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Category: Stories

  1. Is website per dard bhari kahani se bhi relative script post kiye jaenge thank you ❤️🙏
  • APJ Abdul Kalam Story : अखबार बेचने से ISRO तक

    यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसने अनगिनत असफलताओं का सामना किया। एक ऐसे लड़के की जो बचपन में अखबार बेचा करता था जो अपनी क्लास में सबसे पीछे बैठता था। लेकिन उसी लड़के ने आगे चलकर इंडिया को मिसाइल्स की ताकत दी। देश का सबसे अच्छा वैज्ञानिक और अंत में राष्ट्रपति बना। हम

    बात कर रहे हैं एपीजे अब्दुल कलाम की। अब्दुल कलाम का जन्म अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। अब्दुल कलाम बहुत ही साधारण परिवार से थे। उनका बचपन बहुत सरल था। उनके पिता नाव चलाते थे और उनकी मां घर पर काम किया करती थी। अब्दुल कलाम का परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए कई बार उनके घर में ऐसा होता था कि भरपेट खाना नहीं हो

    पाता था। लेकिन यह गरीबी अब्दुल कलाम के सपनों को नहीं दबा सकी। स्कूल जाने से पहले वह अखबार बांटते थे ताकि स्कूल की फीस निकल सके। सुबह जल्दी उठना, मंदिर के पास बैठे बूढ़े आदमी से अखबार की गड्डी लेना, फिर गलियों में दौड़ लगाकर अखबार डालना। यही उनकी रोजमर्रा की जिंदगी थी। लेकिन इन सब मुश्किलों के बावजूद अब्दुल कलाम के मन में आसमान को लेकर एक अजीब सा आकर्षण होता रहता। एक

    बार अब्दुल कलाम के स्कूल टीचर पक्षियों के उड़ने का सिद्धांत समझाने के लिए सभी बच्चों को नदी तट पर ले गए। वहां पर उड़ते हुए पक्षियों को देखकर सभी बच्चों को उड़ने का सिद्धांत सिखाया। उन बच्चों में अब्दुल कलाम भी थे। उड़ते हुए पक्षियों को देखकर ना जाने अब्दुल कलाम के मन में क्या भावना पैदा हुई और उस दिन उन्होंने मन बना लिया कि एक दिन वह भी उड़ेंगे। स्कूल के बाद उन्होंने सेंट जोसेफ से फिजिक्स में पढ़ाई

    की। अब्दुल कलाम अच्छे कॉलेज में पढ़ना चाहते थे। उनका उत्साह देखकर उनकी बड़ी बहन ने अपने गहने गिरवी रखकर कॉलेज की फीस भरी और फिर अब्दुल कलाम अपनी आंखों में आंसू लिए एमआईटी पहुंचे। लेकिन यहां पर उनकी असल परीक्षा शुरू हुई। उस कॉलेज में रहना खाना बहुत महंगा था। अब्दुल कलाम कभी-कभी भूखे रहकर पढ़ाई किया करते थे। एक बार वह कोई प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर पाए और उन्हें उस

    कॉलेज से निकाल देने की धमकी मिली। अब्दुल कलाम इतना डर गए कि उस रात उन्होंने बिना सोए वो प्रोजेक्ट बनाया और अगले दिन सबको चौंका दिया और उन्हें यह बताया कि वह कुछ कर सकते हैं। डिग्री के बाद उन्होंने एयरफोर्स में पायलट के लिए अप्लाई किया। अब्दुल कलाम ने सोचा कि यहां से उनका सपना पूरा हो जाएगा। लेकिन किस्मत ने उन्हें एक बड़ा झटका दिया। अब्दुल कलाम नौवें स्थान पर आए और केवल आठ

    लोग सिलेक्ट होने थे। उनका सपना वहीं टूट गया। कई दिनों तक अब्दुल कलाम अकेले उदास बैठे रहे। लेकिन फिर उन्होंने अपने आप से कहा, शायद मुझे एक बार और कोशिश करनी चाहिए। इस असफलता ने अब्दुल कलाम को इसरो की तरफ मोड़ दिया। यहीं से इंडिया की मिसाइल यात्रा शुरू हुई। इसरो में पहुंचकर उन्होंने एसएलवी प्रोजेक्ट संभाला। इंडिया का फर्स्ट सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल। उन्होंने इस प्रोजेक्ट के लिए दिन रात मेहनत की। कई रातें जागकर अब्दुल कलाम ने

