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Category: Stories

  1. Is website per dard bhari kahani se bhi relative script post kiye jaenge thank you ❤️🙏
  • 3 गलतियां जो कभी नहीं करनी चाहिए | रावण की अनमोल शिक्षा | Dusshera Specia

    दोस्तों आज हम बात करेंगे रावण की उस महान विद्वान की जिसे वेद पुराणों का गहरा ज्ञान था। जो एक अद्वितीय राजा और असाधारण योद्धा था। लेकिन उसी रावण की तीन गलतियों ने उसका सर्वनाश कर दिया। दशहरे के इस अवसर पर जब हम रावण दहन देखते हैं तो हमें सिर्फ आतिशबाजी और

    उत्सव नहीं देखना चाहिए। बल्कि यह समझना चाहिए कि रावण की इन तीन गलतियों से हमें क्या सीख मिलती है। क्योंकि बुद्धिमान वही है जो दूसरों की गलतियों से सीख ले। पहली गलती अहंकार। रावण जितना महान विद्वान था उतना ही बड़ा उसका अहंकार भी था। वह अपने ज्ञान और शक्ति पर इतना गर्व करने लगा कि उसने सोचना शुरू कर दिया। इस संसार में मेरे बराबर कोई नहीं है। यह अहंकार ही था

    जिसने उसे अंधा कर दिया। उसने शिवजी को भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की कोशिश की। उसने कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया और वहीं शिवजी के क्रोध से उसकी उंगलियां दब गई। सोचिए इतना ज्ञान, इतनी शक्ति लेकिन अहंकार ने उसकी सारी अच्छाइयों को मिटा दिया। यही हमारी पहली शिक्षा है। चाहे आपके पास कितना भी ज्ञान, पैसा या

    शक्ति क्यों ना हो। अहंकार आपको पतन की ओर ले जाएगा। दूसरी गलती असयमित इच्छाएं। रावण की दूसरी गलती थी। उसकी बेकाबू इच्छाएं वह जानता था कि सीता श्री राम की पत्नी है। फिर भी उसने उन्हें हरण कर लिया। उसके मन की अनियंत्रित इच्छाएं ही उसका सबसे बड़ा जाल बन गई। सोचिए अगर उसने अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखा होता तो शायद

    उसका अंत कभी ना होता। आज भी हमारी जिंदगी में यही होता है। एक छोटी सी गलती, एक गलत लालच हमें बर्बादी की ओर धकेल सकती है। इसीलिए याद रखिए सफलता पाने के लिए अपनी इच्छाओं और भावनाओं पर नियंत्रण रखना जरूरी है। तीसरी गलती अच्छी सलाह को ना मानना। रावण का छोटा भाई विभीषण बार-बार उसे समझाता रहा। भैया युद्ध मत करो। यह तुम्हारे साम्राज्य और जीवन के लिए

    सही नहीं है। लेकिन रावण ने कभी उसकी सलाह नहीं मानी। उसका अहंकार और जिद इतनी बड़ी हो गई थी कि उसने अपने ही भाई को राज्य से निकाल दिया और यही उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। अगर उसने विभीषण की सही सलाह मानी होती तो शायद उसकी लंका आज भी सोने की होती। जीवन में हमें भी यही सीख मिलती है। कभी भी सही सलाह देने वालों की अनदेखी मत कीजिए। क्योंकि कई बार हमारे अपनों की बात ही हमें बड़े संकट से बचा

    सकती है। तो दोस्तों, रावण का अंत सिर्फ राम जी के बाण से नहीं हुआ था। उसका असली विनाश हुआ था। उसके अहंकार से, उसकी अनियंत्रित इच्छाओं से और सही सलाह ना मानने की जिद से। आज जब दशहरे पर हम रावण का पुतला जलाते हैं, तो असली सवाल यह है क्या हम अपने भीतर बैठे अहंकार, लालच और जिद को भी जला पाते हैं? तो इस दशहरे

    पर आइए हम संकल्प लें कि हम कभी भी इन तीन गलतियों को अपनी जिंदगी में जगह नहीं देंगे। यही है रावण की सबसे बड़ी शिक्षा। तीन गलतियां जो कभी नहीं करनी चाहिए

  • गुस्सैल राजकुमारी को गुरुजी ने दिया अनोखा सबक | Motivational Story

    बहुत समय पहले की बात है। भारत के एक राज्य में एक राजा रहा करता था। राजा बहुत ही दयालु और न्यायप्रिय था। लेकिन राजा की एक छोटी सी समस्या थी। उसकी इकलौती बेटी बहुत गुस्सैल थी। राजकुमारी को जरा-जरा सी बात पर गुस्सा आ जाता था। कोई उसकी बात नहीं माने तो गुस्सा। कोई चीज ना मिले तो गुस्सा। जब भी उसे गुस्सा आता वो यह नहीं देखती कि उसके सामने कौन खड़ा है। चाहे सेवक हो या उसकी

    दासियां हो या फिर उसके अपने माता-पिता। गुस्से में उसके मन में जो भी आता वह सब कुछ कह देती। कभी-कभी तो अपने आसपास की चीजें उठाकर तोड़ने लगती। राजा अपनी राजकुमारी से बहुत प्रेम करते थे। उन्होंने कई बार राजकुमारी को समझाने की कोशिश की। कभी लाड़ से तो कभी डांट कर। लेकिन राजकुमारी की आदतें बदलने का नाम ही नहीं ले रही थी। राजा अब बहुत चिंतित रहने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि

    अपनी राजकुमारी को सही रास्ते पर कैसे लाया जाए। आखिरकार राजा ने अपने राजगुरु को बुलाया। राजगुरु बहुत ही ज्ञानी और एक बुद्धिमान व्यक्ति थे। उन्होंने राजा की परेशानी सुनी और मुस्कुराते हुए बोले महाराज आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। आने वाले कुछ ही दिनों में राजकुमारी का गुस्सा पूरी तरह खत्म हो जाएगा। राजा को यह सुनकर राहत तो मिली लेकिन वह चकित भी थे। उन्होंने सोचा यह कैसे संभव होगा? लेकिन

    उन्होंने अपने राजगुरु पर यकीन किया। अगले दिन जब राजगुरु राजकुमारी को पढ़ाने गए तो उन्होंने उससे कहा आज हम कोई पढ़ाई नहीं करेंगे। आज हम एक खेल खेलेंगे। खेल का नाम सुनते ही राजकुमारी मुस्कुराने लगी। राजगुरु उसे महल के पीछे की एक बड़ी दीवार के पास ले गए। दीवार के पास कुछ कीलें रखी हुई थी। राजगुरु बोले यह खेल आसान है। जब भी तुम्हें गुस्सा आए तुम्हें एक कील उठानी है और इस दीवार पर लगा

