के आंगन में एक बुजुर्ग साधु बैठे थे जो पत्ते उठा रहे थे। आदित्य ने जाकर उनसे पूछा, क्या मैं यहां कुछ देर बैठ सकता हूं? साधु मुस्कुराए और बोले बिल्कुल बेटे यह आंगन हमेशा

    परेशान लोगों का स्वागत करता है। और फिर आदित्य ने अपना सारा दुख साधु को सुना दिया और बोला मैंने इतनी बार कोशिश की लेकिन हर जगह रिजेक्ट हो रहा हूं। अब मैं अपने आप को बेकार महसूस करता हूं। साधु ने आराम से अपना सिर हिलाया और फिर मुस्कुराते हुए बोले बेटे रिजेक्शन अंत नहीं होता। यह तो एक दिशा परिवर्तन है। देखो जब किसान खेत में बीज बोता है तो कुछ बीज सूखी जमीन पर गिरकर मर जाते हैं। कुछ-कु कीड़े-मकोड़े खा लेते हैं। लेकिन कुछ बीज सही मिट्टी में

    जाकर अंकुरित होते हैं और आगे जाकर पेड़ बनते हैं। किसान उन बीजों पर रोता नहीं जो नष्ट हो गए। वह तो बस बीज बोता रहता है क्योंकि उसे इस बात का यकीन है कि एक दिन उसे अच्छी फसल मिलेगी। तुम भी उस किसान जैसे हो। हर इंटरव्यू एक नया बीज है। कुछ नहीं उगेंगे, कुछ बेकार हो जाएंगे। लेकिन एक दिन एक अच्छा बीज अंकुरित होगा। आदित्य उनकी बातें पूरे मन से सुन रहा था। साधु ने आगे कहा, क्या तुम बांस के पेड़ का रहस्य जानते हो? आदित्य ने सिर हिलाया, नहीं।

    साधु ने कहा, बांस का पेड़ पहले कुछ सालों तक जमीन के ऊपर दिखाई नहीं देता। लोग हंसते हैं, मजाक उड़ाते हैं और यह कहते हैं यह पौधा बेकार है। लेकिन असल में शुरुआत के साल वह जमीन के अंदर अपनी जड़े मजबूत करता है और फिर अचानक कुछ साल के बाद इतनी तेजी से पढ़ता है कि कुछ ही महीनों में बहुत ऊंचाई तक पहुंच जाता है। तुम भी उसी बांस के पेड़ जैसे हो। यह हार तुम्हारे वो साल हैं जो तुम्हें अंदर से

    मजबूत बना रहे हैं और जब अच्छा समय आएगा तो तुम भी बांस के पेड़ की तरह ऊंचाई पर जाओगे। आदित्य की आंखों में आंसू आ गए। लेकिन इस बार यह आंसू दुख के नहीं थे। इस बार उसके अंदर उम्मीद की लौ जल उठी थी। उसने साधु को प्रणाम किया और उनसे बोला धन्यवाद गुरु जी अब से मैं हार नहीं मानूंगा। बस अपनी जड़ों को मजबूत करूंगा। साधु मुस्कुराए और बोले याद रखना बेटे हर हार तुम्हारी जिंदगी का दरवाजा बंद नहीं करती। वो तुम्हें अच्छे मौके की तरफ ले जाती है।

    आदित्य नई ऊर्जा के साथ लखनऊ लौटा। इंटरव्यू अब भी मुश्किल थे। अभी भी उसे रिजेक्शन मिलते थे। लेकिन अब उसका नजरिया बदल चुका था। उसे किसान के बीज याद आते हैं। बांस के पेड़ का रहस्य याद आता और आखिरकार एक दिन उसे एक अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह थी आदित्य को जिंदगी जीने का नजरिया मिल गया। अस्वीकृति अंत नहीं है। यह तो केवल नया मोड़ है। यह

    यह साबित करने नहीं आती कि तुम बेकार हो। यह तो बस तुम्हें सही दिशा देने आती है। हर नहीं सिर्फ रास्ता साफ कर रहा है ताकि तुम्हें सही हां मिल सके। तो याद रखो किसान की तरह अपना बीज बोते रहो। बांस की तरह चुपचाप अपनी जड़े मजबूत करते रहो। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।