    एसएलवी को पंख दिए। लेकिन जब इसकी टेस्टिंग हुई तो सेटेलाइट ब्लास्ट हो गई। अब्दुल कलाम की महीनों की मेहनत कुछ ही सेकंड में बर्बाद हो गई। यह उनके लिए एक बड़ा झटका था। कुछ दिन तक अब्दुल कलाम ऑफिस नहीं गए। इसरो की इस हार पर पूरा इंडिया हंसने लगा। लेकिन अब्दुल कलाम ने अपने आप को संभाला और अपनी टीम को टूटने नहीं दिया। उन्होंने कहा असफलता मुझ पर काबू नहीं पा सकती जब तक मेरी लगन मजबूत है। कई महीनों की मेहनत के बाद

    अब्दुल कलाम ने फिर सेटेलाइट तैयार किया और फिर 1980 में वो दिन आया जिसने इतिहास बदल दिया। एसएलवी ने रोहिणी सेटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इंडिया अब उन देशों में शामिल हो गया था जिन्होंने अपनी सेटेलाइट ल्च की थी। हर अखबार ने लिखा कि इंडिया में अब मिसाइल पैदा हो चुकी है। इसके बाद कई असफलताओं के बाद अब्दुल कलाम ने अग्नि, पृथ्वी, त्रिशूल जैसी मिसाइलें ल्च की और दुनिया ने अब्दुल कलाम को नाम दिया मिसाइल मैन। 1998 में आया पोखरण टेस्ट। अमेरिकी सेटेलाइट के बीच से

    बचकर इंडिया ने अपने एटॉमिक वेपन को टेस्ट करके दुनिया को चौंका दिया। धरती हिल गई और दुनिया समझ गई कि भारत चुप ना बैठने वाला देश है। इस ऑपरेशन के पीछे का दिमाग था एपीजे अब्दुल कलाम। 2002 में देश ने अखबार बेचने वाले उस बच्चे को इंडिया का राष्ट्रपति बनने का मौका दिया। लेकिन राष्ट्रपति होकर भी वो वही सरल इंसान था। बच्चों से मिलना, उन्हें सपने दिखाना, उनकी मुश्किलें आसान करना और अपनी किताबें लिखना यह सब उनका

    रूटीन बन गया। अब्दुल कलाम कहा करते थे अगर आप सूरज की तरह चमकना चाहते हैं तो पहले उसकी तरह जलना सीखिए। 27 जुलाई का वो दिन जब वो आईएम शिलांग में लेक्चर दे रहे थे। तभी वह मंच पर गिर पड़े और कुछ ही मिनटों में दुनिया ने अपना सबसे बड़ा प्रेरक, सबसे बड़ा वैज्ञानिक और एक अच्छा इंसान खो दिया। लेकिन उन्होंने जाते-जाते हम सबको एक

    चीज सिखाई कि जीवन की असली उड़ान गरीबी और मुश्किलों से नहीं रुकती। अब्दुल कलाम की जिंदगी हमें बताती है कि अगर एक गरीब नावचालक का बेटा अखबार बेचते-बेचते इंडिया का मिसाइल मैन बन सकता है तो इस दुनिया में हम भी कुछ कर सकते है।

    राय कॉमेंट में बताए।

  • समय के साथ चलो – Motivational Story of a

    Farmer | Hindi Motivation

    भारत के एक हरेभरे गांव में रमेश नाम का किसान रहता था। रमेश मेहनती था, ईमानदार था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी। वह हमेशा पुराने तरीकों से ही खेती करता था। उसके पिताजी ने जिस तरह हल चलाया था, जिस तरह बीज बोए थे, रमेश आज भी वही तरीके अपनाता था। हर दिन वह सुबह सूरज उगने से पहले अपने खेतों में पहुंच जाता। बैलों से हल चलाता, हाथ से बीज बोता और पूरे दिन पसीना बहाता। लेकिन असली