    देनी है। राजकुमारी ने हैरानी से पूछा लेकिन इससे क्या होगा? राजगुरु ने मुस्कुराते हुए कहा जब यह खेल खत्म होगा तब तुम्हें एक बहुत ही सुंदर पीला गुलाब मिलेगा और तुम्हें गुलाब अच्छे लगते हैं ना। गुलाब का नाम सुनकर राजकुमारी मुस्कुराने लगी और उन्होंने इस खेल के लिए हां कर दी। अब जब भी राजकुमारी को गुस्सा आता वह दीवार की ओर भागती और वहां पर एक हल्की सी कील लगा देती। अगले ही दिन दीवार में 10 से ज्यादा कीलें लग चुकी थी। लेकिन धीरे-धीरे

    राजकुमारी को यह एहसास हुआ कील को लगाने में बहुत मेहनत लगती है। दीवार तक जाना पड़ता है। कील उठानी पड़ती है और फिर उसे लगानी पड़ती है। यह सब आसान नहीं था। राजकुमारी ने सोचा जितनी मेहनत मैं कील लगाने में लगाती हूं उससे तो आसान है कि मैं अपना गुस्सा ही रोक लूं। और इसी सोच के साथ अगले दिन दीवार में सिर्फ आठ कीले लगी। फिर उससे अगले दिन और कम और उससे अगले दिन और कम। धीरे-

    धीरे यह संख्या कटती गई। एक दिन ऐसा भी आया जब राजकुमारी को एक भी बार गुस्सा नहीं आया और उन्हें एक भी कील लगानी नहीं पड़ी। खुश होकर वह भागती हुई राजगुरु के पास गई और बोली गुरु जी आज मैंने एक भी कील नहीं लगाई क्योंकि मुझे एक बार भी गुस्सा नहीं आया। राजगुरु मुस्कुराए और बोले बहुत अच्छा किया लेकिन अभी यह खेल खत्म नहीं हुआ। अब से जब भी तुम्हें एक बार भी गुस्सा नहीं आया। उस दिन के अंत में तुम्हें इस दीवार से एक कील निकाल देनी होगी।

    राजकुमारी ने अगले दिन वैसा ही करना शुरू किया। धीरे-धीरे उस दीवार से कीलें निकलने लगी क्योंकि कीलें बहुत ज्यादा थी। उन्हें निकालने में एक महीने से भी ज्यादा का समय लग गया और आखिरकार वो दिन भी आ गया जब दीवार से सारी कीलें निकल चुकी थी। राजकुमारी खुशी-खुशी गुरु जी के पास गई और बोली गुरु जी अब दीवार में एक भी कील नहीं बची। गुरुजी मुस्कुराए और उस दीवार के सामने गए और राजकुमारी से बोले ध्यान से इस दीवार को देखो। क्या तुम्हें कुछ

    नजर आ रहा है? राजकुमारी ने कहा कि नहीं गुरु जी इस दीवार में तो कुछ भी नहीं है। राजगुरु ने फिर से कहा कि ध्यान से देखो शायद कुछ नजर आया। राजकुमारी ने देखा और फिर कहा हां जहां-जहां पर मैंने कील लगाई थी उस जगह पर कुछ निशान रह गए हैं। गुरु जी मुस्कुराए और अपनी गहरी आवाज में बोले बिल्कुल सही। देखो जैसे कीले निकलने के बाद भी इस दीवार पर निशान रह गए हैं। उसी तरह जब भी तुम गुस्से में अपने माता-पिता से बुरी बातें कहती हो तो उनके दिल

    पर भी एक निशान लग जाता है। भले ही बाद में तुम उनसे माफी मांग लो लेकिन वो निशान याद बनकर उनके दिल पर हमेशा लगा रहता है। यह सुनते ही राजकुमारी की आंखों में आंसू आ गए। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वह दौड़ती हुई अपने पिता राजा के पास गई। उन्हें गले लगाया और रोते हुए बोली, “पिताजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं वादा करती हूं कि आज के बाद कभी भी गुस्सा नहीं करूंगी। अब मैं समझ गई हूं कि मैंने आपका दिल कितना दुखाया है।” राजा की आंखों में भी आंसू आ गए। उन्होंने अपनी बेटी को

    गले लगाया और उसे वह पीला गुलाब दिया जिसका वादा राजगुरु ने उससे किया था। उस दिन के बाद से राजकुमारी ने कभी भी किसी पर गुस्सा नहीं किया। वह समझ चुकी थी कि असली हिम्मत अपने गुस्से को काबू करना है और अपने माता-पिता का दिल दुखाना सबसे बड़ी गलती

  • ठुकराए जाने से मत डरो – Story of Young Man | Motivational Story

    सोचिए दरवाजे पर दस्तक देते ही हर बार वही आवाज आती है। नहीं आप अपनी पूरी मेहनत लगाते हैं। पूरी तैयारी करते हैं। लेकिन नतीजा हमेशा वही होता है। अस्वीकृति यह चुभती है। यह दिल को तोड़ती है। यह आपको यह सोचने पर मजबूर करती है। क्या मैं सच में लायक हूं? क्या मैं कभी सफल हो पाऊंगा? यह कहानी है आदित्य की। उत्तर प्रदेश के लखनऊ में रहने वाला

    एक साधारण नौजवान। हाल ही में आदित्य ने कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरी करी थी और अब उसका सपना था किसी अच्छी कंपनी में नौकरी हासिल करने का और अपने परिवार को गर्व महसूस कराने का। हर सुबह आदित्य साफ सुथरे कपड़े पहनकर और अपना बायोडाटा लेकर इंटरव्यू देने निकल पड़ता। लेकिन हर बार उसे एक ही जवाब मिलता। सॉरी आपको सिलेक्ट नहीं किया गया। शुरुआत में आदित्य ने अपने आप को समझाया। कोई बात नहीं अगली बार हो जाएगा। लेकिन जब वह

    लगातार 10वीं बार रिजेक्ट हुआ तो उसका मन टूट गया। रात को अपने कमरे में अकेले बैठकर उसने अपने आप से कहा शायद मैं काबिल नहीं हूं। शायद मैं सफल नहीं हो पाऊंगा। थका हुआ और निराश आदित्य अगले दिन ट्रेन में बैठकर वाराणसी चला गया। वहां उसने गंगा किनारे एक पुराना मंदिर देखा। मंदिर के आंगन में एक बुजुर्ग साधु बैठे थे जो पत्ते उठा रहे थे। आदित्य ने जाकर उनसे पूछा, क्या मैं यहां कुछ देर बैठ सकता हूं? साधु मुस्कुराए और बोले बिल्कुल बेटे यह आंगन हमेशा

    परेशान लोगों का स्वागत करता है। और फिर आदित्य ने अपना सारा दुख साधु को सुना दिया और बोला मैंने इतनी बार कोशिश की लेकिन हर जगह रिजेक्ट हो रहा हूं। अब मैं अपने आप को बेकार महसूस करता हूं। साधु ने आराम से अपना सिर हिलाया और फिर मुस्कुराते हुए बोले बेटे रिजेक्शन अंत नहीं होता। यह तो एक दिशा परिवर्तन है। देखो जब किसान खेत में बीज बोता है तो कुछ बीज सूखी जमीन पर गिरकर मर जाते हैं। कुछ-कु कीड़े-मकोड़े खा लेते हैं। लेकिन कुछ बीज सही मिट्टी में