  • 5 तरीके जिससे आपका फोकस अटूट हो जाएगा | Swami Vivekananda

    कई बार हम सबको लगता है कि चाहे पढ़ाई हो, करियर हो या कोई सपना मन स्थिर ही नहीं रहता। हम शुरू तो करते हैं लेकिन कुछ ही देर में ध्यान बट जाता है। यही सवाल लेकर एक दिन एक नौजवान स्वामी विवेकानंद के पास पहुंचा और उनसे कहने लगा स्वामी जी मैं बहुत कोशिश करता हूं पढ़ाई और काम पर ध्यान लगाने की। लेकिन मेरा मन बार-बार भटक जाता है। मुझे समझ

    नहीं आता कि आखिर मैं फोकस कैसे करूं। कृपया मार्गदर्शन दीजिए। स्वामी विवेकानंद ने मुस्कुराते हुए कहा, एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है। जिसने मन को साध लिया, उसने जगत को जीत लिया। मैं तुम्हें पांच सरल लेकिन शक्तिशाली सुझाव दूंगा। जिन्हें अपनाकर तुम अपने अंदर गहरी एकाग्रता ला सकते हो। नौजवान ध्यान से स्वामी जी की बात सुनने लगा। स्वामी जी ने कहा, पहला सुझाव लक्ष्य स्पष्ट करो। बिना लक्ष्य के

    इंसान समुद्र में भटकती नाव जैसा है। जब तक तुम्हें यह पता ही नहीं कि जाना कहां है तब तक ध्यान कैसे टिकेगा। सबसे पहले अपना उद्देश्य लिखो। चाहे वह पढ़ाई में अव्वल आना हो। किसी प्रतियोगिता में सफलता पाना हो या जीवन में बड़ा लक्ष्य हासिल करना हो। याद रखो स्पष्ट लक्ष्य ही एकाग्रता की पहली सीढ़ी है। अगर हमारे सामने स्पष्ट लक्ष्य होता है तो हमारे मन को भटकने का कम समय मिलता है। दूसरा सुझाव मन को वर्तमान में लाओ। ज्यादातर लोग या तो अतीत की

    यादों में जीते हैं या भविष्य की चिंता में। जबकि शक्ति तो सिर्फ वर्तमान में है। जब भी मन भटके खुद से पूछो अभी कौन सा काम सबसे ज्यादा जरूरी है? फिर कहो अभी यही काम सबसे महत्वपूर्ण है? पढ़ाई करते समय सिर्फ किताब में डूबो। काम करते समय सिर्फ काम को देखो। धीरे-धीरे मन वर्तमान में टिकना सीख जाएगा। तीसरा सुझाव ध्यान और प्राणायाम। मन को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी साधन है ध्यान और प्राणायाम। रोज कुछ देर आंखें बंद करके गहरी सांस लो और सिर्फ अपनी सांसों को महसूस करो। यह अभ्यास तुम्हारे मन

    को स्थिर करेगा। याद रखो ध्यान मन की तलवार को तेज करने जैसा है। जितना अभ्यास करोगे उतना मन धारदार होगा। चौथा इंद्रियों पर नियंत्रण। फोकस तभी बढ़ेगा जब तुम अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना सीखोगे। नींद, भोजन और भोग। अगर किसी इंसान के अंदर इन तीनों में से किसी एक चीज का भी प्रेम है तो वह पशु समान है। निरर्थक बातें, बेकार की बात करने की आदतें और घंटों का समय बर्बाद करने वाले काम

    यह सब तुम्हारे ध्यान को चुरा लेते हैं। अगर तुम सच में सफल होना चाहते हो तो तय करो कि कौन सी चीज तुम्हें आगे बढ़ा रही है और कौन सी पीछे खींच रही है। अनुशासन ही एकाग्रता का आधार है। पांचवा आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच। स्वामी जी मन तभी एकाग्र रहता है जब उसमें आत्मविश्वास और सकारात्मकता हो। यदि तुम बार-बार सोचोगे कि मुझसे