    समस्या यह थी कि दुनिया अब बदल चुकी थी। उसके आसपास के किसान नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे थे। ट्रैक्टर, मोटर, ड्रिप इरीगेशन, अच्छी क्वालिटी के बीज। उससे उनकी फसलें भी ज्यादा होती, मेहनत भी कम लगती और आमदनी भी अच्छी होती। रमेश यह सब देखकर भी अनदेखा कर देता। वो कहता, “मेरे पिताजी ने यही तरीके अपनाए थे। मैं भी इन्हें ही अपनाऊंगा। मशीन पर भरोसा करके किसानी का

    असली मजा नहीं आता। उस गांव के और किसान धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। लेकिन रमेश उसी जगह अटका हुआ था। उसकी हालत ऐसी हो गई थी कि परिवार का गुजारा भी मुश्किल होने लगा। एक दिन गांव में एक नौजवान आया। उसका नाम अर्जुन था। वो शहर से पढ़ाई करके लौटा था। अर्जुन ने देखा कि रमेश अब भी बैलों से ही हल चला रहा है। अर्जुन ने मुस्कुरा कर कहा, “अरे चाचा, आप भी पुराने तरीकों से ही किसाने कर रहे हो।” क्यों ना आप एक ट्रैक्टर किराए पर ले लें। इससे आपका समय भी बचेगा और आपकी पैदावार भी

    बढ़ेगी। रमेश ने हंसते हुए कहा, “अरे बेटा, यह सब दिखावा है। असली किसानी तो पसीना बहाने से होती है। मशीनों में वह आत्मा कहां जो किसान अपने हाथ से काम करने में लाता है।” अर्जुन ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसने मन बना लिया कि रमेश को समय के साथ आगे बढ़ना जरूर सिखाएगा। अगले दिन अर्जुन ने रमेश को अपने घर बुलाया और फिर उन्हें खेतों पर ले गया। वहां उसने रमेश को दिखाया कि कैसे सिर्फ 2 घंटे में ट्रैक्टर से पूरा खेत जोत दिया जाता है जो रमेश अकेले अपने बैल

    से 2 दिन में करता। उसने दिखाया कि नई तकनीक की मदद से पानी की बर्बादी नहीं होती और अच्छी क्वालिटी की फसल भी मिलती है। रमेश हैरान रह गया। उसे लगा कि सचमुच मेहनत तो वही है लेकिन नतीजा कितना अलग है। अर्जुन ने समझाया चाचा समय बदल गया है। बदलते वक्त के साथ हमें भी बदलना पड़ता है। वरना हम पीछे रह जाते हैं। मेहनत जरूरी है लेकिन अकल और मेहनत को मिलाना भी जरूरी है। रमेश को पहली बार महसूस हुआ कि उसकी ज़िद ही उसे गरीबी की तरफ

    धकेल रही थी। आखिरकार रमेश ने अपनी सोच बदली। उसने पहली बार ट्रैक्टर किराया पर लिया। अच्छी क्वालिटी के बीज भी खरीदे और नई सिंचाई तकनीक अपनाई। नतीजा यह हुआ कि उसकी फसल और दो गुना बढ़ गई। उसका परिवार भी खुशहाल था। गांव वाले हैरान थे कि रमेश जैसे जिद्दी किसान ने आखिरकार किस तरह बदलाव को अपना लिया। रमेश अब हर

    किसी से कहता मेरे दोस्तों मेहनत करो लेकिन समय के साथ बदलो। अगर हम अब भी पुराने तरीकों से ही चिपके रहेंगे तो जिंदगी आसान नहीं होगी। बदलाव ही जीवन का नियम है। उस दिन से रमेश की सोच बदल गई। वो गांव के और किसानों को भी समझाने लगा। समय के साथ आगे बढ़ना सीखो। यही असली सफलता है। दोस्तों, समय के साथ आगे बढ़ो। तभी हमारा जीवन

    आसान और सफल बनता है। जो समय के साथ बदलता है वही आगे बढ़ता है। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको यह कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।

  • एक सम्राट कैसे बना साधु – Gautam Buddha Story | बुद्ध की कहानी

    कभी एक समय था जब कपिलवस्तु नगरी का राजकुमार सिद्धार्थ अपने वैभव और सुख सुविधाओं के लिए प्रसिद्ध था। महल के दरवाजे सोने से बने थे और सेवक हमेशा आदेश की प्रतीक्षा में खड़े रहते थे। राजकुमार सिद्धार्थ एक सुंदर बुद्धिमान और करुणामय युवक जिसकी मुस्कान से पूरा महल जगमगा उठता था। लेकिन इस चमकदमक के बीच कहीं ना कहीं उनके