    जाकर अंकुरित होते हैं और आगे जाकर पेड़ बनते हैं। किसान उन बीजों पर रोता नहीं जो नष्ट हो गए। वह तो बस बीज बोता रहता है क्योंकि उसे इस बात का यकीन है कि एक दिन उसे अच्छी फसल मिलेगी। तुम भी उस किसान जैसे हो। हर इंटरव्यू एक नया बीज है। कुछ नहीं उगेंगे, कुछ बेकार हो जाएंगे। लेकिन एक दिन एक अच्छा बीज अंकुरित होगा। आदित्य उनकी बातें पूरे मन से सुन रहा था। साधु ने आगे कहा, क्या तुम बांस के पेड़ का रहस्य जानते हो? आदित्य ने सिर हिलाया, नहीं।

    साधु ने कहा, बांस का पेड़ पहले कुछ सालों तक जमीन के ऊपर दिखाई नहीं देता। लोग हंसते हैं, मजाक उड़ाते हैं और यह कहते हैं यह पौधा बेकार है। लेकिन असल में शुरुआत के साल वह जमीन के अंदर अपनी जड़े मजबूत करता है और फिर अचानक कुछ साल के बाद इतनी तेजी से पढ़ता है कि कुछ ही महीनों में बहुत ऊंचाई तक पहुंच जाता है। तुम भी उसी बांस के पेड़ जैसे हो। यह हार तुम्हारे वो साल हैं जो तुम्हें अंदर से

    मजबूत बना रहे हैं और जब अच्छा समय आएगा तो तुम भी बांस के पेड़ की तरह ऊंचाई पर जाओगे। आदित्य की आंखों में आंसू आ गए। लेकिन इस बार यह आंसू दुख के नहीं थे। इस बार उसके अंदर उम्मीद की लौ जल उठी थी। उसने साधु को प्रणाम किया और उनसे बोला धन्यवाद गुरु जी अब से मैं हार नहीं मानूंगा। बस अपनी जड़ों को मजबूत करूंगा। साधु मुस्कुराए और बोले याद रखना बेटे हर हार तुम्हारी जिंदगी का दरवाजा बंद नहीं करती। वो तुम्हें अच्छे मौके की तरफ ले जाती है।

    आदित्य नई ऊर्जा के साथ लखनऊ लौटा। इंटरव्यू अब भी मुश्किल थे। अभी भी उसे रिजेक्शन मिलते थे। लेकिन अब उसका नजरिया बदल चुका था। उसे किसान के बीज याद आते हैं। बांस के पेड़ का रहस्य याद आता और आखिरकार एक दिन उसे एक अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह थी आदित्य को जिंदगी जीने का नजरिया मिल गया। अस्वीकृति अंत नहीं है। यह तो केवल नया मोड़ है। यह

    यह साबित करने नहीं आती कि तुम बेकार हो। यह तो बस तुम्हें सही दिशा देने आती है। हर नहीं सिर्फ रास्ता साफ कर रहा है ताकि तुम्हें सही हां मिल सके। तो याद रखो किसान की तरह अपना बीज बोते रहो। बांस की तरह चुपचाप अपनी जड़े मजबूत करते रहो। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।

  • 5 तरीके जिससे आपका फोकस अटूट हो जाएगा | Swami Vivekananda

    कई बार हम सबको लगता है कि चाहे पढ़ाई हो, करियर हो या कोई सपना मन स्थिर ही नहीं रहता। हम शुरू तो करते हैं लेकिन कुछ ही देर में ध्यान बट जाता है। यही सवाल लेकर एक दिन एक नौजवान स्वामी विवेकानंद के पास पहुंचा और उनसे कहने लगा स्वामी जी मैं बहुत कोशिश करता हूं पढ़ाई और काम पर ध्यान लगाने की। लेकिन मेरा मन बार-बार भटक जाता है। मुझे समझ

    नहीं आता कि आखिर मैं फोकस कैसे करूं। कृपया मार्गदर्शन दीजिए। स्वामी विवेकानंद ने मुस्कुराते हुए कहा, एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है। जिसने मन को साध लिया, उसने जगत को जीत लिया। मैं तुम्हें पांच सरल लेकिन शक्तिशाली सुझाव दूंगा। जिन्हें अपनाकर तुम अपने अंदर गहरी एकाग्रता ला सकते हो। नौजवान ध्यान से स्वामी जी की बात सुनने लगा। स्वामी जी ने कहा, पहला सुझाव लक्ष्य स्पष्ट करो। बिना लक्ष्य के

    इंसान समुद्र में भटकती नाव जैसा है। जब तक तुम्हें यह पता ही नहीं कि जाना कहां है तब तक ध्यान कैसे टिकेगा। सबसे पहले अपना उद्देश्य लिखो। चाहे वह पढ़ाई में अव्वल आना हो। किसी प्रतियोगिता में सफलता पाना हो या जीवन में बड़ा लक्ष्य हासिल करना हो। याद रखो स्पष्ट लक्ष्य ही एकाग्रता की पहली सीढ़ी है। अगर हमारे सामने स्पष्ट लक्ष्य होता है तो हमारे मन को भटकने का कम समय मिलता है। दूसरा सुझाव मन को वर्तमान में लाओ। ज्यादातर लोग या तो अतीत की

    यादों में जीते हैं या भविष्य की चिंता में। जबकि शक्ति तो सिर्फ वर्तमान में है। जब भी मन भटके खुद से पूछो अभी कौन सा काम सबसे ज्यादा जरूरी है? फिर कहो अभी यही काम सबसे महत्वपूर्ण है? पढ़ाई करते समय सिर्फ किताब में डूबो। काम करते समय सिर्फ काम को देखो। धीरे-धीरे मन वर्तमान में टिकना सीख जाएगा। तीसरा सुझाव ध्यान और प्राणायाम। मन को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी साधन है ध्यान और प्राणायाम। रोज कुछ देर आंखें बंद करके गहरी सांस लो और सिर्फ अपनी सांसों को महसूस करो। यह अभ्यास तुम्हारे मन

    को स्थिर करेगा। याद रखो ध्यान मन की तलवार को तेज करने जैसा है। जितना अभ्यास करोगे उतना मन धारदार होगा। चौथा इंद्रियों पर नियंत्रण। फोकस तभी बढ़ेगा जब तुम अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना सीखोगे। नींद, भोजन और भोग। अगर किसी इंसान के अंदर इन तीनों में से किसी एक चीज का भी प्रेम है तो वह पशु समान है। निरर्थक बातें, बेकार की बात करने की आदतें और घंटों का समय बर्बाद करने वाले काम

    यह सब तुम्हारे ध्यान को चुरा लेते हैं। अगर तुम सच में सफल होना चाहते हो तो तय करो कि कौन सी चीज तुम्हें आगे बढ़ा रही है और कौन सी पीछे खींच रही है। अनुशासन ही एकाग्रता का आधार है। पांचवा आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच। स्वामी जी मन तभी एकाग्र रहता है जब उसमें आत्मविश्वास और सकारात्मकता हो। यदि तुम बार-बार सोचोगे कि मुझसे