    नहीं होगा तो मन कभी स्थिर नहीं होगा। खुद से कहो मैं कर सकता हूं मैं जरूर सफल होऊंगा। यह वाक्य तुम्हारे भीतर ऐसी शक्ति जगाएगा कि बाधाएं भी अवसर लगने लगेंगे। याद रखो विश्वास ही शक्ति है। नौजवान धन्यवाद स्वामी जी। आज आपने मेरे जीवन का रास्ता साफ कर दिया। अब मैं लक्ष्य स्पष्ट करूंगा। वर्तमान में रहूंगा। ध्यान का अभ्यास करूंगा। अपनी आदतों पर नियंत्रण रखूंगा और आत्मविश्वास के साथ आगे बढूंगा। स्वामी

    विवेकानंद के यह पांच सुझाव ना सिर्फ उस नौजवान के जीवन को बदल गए बल्कि आज भी हर विद्यार्थी हर युवा के लिए अमूल्य मार्गदर्शन है। एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है। जिस दिन आपने अपने मन को साध लिया उसी दिन जीवन की हर बाधा छोटी लगने लगेगी।

  • क्यों तोड़ा अपना Bharat Ratna अवॉर्ड | C.V. Raman Story

    यह कहानी एक ऐसे बच्चे की है जिसने बचपन में टूटी हुई बोतलों में साइंस देखा। एक ऐसे जीनियस की जिसने महज 15 साल की उम्र में ग्रेजुएट होकर टॉप किया और उस वैज्ञानिक की जिसने फिजिक्स में इंडिया को फर्स्ट नोबेल प्राइज जिताया। लेकिन क्यों उसने गुस्से में आकर सरकार से मिले भारत रत्न को तोड़ दिया। आइए जानते हैं फादर ऑफ इंडियन साइंस की कहानी।

    सीवी रमन की कहानी। सीवी रमन का जन्म नवंबर 1888 को तमिलनाडु में हुआ। रमन का परिवार मध्यमवर्गीय था। उनके घर में जरूरत का हर सामान मौजूद था। लेकिन रमन सिर्फ अपने सपनों और किताबों में खोए रहते थे। रमन के पिता कॉलेज में लेक्चरार थे। और रमन बचपन से ही पिताजी की फिजिक्स और मैथ्स की किताबें पढ़ा करते थे। जब दूसरे बच्चे पतंग उड़ाते रमन घर में अपनी पुरानी बोतलें और कांच के टुकड़ों से

    प्रयोग किया करते। उनका मन हमेशा सवालों में उलझा रहता। रोशनी रंग क्यों बदलती है? कांच का टुकड़ा क्यों चमकता है? समुद्र क्यों नीला होता है? किसी को नहीं पता था कि यही सवाल आगे चलकर पूरी दुनिया को बदल देंगे। रमन का दिमाग इतना तेज था कि महज 11 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल की परीक्षा पास कर ली। 16 साल की उम्र में उन्होंने बीए टॉप किया और महज 18 साल की उम्र में एमए में गोल्ड मेडल हासिल किया।

    लेकिन किस्मत उनके खिलाफ थी। उस समय इंडिया में रिसर्च के लिए अच्छे लैब्स नहीं थे। रमन साइंटिस्ट बनना चाहते थे। लेकिन मजबूरन उन्हें सरकारी नौकरी करनी पड़ी। फाइनेंस डिपार्टमेंट में साधारण क्लर्क की नौकरी। इंडिया को नोबेल प्राइज जिताने वाला व्यक्ति कभी सरकारी दफ्तर में फाइल्स पलटता था। लेकिन रमन रुके नहीं। वो लंच के समय बगल वाली लैब में दौड़ते और एक्सपेरिमेंट करते। कई-कई रातें उन्होंने बिना सोए सिर्फ रिसर्च में बिताई हैं। जब रमन की रिसर्च कुछ आगे बढ़ी। उन्होंने अपने पेपर इंग्लैंड के मशहूर अखबार के

    लिए भेजे। लेकिन जवाब आया इंडिया में साइंस यह इंपॉसिबल है। हम पब्लिश नहीं करेंगे। रमन दुखी हुए लेकिन टूटे नहीं। उन्होंने फिर दोबारा लिखा और इतना अच्छा लिखा कि आखिरकार दुनिया ने रमन का नाम देखा। पहली बार किसी इंडियन के रिसर्च पेपर अंतरराष्ट्रीय अखबार में छपे। रमन हमेशा से नोबेल प्राइज जीतना चाहते थे। 1922 में जब रमन को एक यूनिवर्सिटी के द्वारा अवार्ड दिया गया तो रमन ने अपने भाषण में कहा अगले कुछ सालों में मैं नोबेल प्राइज जीतूंगा। वहां बैठे कई लोगों ने इस पर यकीन नहीं