    भीतर एक खालीपन था। एक ऐसा प्रश्न जो उन्हें हर दिन परेशान करता था। क्या यही जीवन का सच्चा उद्देश्य है? क्या केवल सुख सुविधा में जीना ही जीना है? राजा शुद्धोधन उनके पिता नहीं चाहते थे कि सिद्धार्थ का मन सन्यास की ओर जाए। उन्होंने अपने बेटे को दुनिया के दुखों से दूर रखने के लिए हर मनोरंजन और हर खुशी उसके आसपास सजाई। महल के बाहर क्या है? यह

    सिद्धार्थ को कभी देखने नहीं दिया गया। लेकिन नियति को कौन रोक सकता है? एक दिन जब सिद्धार्थ अपने रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकले तो उन्होंने पहली बार जीवन की कठोर सच्चाई देखी। रास्ते में उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा। झुकी हुई कमर, कांपते हुए हाथ और चेहरे पर थकान की लकीरें। सिद्धार्थ ने सारथी से पूछा, “यह क्या है?” सारथी बोला, “यह बुढ़ापा है राजकुमार।” हर मनुष्य को एक दिन बूढ़ा होना पड़ता

    है। सिद्धार्थ स्तब्ध रह गए। पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि यौवन सदा नहीं रहता। कुछ दिन बाद उन्होंने फिर बाहर जाने की अनुमति मांगी। इस बार उन्होंने देखा एक बीमार व्यक्ति जो दर्द से करा रहा था। सिद्धार्थ का दिल पसीज गया। उन्होंने पूछा क्या हर व्यक्ति बीमार पड़ सकता है? सारथी ने सिर झुकाकर कहा, हां राजकुमार यह जीवन का हिस्सा है। तीसरी बार उन्होंने देखा एक

    मृत व्यक्ति जिसे चार लोग कंधे पर उठाकर श्मशान की ओर ले जा रहे थे। सिद्धार्थ की आंखें नम हो गई। उन्होंने धीरे से पूछा, क्या मृत्यु सबको आती है? सारथी ने उत्तर दिया, हां राजकुमार चाहे राजा हो या रंक मृत्यु से कोई नहीं बच सकता। उस रात सिद्धार्थ बहुत देर तक सो नहीं पाए। उनके मन में बस एक ही प्रश्न गूंजता रहा। यदि जीवन का अंत मृत्यु है तो फिर इसका अर्थ क्या है? और फिर एक दिन जब उन्होंने एक साधु को देखा शांत चेहरा

    ना कोई भय ना कोई लालच। बस एक असीम शांति। सिद्धार्थ ने सोचा शायद यही मार्ग है सच्ची शांति का, सच्चे अर्थों में जीवन का। उस रात जब पूरा महल नींद में था। सिद्धार्थ ने एक निर्णय लिया। एक ऐसा निर्णय जिसने इतिहास बदल दिया। उन्होंने अपने नवजात पुत्र राहुल को अंतिम बार देखा। पत्नी यशोधरा की ओर प्यार भरी निगाह डाली। और बिना कुछ कहे चुपचाप महल के द्वार से निकल गए। उनके साथ केवल एक वस्त्र और

    एक संकल्प था। सत्य की खोज का संकल्प वो चल पड़े। जंगलों, पहाड़ों और नदियों के बीच भोजन की तलाश में नहीं बल्कि सत्य की तलाश में। उन्होंने कठोर तपस्या की। वर्षों तक भोजन और सुख का त्याग किया। लेकिन उन्हें अभी भी वो उत्तर नहीं मिला जिसकी उन्हें तलाश थी। एक दिन निराश होकर वह बोधगया के पास एक पीपल वृक्ष के नीचे बैठ गए। उन्होंने मन ही मन कहा