    नहीं होगा तो मन कभी स्थिर नहीं होगा। खुद से कहो मैं कर सकता हूं मैं जरूर सफल होऊंगा। यह वाक्य तुम्हारे भीतर ऐसी शक्ति जगाएगा कि बाधाएं भी अवसर लगने लगेंगे। याद रखो विश्वास ही शक्ति है। नौजवान धन्यवाद स्वामी जी। आज आपने मेरे जीवन का रास्ता साफ कर दिया। अब मैं लक्ष्य स्पष्ट करूंगा। वर्तमान में रहूंगा। ध्यान का अभ्यास करूंगा। अपनी आदतों पर नियंत्रण रखूंगा और आत्मविश्वास के साथ आगे बढूंगा। स्वामी

    विवेकानंद के यह पांच सुझाव ना सिर्फ उस नौजवान के जीवन को बदल गए बल्कि आज भी हर विद्यार्थी हर युवा के लिए अमूल्य मार्गदर्शन है। एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है। जिस दिन आपने अपने मन को साध लिया उसी दिन जीवन की हर बाधा छोटी लगने लगेगी।

  • क्यों तोड़ा अपना Bharat Ratna अवॉर्ड | C.V. Raman Story

    यह कहानी एक ऐसे बच्चे की है जिसने बचपन में टूटी हुई बोतलों में साइंस देखा। एक ऐसे जीनियस की जिसने महज 15 साल की उम्र में ग्रेजुएट होकर टॉप किया और उस वैज्ञानिक की जिसने फिजिक्स में इंडिया को फर्स्ट नोबेल प्राइज जिताया। लेकिन क्यों उसने गुस्से में आकर सरकार से मिले भारत रत्न को तोड़ दिया। आइए जानते हैं फादर ऑफ इंडियन साइंस की कहानी।

    सीवी रमन की कहानी। सीवी रमन का जन्म नवंबर 1888 को तमिलनाडु में हुआ। रमन का परिवार मध्यमवर्गीय था। उनके घर में जरूरत का हर सामान मौजूद था। लेकिन रमन सिर्फ अपने सपनों और किताबों में खोए रहते थे। रमन के पिता कॉलेज में लेक्चरार थे। और रमन बचपन से ही पिताजी की फिजिक्स और मैथ्स की किताबें पढ़ा करते थे। जब दूसरे बच्चे पतंग उड़ाते रमन घर में अपनी पुरानी बोतलें और कांच के टुकड़ों से

    प्रयोग किया करते। उनका मन हमेशा सवालों में उलझा रहता। रोशनी रंग क्यों बदलती है? कांच का टुकड़ा क्यों चमकता है? समुद्र क्यों नीला होता है? किसी को नहीं पता था कि यही सवाल आगे चलकर पूरी दुनिया को बदल देंगे। रमन का दिमाग इतना तेज था कि महज 11 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल की परीक्षा पास कर ली। 16 साल की उम्र में उन्होंने बीए टॉप किया और महज 18 साल की उम्र में एमए में गोल्ड मेडल हासिल किया।

    लेकिन किस्मत उनके खिलाफ थी। उस समय इंडिया में रिसर्च के लिए अच्छे लैब्स नहीं थे। रमन साइंटिस्ट बनना चाहते थे। लेकिन मजबूरन उन्हें सरकारी नौकरी करनी पड़ी। फाइनेंस डिपार्टमेंट में साधारण क्लर्क की नौकरी। इंडिया को नोबेल प्राइज जिताने वाला व्यक्ति कभी सरकारी दफ्तर में फाइल्स पलटता था। लेकिन रमन रुके नहीं। वो लंच के समय बगल वाली लैब में दौड़ते और एक्सपेरिमेंट करते। कई-कई रातें उन्होंने बिना सोए सिर्फ रिसर्च में बिताई हैं। जब रमन की रिसर्च कुछ आगे बढ़ी। उन्होंने अपने पेपर इंग्लैंड के मशहूर अखबार के

    लिए भेजे। लेकिन जवाब आया इंडिया में साइंस यह इंपॉसिबल है। हम पब्लिश नहीं करेंगे। रमन दुखी हुए लेकिन टूटे नहीं। उन्होंने फिर दोबारा लिखा और इतना अच्छा लिखा कि आखिरकार दुनिया ने रमन का नाम देखा। पहली बार किसी इंडियन के रिसर्च पेपर अंतरराष्ट्रीय अखबार में छपे। रमन हमेशा से नोबेल प्राइज जीतना चाहते थे। 1922 में जब रमन को एक यूनिवर्सिटी के द्वारा अवार्ड दिया गया तो रमन ने अपने भाषण में कहा अगले कुछ सालों में मैं नोबेल प्राइज जीतूंगा। वहां बैठे कई लोगों ने इस पर यकीन नहीं

    किया। लेकिन यह भारत की साइंस के इतिहास में एक मोड़ था। एक दिन जब रमन समुद्र पर जहाज से यात्रा कर रहे थे। उन्होंने देखा कि समुद्र का पानी अलग-अलग रंगों में चमक रहा है। अगर कोई आम इंसान होता तो इस दृश्य को सुंदर कहकर आगे बढ़ जाता। लेकिन रमन की आंखों में फिर सवाल जाग उठे पानी रंग क्यों बदल रहा है? रोशनी ऐसा क्यों करती है? यही सवाल आगे चलकर उनके करियर की दिशा बदलने वाला था। 1921 से लेकर 1929 तक रमन ने रोशनी और उसके रहस्यों

    पर हजारों एक्सपेरिमेंट किए। उनके पास हाईटेक मशीनें नहीं थी। बस कुछ इक्विपमेंट और उनकी अटूट जिज्ञासा। कई एक्सपेरिमेंट बर्बाद हुए। कई बार उन्हें लगा कि वह गलत दिशा में जा रहे हैं। लेकिन आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई। फरवरी 1929 को उन्होंने वह खोज की जिसने पूरी दुनिया को बदल दिया। रमन इफेक्ट्स यानी जब रोशनी किसी वस्तु से टकराती है तो वह सिर्फ परावर्तित नहीं होती बल्कि बदल भी जाती है। वो अपनी फ्रीक्वेंसी और रंग बदल सकती है।

    यह डिस्कवरी इतनी महान थी कि 1930 में रमन को मिला नोबेल प्राइज इन फिजिक्स। वो फर्स्ट इंडियन बने जिन्होंने इंडिया में रहकर नोबेल प्राइज जीता। भारत सरकार ने रमन का अच्छा सम्मान किया। लेकिन रमन को सरकार की कुछ साइंस नीतियां अच्छी नहीं लगती थी। आगे चलकर रमन को उस वक्त के प्रधानमंत्री नेहरू से सख्त चिढ़ थी। एक बार उन्होंने नेहरू की किसी पॉलिसी से चिढ़कर अपना भारत रत्न पदक टुकड़े-टुकड़े कर दिया जो उन्हें नेहरू सरकार ने दिया था। एक अन्य