    किया। लेकिन यह भारत की साइंस के इतिहास में एक मोड़ था। एक दिन जब रमन समुद्र पर जहाज से यात्रा कर रहे थे। उन्होंने देखा कि समुद्र का पानी अलग-अलग रंगों में चमक रहा है। अगर कोई आम इंसान होता तो इस दृश्य को सुंदर कहकर आगे बढ़ जाता। लेकिन रमन की आंखों में फिर सवाल जाग उठे पानी रंग क्यों बदल रहा है? रोशनी ऐसा क्यों करती है? यही सवाल आगे चलकर उनके करियर की दिशा बदलने वाला था। 1921 से लेकर 1929 तक रमन ने रोशनी और उसके रहस्यों

    पर हजारों एक्सपेरिमेंट किए। उनके पास हाईटेक मशीनें नहीं थी। बस कुछ इक्विपमेंट और उनकी अटूट जिज्ञासा। कई एक्सपेरिमेंट बर्बाद हुए। कई बार उन्हें लगा कि वह गलत दिशा में जा रहे हैं। लेकिन आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई। फरवरी 1929 को उन्होंने वह खोज की जिसने पूरी दुनिया को बदल दिया। रमन इफेक्ट्स यानी जब रोशनी किसी वस्तु से टकराती है तो वह सिर्फ परावर्तित नहीं होती बल्कि बदल भी जाती है। वो अपनी फ्रीक्वेंसी और रंग बदल सकती है।

    यह डिस्कवरी इतनी महान थी कि 1930 में रमन को मिला नोबेल प्राइज इन फिजिक्स। वो फर्स्ट इंडियन बने जिन्होंने इंडिया में रहकर नोबेल प्राइज जीता। भारत सरकार ने रमन का अच्छा सम्मान किया। लेकिन रमन को सरकार की कुछ साइंस नीतियां अच्छी नहीं लगती थी। आगे चलकर रमन को उस वक्त के प्रधानमंत्री नेहरू से सख्त चिढ़ थी। एक बार उन्होंने नेहरू की किसी पॉलिसी से चिढ़कर अपना भारत रत्न पदक टुकड़े-टुकड़े कर दिया जो उन्हें नेहरू सरकार ने दिया था। एक अन्य

    घटना में यह आता है कि उन्होंने नेहरू की प्रतिमा जमीन पर पटक दी। एक बार नेहरू ने रमन को उनके रिसर्च सेंटर के लिए वित्तीय सहायता की पेशकश की। जिसे रमन ने यह कहते हुए साफ मना कर दिया। मैं यह निश्चित रूप से नहीं चाहता कि यह एक और सरकारी लैब बन जाए। इसके बाद रमन ने इंडिया में कई सेंटर ओपन किए जिसमें इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस, रमन रिसर्च इंस्टट्यूट शामिल है। रमन ने पूरी जिंदगी विदेशी नागरिकता या विदेश में काम करने के प्रस्ताव को

    ठुकराया है। रमन कहते थे कि मैं इंडियन हूं और इंडियन की साइंस पर ही हमेशा काम करना चाहता हूं। जब वो अपनी उम्र के आखिरी दौर में थे। 82 साल की उम्र में वो रोज अपने रिसर्च सेंटर जाया करते थे। उनके आखिरी दिनों में उनके कमरे में जो आखिरी चीज मिली वह कोई अवार्ड या मेडल नहीं था बल्कि एक प्रिज्म था जिससे वह रोज रोशनी को गिरते हुए देखते थे। रमन का इंडियन साइंस में जो योगदान है उसे याद करते हुए हर साल 28 फरवरी को पूरे इंडिया में साइंस डे मनाया जाता है।

    क्योंकि इसी दिन इंडिया ने पहला नोबेल प्राइज इन फिजिक्स जीता था। रमन की जिंदगी एक संदेश देती है कि जिसको दुनिया इंपॉसिबल कहे उसे आपकी जिज्ञासा पॉसिबल बना सकती है। मिडिल क्लास घर का लड़का सरकारी नौकरी करते हुए दुनिया को रोशनी का रहस्य बता सकता है तो हम भी कुछ कर सकते हैं।