    जब तक सत्य नहीं मिलेगा। मैं यहां से नहीं उठूंगा। दिन बीतते गए, ध्यान गहराता गया और एक रात जब चारों ओर सन्नाटा था। उन्होंने उस सत्य को पा लिया जिसकी उन्हें वर्षों से खोज थी। वो क्षण वही था जब सिद्धार्थ बुद्ध बने। जागे हुए व्यक्ति। अब उन्हें समझ आ गया था। दुख का कारण इच्छा है और शांति का मार्ग त्याग में है। उन्होंने सीखा कि जब मन से लालच, क्रोध और मोह मिट जाता है तभी सच्चा आनंद मिलता है। उस दिन के बाद उन्होंने अपना जीवन दूसरों को सिखाने में लगा

    दिया। उन्होंने कहा सुख बाहर नहीं तुम्हारे भीतर है। जो स्वयं को जीत लेता है वही सच्चा विजेता है। लोग उन्हें गौतम बुद्ध कहने लगे। एक सम्राट जिसने अपने भीतर का राज्य पाया था। उनकी शिक्षा ने पूरी दुनिया को बदल दिया। राजा से लेकर आम इंसान तक हर किसी ने सीखा। जीवन का उद्देश्य सिर्फ जीना नहीं बल्कि समझ कर जीना है। सम्राट से साधु बनने की यात्रा हमें यह

    सिखाती है कि असली सुख, धन, दौलत या वैभव में नहीं बल्कि आत्मिक शांति और आत्मबोध में है। जब हम बाहरी चीजों की तलाश छोड़कर भीतर झांकते हैं, तभी हमें सच्ची स्वतंत्रता मिलती है।

  • 10 रुपया से करोड़ों तक का सफर | Motivational

    Story of a Tea Seller

    ऐसा लड़का जिसने 12 साल की उम्र में पिता को खो दिया। इतनी सी उम्र में पूरे घर का बोझ उसके कंधों पर आ गया। कैसे उसने इतनी गरीबी से करोड़ों का साम्राज्य बनाया। तो चलिए जानते हैं अमन की कहानी। छोटे से गांव से लेकर करोड़ों की सफलता तक की यात्रा। बिहार के छोटे से गांव में अमन नाम का लड़का रहता था। उसके पिता एक साधारण किसान थे जो दिन रात

    मेहनत करते हुए भी अच्छे पैसे नहीं कमा पा रहे थे। अमन की मां दूसरों के घर में काम करके कुछ रुपए कमाती थी। घर में तीन बच्चे थे और अमन सबसे बड़ा था। अमन की उम्र बस 11 साल की थी जब एक दिन उसके पिता खेत से घर लौटे और अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा। गांव में अच्छा इलाज नहीं था और उसी रात अमन के पिता का निधन हो गया। घर में मातम का

    माहौल था। अमन की मां ने रोते हुए कहा, “अमन, तू ही अब घर का सहारा है। बेटा।” अमन की आंखों में आंसू थे लेकिन उसके दिल में एक अजीब सी आग जल रही थी। उसने अपनी मां से कहा मां मैं पढ़ाई नहीं करूंगा। अब मुझे कोई अच्छा सा काम करना है। पर अमन की मां ने मना कर दिया। नहीं बेटा पढ़ाई मत छोड़ना। मैं दिन रात काम करूंगी और घर संभाल लूंगी। लेकिन अमन जानता था कि सिर्फ मां की मेहनत से घर नहीं

    चल सकता। वो अक्सर यह सोचा करता अगर मैं कुछ अच्छा कर पाऊं तो शायद मां की तकलीफें कम हो जाए। एक दिन उसने गांव के किसी व्यक्ति से सुना कि दिल्ली में काम आसानी से मिल जाता है। बस उसी पल उसने फैसला कर लिया। उसने गांव के एक आदमी से कुछ रुपए उधार लिए। छोटे से बैग में दो जोड़े कपड़े डाले और ट्रेन पकड़ ली। जब वो अपने घर से निकला तो मां की आंखों में आंसू थे। मां बार-बार बस एक ही बात कह रही थी। जल्दी लौट आना बेटा। और अमन ने