    घटना में यह आता है कि उन्होंने नेहरू की प्रतिमा जमीन पर पटक दी। एक बार नेहरू ने रमन को उनके रिसर्च सेंटर के लिए वित्तीय सहायता की पेशकश की। जिसे रमन ने यह कहते हुए साफ मना कर दिया। मैं यह निश्चित रूप से नहीं चाहता कि यह एक और सरकारी लैब बन जाए। इसके बाद रमन ने इंडिया में कई सेंटर ओपन किए जिसमें इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस, रमन रिसर्च इंस्टट्यूट शामिल है। रमन ने पूरी जिंदगी विदेशी नागरिकता या विदेश में काम करने के प्रस्ताव को

    ठुकराया है। रमन कहते थे कि मैं इंडियन हूं और इंडियन की साइंस पर ही हमेशा काम करना चाहता हूं। जब वो अपनी उम्र के आखिरी दौर में थे। 82 साल की उम्र में वो रोज अपने रिसर्च सेंटर जाया करते थे। उनके आखिरी दिनों में उनके कमरे में जो आखिरी चीज मिली वह कोई अवार्ड या मेडल नहीं था बल्कि एक प्रिज्म था जिससे वह रोज रोशनी को गिरते हुए देखते थे। रमन का इंडियन साइंस में जो योगदान है उसे याद करते हुए हर साल 28 फरवरी को पूरे इंडिया में साइंस डे मनाया जाता है।

    क्योंकि इसी दिन इंडिया ने पहला नोबेल प्राइज इन फिजिक्स जीता था। रमन की जिंदगी एक संदेश देती है कि जिसको दुनिया इंपॉसिबल कहे उसे आपकी जिज्ञासा पॉसिबल बना सकती है। मिडिल क्लास घर का लड़का सरकारी नौकरी करते हुए दुनिया को रोशनी का रहस्य बता सकता है तो हम भी कुछ कर सकते हैं।

  • क्या China में आतंकी हमले, कट्टरपंथी जैसी समस्याएं नहीं हैं? |

    आपको यह बताते हैं कि भारत की तरह चाइना में आतंकवाद की समस्या इतनी गहरी क्यों नहीं है और चाइना में आतंकी घटनाएं ना के बराबर आखिर क्यों होती है? तो सबसे बड़ा कारण यह है कि जिस पाकिस्तान को आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रायोजक

    माना जाता है। उस पाकिस्तान को चाइना ने अपने कर्ज से दबाया हुआ है। आज पाकिस्तान का एक भी आतंकी संगठन चाइना के उईगर मुसलमानों की बात नहीं करता। जिन पर चाइना में सबसे ज्यादा जुल्म होते हैं। दूसरा चाइना में आतंकवादी हमले बहुत कम होते हैं क्योंकि चाइना में आतंकवाद के खिलाफ सबसे कठोर

    कानून है। वहां आतंकवाद को लेकर राजनीति नहीं होती है। वहां की कम्युनिस्ट सरकार साफ शब्दों में यह कहती है आतंकवाद को धार्मिक कट्टरपन से जुड़ा हुआ ही माना जाएगा। तीसरा चाइना में आतंकवाद के खिलाफ सबसे मजबूत आंतरिक सुरक्षा और निगरानी तंत्र है। पूरे चाइना में सीसीटीवी कैमरों का ऐसा जाल है कि वहां छोटी से छोटी गतिविधियों की भी निगरानी होती है और लोगों

    का चेहरा देखकर उनका रिकॉर्ड निकाला जा सकता है। इससे लोगों में यह डर रहता है कि अगर वह आतंकवाद की गतिविधियों में शामिल होते हैं तो सरकार उन्हें मरते दम तक जेल में रख सकती है। साल 2015 में चाइना में एक नया कानून आया था जिसके तहत एक ऐसी संस्था बनाई गई थी जो देश भर में आतंकवाद से संबंधित गतिविधियों संदिग्धों की पहचान करती है और पूरे चाइना में आतंकवाद से जुड़े मामलों में तुरंत कारवाई

    होती है वहां ऐसे मामलों में 10 20 सालों तक जांच नहीं चलती चाइना में सोशल मीडिया पर भी सरकार का पूरा नियंत्रण होता है। भारत में अगर सोशल मीडिया पर आतंकियों ने कोई साजिश रची है तो उसका डाटा हमें कंपनियों से मांगना पड़ता है और यह कंपनियां सरकार को डाटा देने से इंकार भी कर सकती हैं। लेकिन चाइना में ऐसा नहीं है। चाइना में इंटरनेट कंपनियों को आरोपी

    से जुड़ा हुआ सभी डाटा जांच एजेंसियों को फौरन देना होता है और इस वजह से वहां सोशल मीडिया के जरिए आतंक का नेटवर्क खड़ा ही नहीं किया जा सकता। युवाओं का ब्रेन वाश नहीं हो सकता। हालांकि चाइना के मामले में एक बड़ी बात यह है कि वहां होने वाली घटनाओं को सरकार की मंजूरी के बिना मीडिया में रिपोर्ट नहीं किया जा सकता और इस वजह से भी चाइना में होने वाली ज्यादातर घटनाएं दुनिया को पता ही नहीं चल पाती।

  • Rishabh Shefali Love Story: शादी पर घटिया कमेंट और ट्रोलिंग, Viral Couple की पूरी कहानी, दोनो कौन ?

    सोशल मीडिया पर इन दिनों ऋषभ और शेफाली की शादी की वीडियो खूब वायरल हो रही है और जैसे ही कोई चीज वायरल होती है प्यार करने वाले भी आ जाते हैं और बिना वजह ट्रोल करने वाले भी। आज हम आपको इस कपल की 11 साल की सच्ची लव स्टोरी और उनके स्ट्रगल और वायरल होने के बाद जो कुछ

    हुआ वो सभी सरल दिल छू लेने वाले अंदाज में बताएंगे। दरअसल यह कहानी ऋषभ और शेफाली की है। दोनों ने 11 साल पहले एक साथ कॉलेज में पढ़ते हुए। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरर कविश अजीज के मुताबिक यह कहानी है ऋषभ और शेफाली की। दोनों ने 11 साल पहले एक साथ कॉलेज में पढ़ते हुए दोस्ती की थी। धीरे-धीरे दोस्ती प्यार में बदली और दोनों ने एक दूसरे को तब

    से लेकर आज तक कभी अकेला नहीं छोड़ा। शेफाली के लिए ऋषभ सिर्फ एक बॉयफ्रेंड नहीं बल्कि उसका सबसे बड़ा सपोर्ट सिस्टम था और ऋषभ के लिए शेफाली उसकी सबसे बड़ी ताकत थी। ऋषभ ने इस शादी के लिए 11 साल का इंतजार किया है। एक लंबे इंतजार के बाद ऋषभ की नौकरी लगी और फिर शेफाली से शादी हो गई। ऋषभ की जिंदगी आसान नहीं थी। बचपन से ही उसकी स्किन कॉम्प्लेक्शन को लेकर लोग कमेंट

    करते थे। काला है हीरो जैसा नहीं लगता। ऐसे ताने उसे रोज सुनने पड़ते थे। लेकिन शेफाली वो हर बार उसके सामने खड़ी हो जाती और कहती मुझे तेरी रंगत नहीं तेरी नियत पसंद है। यही भरोसा था जिसने ऋषभ को मजबूत बनाया। वक्त गुजर गया, संघर्ष बढ़ता गया लेकिन उसने मेहनत नहीं छोड़ी। आज वही ऋषभ एक हैंडसम सैलरी वाली नौकरी करता है और 11 साल के

    लंबे इंतजार के बाद दोनों ने शादी कर ली। लेकिन खुशी के इन पलों के बीच सोशल मीडिया ने फिर वह पुरानी आदत दिखाई। उनकी शादी की वीडियोस वायरल हुई और लोग फिर वही घटिया कमेंट करने लगे। किसी ने रंग पर तंज कसा, किसी ने उनके जोड़े को अनमैच्ड कहा। तो किसी ने ब्यूटी वर्सेस बीस्ट जैसी लाइनें लिख दी। यह सब पढ़कर ऋषभ टूट गया। वो लड़का जिसने 11 साल मेहनत की जो अपनी शादी में सिर्फ खुश होना

    चाहता था। उसे फिर से उसी बात पर ताना मिला जिसने उसे बचपन से परेशान किया था। जाहिर है ऋषभ इस बार भी ट्रोलिंग से बेहद परेशान हुआ होगा। हालांकि सोशल मीडिया सिर्फ ट्र्स नहीं करता। कभी-कभी दिल भी दिखाता है। बहुत सारे लोग आ गए और बोले यह सच्चा प्यार है। लोगों ने ऋषभ और शेफाली की लव स्टोरी की तारीफ करते हुए कई सारे रिएक्शन दिए हैं। एक यूजर ने लिखा शी इज हैप्पी एंड वेरी हैप्पी। मैगज़ ने लिखा यह हैंडसम है। इफ यू थिंक हैंडसम

    दिखना सिर्फ स्किन वाइट और ब्लैक होना होता है। तो आपको बहुत कुछ समझने की जरूरत है। मेजर्स ने लिखा आई डोंट थिंक पीपल आर डूइंग गुड बाय ट्रोलिंग देम। मेजर्स ने लिखा सारी लड़कियां गोल्डर्स नहीं होती। एंड नॉट एवरी मैन इज हैंडसम। सो बेसिकली आपने उसको एक पुअर और खराब लड़का दिखाया क्योंकि उसके पास कोई गवर्नमेंट जॉब नहीं और उसका कलर भी ठीक नहीं है। टेक्निकली यू आर अ गोल्ड डिगर एंड रेसिस्ट एज वेल। ने लिखा गोरी चमड़ी नहीं तो हैंडसम

    नहीं। वाह बहन व्हाट स्टैंडर्ड एंड एजुकेशन शुड हैव जस्ट स्क्रोल्ड पास्ट। विकार्जन ने लिखा लोगों ने ऋषभ को उसके रंग पर ट्रोल किया जैसे उनकी खुद की जिंदगी 4K में चल रही हो। 11 साल का प्यार, मुश्किल दिनों का साथ और अब शादी लेकिन इंटरनेट आंटियां अंकल्स को बस बिल्टर चाहिए। सच्ची बात शेफाली ने रंग नहीं इंसान चुना। बाकी ट्रोलर्स अपना अकाउंट ही प्राइवेट कर लें तो बेहतर है। एक और ने लिखा आजकल किसी भी

    इंसान के आलोचक ज्यादा है। जब इंसान अपनी मेहनत और धैर्य से कुछ हासिल करता है तो जलनखोर लोग आ जाते हैं उसकी आलोचना करने। बाकी भाई को दिली मुबारकबाद। तो ऋषभ और शेफाली की कहानी ये सिखाती है कि प्यार में रंग नहीं देखा जाता। खूबसूरती चेहरे की नहीं दिल की होती है और सबसे बड़ी बात जो साथी आपके मुश्किल समय में साथ खड़ा होता है वही आपका असली जीवन साथी होता है। अगर आपको ऐसी सच्ची कहानी पसंद है तो कमेंट करके जरूर लिखें।

  • मुश्किलों का सामना करो – Story of a UPSC Aspirant | UPSC Motivational Video

    कहानी की शुरुआत एक साधारण परिवार से होती है। उस परिवार की एक बेटी थी जिसने अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना देखा था। यूपीएससी पास करना। उसने दिन रात मेहनत की। किताबों में डूब कर पढ़ाई की। बस एक ही ख्वाहिश के साथ किसी भी तरह से एग्जाम में सफल होना है। लेकिन जब रिजल्ट आया तो वह परीक्षा पास नहीं कर पाई। यह खबर उसके लिए

    किसी तूफान से कम नहीं थी। उसका आत्मविश्वास हिल गया। वह दिन रात उदास रहने लगी। अक्सर अकेले बैठकर सोचती क्या मैं वाकई इस काबिल नहीं हूं? बेटी की यह हालत देखकर उसके पिता का दिल टूट गया। वह अपनी बेटी को इस स्थिति में नहीं देख सकते थे। उन्होंने सोचा कि इसे हिम्मत देनी होगी। एक दिन पिता ने अपनी बेटी को बुलाया और कहा, बेटा चलो मेरे साथ किचन में। बेटी को समझ नहीं आया कि पापा अचानक किचन में क्यों बुला रहे हैं। लेकिन वह चुपचाप उनके

    साथ चली गई। किचन में पहुंचकर उसने देखा कि गैस स्टो पर तीन बर्तन रखे हुए हैं। पहले बर्तन में पानी और अंडे थे। दूसरे बर्तन में पानी और आलू और तीसरे बर्तन में मेन पानी और कुछ कॉफी बींस। पिता ने गैस ऑन की और तीनों बर्तनों को उबलने के लिए छोड़ दिया। 5 मिनट बीते फिर 10 और फिर 20 मिनट। बेटी को अजीब लग रहा था। उसने झुंझुला कर पूछा पापा यह सब क्या कर रहे हो आप? पिता मुस्कुराए और बोले,

    बस एक मिनट और फिर सब समझ आ जाएगा। थोड़ी देर बाद पिता ने गैस बंद कर दी। अब उन्होंने पहले बर्तन से आलू निकाले और एक प्लेट में रख दिए। दूसरे बर्तन से अंडे निकाले और दूसरी प्लेट में रखे। तीसरे बर्तन की कॉफी को छानकर एक कप में भर दिया। अब तीनों चीजें सामने थी। आलू, अंडे और कॉफी। पिता ने बेटी से कहा, “बताओ तुम्हें क्या दिख रहा है?” बेटी ने थोड़े गुस्से में कहा, “इसमें देखने जैसा क्या है? यह आलू है, यह अंडे हैं और यह कॉफी है। पिता ने धीरे से कहा, जरा गौर से देखो। बेटी ने आलओं को छुआ तो पाया कि वे