    मुस्कुराते हुए कहा, “मां जब लौटूंगा ना, तो सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी।” दिल्ली पहुंचकर अमन के सपनों से ज्यादा परेशानियां उसका इंतजार कर रही थी। ना कोई ठिकाना, ना जान पहचान। रात को उसे स्टेशन पर ही सोना पड़ा। जब सुबह उठा, तो जेब में केवल ₹10 बचे थे। भूख लगी थी लेकिन उसने अपने आप से कहा, “अगर अगर यह ₹10 भी खर्च कर दिए, तो कल क्या करूंगा?” वो स्टेशन के पास घूमने लगा। तभी उसने देखा कि लोग हर जगह चाय पी रहे हैं। अमन सोचने लगा अगर यहां इतनी भीड़ है तो क्यों ना मैं भी चाय

    बेचने का काम शुरू करूं। उसने आसपास के चाय वालों से पूछा। भैया अच्छी चाय कैसे बनाते हैं? दुकानदार ने हंसकर कहा, “अबे बच्चे, यह कोई मजाक नहीं है।” अमन बोला, “भैया, जरूरत है। सीखना चाहता हूं।” उस दिन अमन ने ₹10 में चीनी, थोड़ी चाय पत्ती और हल्का दूध खरीदा। उसने किसी से टूटा हुआ बर्तन मांगा और उसी में पहली बार चाय बनाई। पहली बार चाय बनाते समय अमन का हाथ जल गया। दूसरी बार उसकी चाय में नमक पड़ गया। लेकिन तीसरी बार अच्छी चाय बनी। मीठी चाय बनी। उसने किसी चाय वाले से पुरानी केतली मांगी और स्टेशन पर निकल पड़ा। गरम चाय, गरम

    चाय। पहले ग्राहक ने चाय पी और अमन को ₹3 दिए। अमन की आंखों में ऐसी चमक आई जैसे उसने करोड़ों रुपए कमा लिए हो। शुरुआत के दिन आसान नहीं थे। कभी दूध कम पड़ जाता, कभी चाय जल जाती। कभी अमन पूरे दिन में सिर्फ ₹30 ही कमा पाता था। रात को स्टेशन पर ही सोना पड़ता था। एक दिन बरसात में भीगते हुए उसने अपने आप से कहा, शायद मैंने गलती कर दी। उसने घर फोन किया। मां ने पूछा तू कैसा है अमन? अमन ने झूठी मुस्कान के साथ कहा, बहुत अच्छा हूं मां तू फिक्र मत करना। लेकिन फोन रखने के बाद उसकी आंखों में आंसू थे। उस रात अमन ने अपने आप से वादा किया मैं हार नहीं मानूंगा। जो भी हो मैं

    सफल बनकर दिखाऊंगा। धीरे-धीरे लोग अमन को पहचानने लगे। स्टेशन के यात्री कहते अरे वो मुस्कुराने वाला चाय वाला आ गया। अमन हमेशा हर ग्राहक से मुस्कुरा कर बोलता धन्यवाद सर। फिर आइएगा। लोगों को उसका व्यवहार अच्छा लगता। कुछ महीनों बाद एक ऑफिस के कर्मचारी ने उससे कहा, “अरे भाई, रोज हमारे ऑफिस में आकर चाय दे दिया कर। हम रोज तुझे पैसे दे देंगे।” यह अमन के लिए एक अच्छा मौका था। अब उसकी रोज की कमाई ₹200 ₹300 तक आ गई थी। उसने छोटा सा कमरा किराए पर लिया और चाय

    बेचने के लिए स्टॉल भी खरीदा। लेकिन अमन इस चीज से अनजान था कि एक बहुत बड़ा मौका उसका इंतजार कर रहा है। एक दिन बड़ी कंपनी का ड्राइवर अमन के यहां चाय पीने आया। उसने अमन की चाय पी और उससे बोला साहब कह रहे हैं कि तुम बहुत अच्छी चाय बनाते हो। वो तुमसे मिलना चाहते हैं। अमन कुछ घबराया लेकिन वो हिम्मत जुटाकर मिलने चला गया। साहब ने पूछा अरे बेटा तुम कहां से हो? अमन ने सब कुछ ईमानदारी से बता दिया। साहब बोले वाह तुम बहुत हिम्मत वाले लड़के हो बेटा। मैं तुम्हारी मदद करना

    चाहता हूं। मैं बड़ी कंपनी चलाता हूं। तुम मेरी कंपनी में आकर अपनी चाय बेचो। रोज तुम्हें 200 आदमियों के लिए दो टाइम चाय बनानी है। अमन को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। 200 लोगों के लिए रोज दो वक्त चाय बनाना। अमन के लिए यह किसी सपने की तरह था। अमन ने हां कह दी। उसने दो लड़के रखे, बड़े बर्तन खरीदे और पूरी मेहनत से काम शुरू किया। धीरे-धीरे उसके पास और भी कंपनियों के ऑर्डर आने लगे। अब अमन अपने आप को एक बिजनेसमैन की तरह देखने लगा। उसने अपने काम का नाम रखा अमन टी सर्विस।

    2 साल बाद अमन ने एक बड़ी दुकान खोली। अब उसके साथ 10 लोग काम करते थे। वो सिर्फ चाय नहीं बल्कि नाश्ता भी बेचने लगा। एक दिन अमन को नया आईडिया आया। क्यों ना मैं अपनी चाय को पैकेट में बेचना शुरू करूं। उसने मार्केट रिसर्च की और पाया कि लोग अपने घर के लिए अच्छी क्वालिटी की चाय ढूंढते हैं। अमन ने एक मशीन खरीदी और अपनी चाय को नाम दिया अमन स्पेशल टी। धीरे-धीरे उसकी पैकेट वाली चाय लोगों के बीच मशहूर हो गई। एक दिन बड़े मॉल के मैनेजर ने अमन से बात की और उससे कहा, “हें हर महीने

    5,000 पैकेट चाहिए।” अमन को यकीन नहीं हुआ। उसने तुरंत छोटी सी फैक्ट्री का इंतजाम किया और 50 लोगों को नौकरी दी। अब उसकी हर महीने की कमाई 10 लाख तक पहुंच गई थी। सब कुछ अच्छा चल रहा था। लेकिन उसी वक्त अमन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई। डॉक्टर्स ने कहा ऑपरेशन करना पड़ेगा और ₹1 लाख लगेंगे। अमन के पास इतने पैसे नहीं थे। सारे पैसे उसने बिजनेस में लगा दिए थे। उसने अपनी कुछ मशीनें बेची और मां का इलाज कराया। जब मां का ऑपरेशन हो गया तो अमन ने उन्हें दिल्ली बुला लिया। जब अमन की मां ने उसकी फैक्ट्री देखी तो उनकी

    आंखों से आंसू बह निकले। आज अमन 28 साल का है और उसकी कंपनी अमन टी कॉरपोरेशन का हर साल का टर्नओवर 20 करोड़ है। तीन फैक्ट्रियों में 300 से अधिक वर्कर्स हैं। अब अमन की चाय 12 राज्यों में बिकती है और उसने ऑनलाइन बिजनेस भी शुरू कर दिया है। लेकिन आज भी जब वो अपनी फैक्ट्री में जाता है तो सबसे पहले खुद चाय बनाता है और यह कहता है कि यह चाय मुझे याद दिलाती है कि मैं कहां से आया था। पिछले साल अमन जब अपने गांव लौटा तो गांव वालों को यकीन नहीं हुआ कि यह वही लड़का है जो

    कभी हमसे कुछ रुपए उधार लेकर गया था। दोस्तों जब आप अगली बार चाय पिए तो अमन की कहानी जरूर याद कीजिएगा क्योंकि जब एक गरीब लड़का ₹10 से शुरुआत करके करोड़ों तक पहुंच सकता है तो आप भी अपने सपने पूरे कर सकते हैं। हर बड़ी सफलता की शुरुआत सिर्फ एक ही कदम से होती है। बस आपको जरूरत है हिम्मत की, खुद पर विश्वास की और अटूट मेहनत की। और हां अगर आपको यह कहानी पसंद आई है तो आपको यह दूसरी कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।

  • सोच को साफ कैसे रखें | Story of Two Monk | Motivational Story

    बहुत समय पहले की बात है। घने जंगल के बीचों-बीच दो युवा बुद्ध साधु सूरज और नीरज अपने आश्रम लौट रहे थे। आसमान में फैला सुनहरा सूरज मिट्टी की हल्की सुगंध और हर तरफ बिखरी हुई शांति उनकी साधना की गहराई को और बढ़ा रही थी। दोनों के चेहरों पर शांति की एक अलग ही चमक थी। जैसे-जैसे वह जंगल के भीतर आगे बढ़ते गए, अचानक उन्हें किसी की आवाज सुनाई दी। दोनों ने अपना चलना रोक दिया। आगे