    बिल्कुल नरम हो चुके थे। फिर अंडों को तोड़ा तो देखा कि वे अंदर से सख्त हो गए थे। अंत में जब उसने कॉफी को सूंघा तो उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। पिता ने समझाया देखो बेटा यह तीनों चीजें एक जैसे हालात में थी। तीनों को गर्म पानी यानी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन प्रतिक्रिया अलग-अलग रही। आलू पहले मजबूत थे लेकिन गर्म पानी में पड़कर कमजोर हो गए। अंडे पहले नाजुक थे लेकिन मुश्किलों

    ने उन्हें अंदर से सख्त और मजबूत बना दिया और कॉफी उसने तो कमाल ही कर दिया। उसने मुश्किल हालात को बदलकर उन्हें अपने रंग और खुशबू में ढाल दिया। बेटी ध्यान से सुन रही थी। पिता ने आगे कहा, जिंदगी भी बिल्कुल ऐसी ही है। मुश्किलें हर किसी की जिंदगी में आती है। अब यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम किसकी तरह बनना चाहोगी। आलू की तरह जो कठिनाइयों में टूट जाता है। अंडे की तरह जो मुश्किलों से और मजबूत हो जाता है या फिर कॉफी की तरह जो मुश्किलों का सामना ही नहीं करता बल्कि माहौल को बदल देता है। बेटी के

    चेहरे पर अब आत्मविश्वास लौट आया था। उसने पिता की ओर देखते हुए कहा पापा अब मुझे समझ आ गया है मैं मुश्किलों के सामने कभी हार नहीं मानूंगी बल्कि उनसे सीखकर और मजबूत बनूंगी और जहां जरूरत होगी मैं कॉफी की तरह अपने हालात को ही बदल दूंगी। उस दिन के बाद से उसकी सोच बदल गई। उसने अपनी असफलता को एक सीख की तरह लिया और और भी

    मेहनत करने लगी। मुश्किलें कभी हमें रोकने के लिए नहीं आती बल्कि हमें यह सिखाने आती है कि हम अंदर से कितने मजबूत हैं। अगर आलू मत बनो, अंडे मत बनो बल्कि कॉफी बनो जो अपने हालात को ही बदल देते।

  • कोशिश करने से मत डरो – Story of a Little Bird Motivational Story in Hindi

    भारत के किसी गांव के पास एक घना और रहस्यमई जंगल था। उस जंगल में एक बहुत ही पुराने पीपल के पेड़ पर एक नन्ही सी गौरैया रहती थी। मिनी, मिनी छोटी थी। मासूम थी और सपनों से भरी हुई थी। लेकिन वो उड़ नहीं पाती थी। जंगल के बाकी पक्षी सुबह होते ही आसमान में ऊंचा उड़ते। कलाबाजियां मारते, बादलों के ऊपर निकल जाते। लेकिन मिनी वो हर किसी को

    देखकर चुपचाप अपने घोंसले के कोने में बैठ जाती। उसके दिल में भी यही इच्छा थी। काश मैं भी उड़ पाती। काश मैं भी उन बादलों को छू पाती और सूरज की किरणों में नहा पाती। लेकिन जब भी वह कोशिश करने जाती उसका दिल डर से कांप उठता। जैसे ही वह अपने पंख उठाती और कूदने की हिम्मत जुटाती। तभी उसका संतुलन बिगड़ जाता और वह सीधे जमीन पर आ गिरती। जंगल के बाकी पक्षी उस पर हंसते और उससे कहते अरे तू तो उड़ ही नहीं सकती। डरपोक है तू मिनी। उनकी हंसी से मिनी की आंखों में आंसू आ जाते।

    लेकिन वो कभी भी पलट कर कुछ नहीं कहती। चुपचाप सुन लेती। रात को अकेले में मिनी आसमान की ओर देखती और अपने आप से कहा करती शायद मैं कमजोर हूं। लेकिन मेरे इरादे मजबूत हैं और मुझे अपने आप पर यकीन है। अगले दिन एक रंग बिरंगी तोता उसी पेड़ पर आया। उसकी आंखों में चमक और आवाज में आत्मविश्वास झलक रहा था। उसने मिनी से कहा, गिरने से उड़ान नहीं रुकती। असली उड़ान कभी भी पंखों से नहीं होती। वो हमारे हौसलों से होती है और तेरे अंदर

    वह हौसला है। याद रख असली जीत उसी की होती है जो हर बार गिरकर भी उठता है। तोते की बातों ने मिनी के दिल में एक उम्मीद की आग जलाई। उस रात वो मुस्कुराई। पहली बार उसके होठों पर विश्वास की मुस्कान थी। उसने अपने आप से कहा हां मैं फिर दोबारा कोशिश करूंगी क्योंकि मुझे अपने आप पर यकीन है। अगली सुबह ना कोई हति की आवाज थी ना ही कोई दूसरा पक्षी था। बस मिनी और उसकी इच्छा। उसने बिना किसी की परवाह किए पंख उठाए और नीचे कूद

    गई। इस बार कुछ अलग हुआ। वो कुछ देर तक हवा में टिकी रही। फिर भले ही वह नीचे गिर गई लेकिन वो मुस्कुरा रही थी। उसने महसूस किया हां अब मैं उड़ रही हूं। भले ही चाहे कुछ देर दिन बीतते गए। हर दिन मिनी गिरती उठती और फिर दोबारा उड़ने की कोशिश करती। धीरे-धीरे उसकी उड़ान लंबी होने लगी। हंसी की जगह अब लोग उसकी हिम्मत देखने लगे। फिर एक दिन जंगल में तेज आंधी आई। जंगल के सारे पक्षी अपने-अपने घोंसले में छुप गए। सब डरे हुए थे। लेकिन मिनी उसने सोचा यही वो पल है जब मैं अपने आप को

    साबित कर सकती हूं। वो अपने घोंसले से निकली। पंख उठाए और आंधियों के बीच उड़ चली। हवाओं से टकराई। शाकाओं से भिड़ी। कभी नीचे गिरी लेकिन हर बार ऊपर उठ खड़ी हुई। उसका हौसला डगमगाया नहीं। जब आंधी रुकी आसमान निखरा तो हर किसी ने देखा। मिनी अब आसमान के ऊपर उड़ रही थी। वही पक्षी जो कभी उसे डरपोक समझते थे। अब उसकी उड़ान देखकर चुप थे। उनकी आंखों में हैरानी और इज्जत दोनों थी। उसी तोते ने मिनी को देखा और उससे बोला, मिनी तूने अपने आप पर भरोसा किया और यही तेरी

    सबसे बड़ी ताकत है। याद रख डर हर किसी को लगता है पर उड़ता वही है जो कोशिश करना नहीं छोड़ता। सालों बाद एक नन्ही चिड़िया उड़ने से डर रही थी। उसने मिनी से कहा, मैं गिर जाऊंगी इसलिए कोशिश नहीं कर रही। मिनी मुस्कुराई और उससे बोली डर तो सबको लगता है पर उड़ता वही है जो नीचे गिरने के बाद भी हार नहीं मानता। कोशिश करने से मत डरो क्योंकि कोशिश ही तुझे तेरी असली उड़ान देगी। दोस्तों गिरने से मत

    डरो। तानों से अपनी हार मत मानो क्योंकि कोशिश करने वाला ही एक दिन आसमान की ऊंचाई तक

    पहुंचता है। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह दूसरी कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।

  • ज़्यादा सोचना छोड़ों – Story of a Sad Farmer | Motivational Story in Hindi

    एक शांत गांव था। उसी गांव में एक साधारण आदमी रहता था। मोहन गांव में लोग उसे सोचू मोहन कहते थे। वजह यह थी कि वह हर बात पर बहुत सोचता था। खेत में काम करे तो सोचता, घर बैठे तो सोचता। यहां तक कि किसी से बात भी करे तो बाद में घंटों उसके शब्दों के बारे में सोचता रहता। गांव वाले हंसकर कह दे। अरे इसे कोई काम मत देना। यह 2 घंटे सिर्फ सोचता ही रहेगा। करेगा कुछ नहीं। मोहन की यही सबसे बड़ी समस्या थी। वह जीवन को बहुत ही मुश्किल मानता था। फसल

    अच्छी हो या बेकार, घर में झगड़ा हो या सुकून उसे हर चीज बस बोझ ही दिखाई देती। वो अक्सर अपने आप से पूछता क्यों जिंदगी इतनी मुश्किल है? क्यों मैं चैन से नहीं जी सकता? एक साल की मेहनत के बाद जब मोहन की फसल तैयार हुई तो अचानक ही उस पर कीड़ों ने हमला कर दिया। महीनों का पसीना, मेहनत सब मिट्टी में मिल गया। मोहन का दिल टूट गया। घर लौटकर उसने अपनी पत्नी से कहा, अब मैं और नहीं कर सकता। जिंदगी मुझसे संभलती नहीं है। हर चीज

    मुझे भारी लगती है। उसकी पत्नी ने धीरे से उत्तर दिया, “अगर तुम्हें इसका जवाब ढूंढना है, तो दूसरों से मत पूछो। या तो अपने आप से पूछ कर देखो या फिर किसी ऐसे से जो जिंदगी को सच में समझ गया हो।” उस रात मोहन देर तक जागता रहा। उसकी आंखों में अचानक एक नाम चमका। गौतम बुद्ध उसे बचपन में दादी की कहानियां याद आई। कैसे बुद्ध राजमहल त्याग कर

    सच्चाई की तलाश में निकल गए थे। मोहन को पता चला कि पास के पहाड़ों के नीचे एक विशाल पीपल का पेड़ है। जहां पर एक महात्मा साधु ध्यान करते हैं। लोगों का यह मानना था कि उन्होंने बुद्ध से ही सीख ली है। मोहन ने यह ठान लिया। अगर कहीं जवाब मिलेगा तो उसी महात्मा के पास मिलेगा। सुबह सूरज निकलते ही उसने सर पर पगड़ी बांधी और निकल पड़ा। रास्ता आसान नहीं था। कांटे, पथरीले पत्थर, धूप लेकिन उसके अंदर

    की बेचैनी इन सब मुश्किलों से आगे थी। दोपहर ढल रही थी जब वह आखिरकार उस पीपल के पेड़ के नीचे पहुंचा। वहां पर एक साधु शांत भाव से ध्यान में बैठे थे। उनके चेहरे से शांति टपक रही थी। ना उनके पास कोई वस्तु थी, ना कोई शिष्य, बस गहरी निरवता। मोहन कुछ देर तक बैठा रहा। फिर हिम्मत जुटाकर उनसे बोला, महात्मा जी, मैं एक सवाल लेकर आया। साधु ने आराम से अपनी आंखें खोली और मुस्कुराते हुए मोहन से कहा, “तुम सवाल लेकर नहीं जवाब की तलाश में यहां पर

    आए हो। बोलो।” मोहन नीचे बैठ गया। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा जिंदगी मुझे बहुत मुश्किल लगती है। छोटी-छोटी बातें बहुत परेशान करती हैं। रिश्ते टूटते हैं। लोग बदल जाते हैं। मेहनत का हक नहीं मिलता। क्या यही जीवन है? साधु ने मुस्कुरा कर जमीन से एक हल्का सा पत्थर उठाया और बोले, “इसे हाथ में लो।” मोहन ने वो पत्थर उठा लिया। फिर साधु बोले, अब मुट्ठी कसकर बंद करो और इसे जोर से दबाओ।” मोहन

    ने वैसा ही किया। 1 मिनट बाद फिर साधु ने पूछा क्या महसूस हो रहा है? मोहन बोला हल्का दर्द हो रहा है। हाथ में झनझनाहट है। साधु ने कहा क्यों? क्योंकि तुमने इस हल्के से पत्थर को कसकर पकड़ा है। यही जिंदगी की हकीकत है। जीवन मुश्किल नहीं होता बल्कि हम उसकी छोटी-छोटी बातों को कसकर पकड़े रहते हैं। जैसे ही तुम इस पत्थर को अपने हाथ से निकाल दोगे, दर्द भी चला जाएगा और तुम्हारा बोझ भी। मोहन जैसे जाग गया। वापस लौटते हुए रास्ते में उसने हर वस्तु को

    हल्के में लेना शुरू किया। सूखे पत्ते, धूप की किरण, हवा सब में उसको सुंदरता दिखने लगी। गांव पहुंचा तो उसकी पत्नी ने पूछा, कोई जवाब मिला? मोहन ने मुस्कुरा कर बस इतना कहा। अब मैंने अपने हाथ से पत्थर निकाल लिया है। धीरे-धीरे लोगों ने उसके अंदर बदलाव देखने शुरू किए। अब वह शिकायत नहीं करता था। अगर उसकी फसल बेकार होती तो कहता इस बार मिट्टी को आराम की जरूरत थी। अगर कोई उसे ताना मारता तो वह बस मुस्कुरा देता। लोग हैरान होते। यही वो मोहन है जो पहले हर बात पर दुखी हो जाता था।

    अब हर चीज को स्वीकार कर रहा। अब मोहन हर शाम गांव के परगद के नीचे बैठता। कोई भी परेशान होकर वहां से गुजरता तो मोहन बस उससे एक ही बात कहता। जिंदगी की सारी उलझनें मुट्ठी में दबे पत्थर जैसी होती है। बस उसे हाथ से निकालना सीखो। दोस्तों, इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है। जिंदगी मुश्किल नहीं है। हम ही उसे अपने विचार और परेशानियों से मुश्किल बना देते हैं। ज्यादा सोचना बंद करो और हल्का जीना सीखो। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है, तो आपको यह दूसरी कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।