    बढ़कर देखा तो एक महिला कीचड़ के बड़े गड्ढे में बुरी तरह फंसी हुई है। उसके कपड़े कीचड़ से लथपथ हैं और उसका चेहरा डरा हुआ है। वो कीचड़ से बाहर निकलने के लिए अपने हाथ पैर मार रही है। महिला दोनों साधुओं को देखकर बोली कृपया मेरी मदद कीजिए। मैं यहां से बाहर नहीं निकल पा रही हूं। महिला की बात सुनकर सूरज झिझक गया। उसके मन में विचारों का तूफान उठने लगा। उसने सोचा मुझे इस महिला को निकालने

    के लिए इसे हाथ लगाना पड़ेगा। कीचड़ में उतरना पड़ेगा कि यह तो नियमों के विपरीत है और क्या ऐसा करना सही होगा? सन्यासियों के लिए किसी भी महिला को हाथ लगाना अनुचित होता है। सूरज असमंजस में वहीं खड़ा रहा। वो महिला की हालत देखकर दुविधा में था लेकिन उसने कदम आगे नहीं बढ़ाया। उधर नीरज बिना एक भी पल गवाए तुरंत कीचड़ में उतरा। उसने अपना हाथ महिला की ओर बढ़ाया और उससे कहा, डरिए

    मत, मेरा हाथ पकड़ लीजिए। महिला ने अपने कांपते हाथों से नीरज का हाथ पकड़ा। कीचड़ में उसके हाथ पैर फिसल रहे थे। लेकिन नीरज पूरी हिम्मत लगाकर उसे ऊपर खींच रहा था। महिला का हाथ और कसता जा रहा था। मानो वह जीवन की आखिरी उम्मीद को पकड़ कर बैठी हो। कुछ ही क्षणों में नीरज उस महिला को सुरक्षित बाहर निकाल लेता है। महिला की सांस अब भी तेज चल रही थी। लेकिन उसके चेहरे पर कृतज्ञता थी। वो बोली धन्यवाद। अगर आप ना होते तो शायद मैं बाहर नहीं निकल पाती। नीरज मुस्कुराया और बोला आप

    सुरक्षित हैं। बस इतना ही काफी है। महिला अपने रास्ते चली गई और वह दोनों साधु भी आगे बढ़ने लगे। लेकिन सूरज के मन में अब तूफान और भी तेज हो चुका था। वो लगातार सोचता जा रहा था इसने किसी महिला को हाथ कैसे लगाया? वो भी इतने नजदीक जाकर यह तो नियमों के विरुद्ध है। जंगल का रास्ता लंबा था लेकिन हर तरफ शांति फैली हुई थी। लेकिन सूरज का मन

    बिल्कुल भी शांत नहीं था। वो पूरे रास्ते बार-बार उसी घटना को दिमाग में दोहरा रहा था। आखिरकार 2 घंटे चलने के बाद वह दोनों आश्रम पहुंचे। आश्रम में प्रवेश करते ही सूरज आखिर अपनी बात रोक ना सका। वो नीरज की ओर मुड़ा और लगभग गुस्से से बोला, तुमने उस महिला को हाथ कैसे लगाया? तुम उसके इतने नजदीक कैसे गए? क्या तुम्हें जरा भी संकोच नहीं हुआ? क्या तुम नियम भूल गए हो? नीरज अभी भी शांत था।

    उसने हल्की मुस्कुराहट के साथ कहा, सूरज, मैंने उस महिला को कीचड़ से निकालकर उसी समय वहीं छोड़ दिया था। लेकिन तुम तो उसे अभी तक अपने मन में ढो रहे हो। तुम पूरी यात्रा उसके विचारों में उलझे रहे। तुम्हारा मन उस कीचड़ से भी ज्यादा गंदा हो गया क्योंकि तुम अपने विचारों को शुद्ध नहीं रख पाए। सूरज पत्थर बन गया। उसे एहसास हुआ कि उसने पूरे रास्ते अपने साथी के बारे में संदेह किया और आलोचना भरे

    विचार अपने मन में रखे। जबकि उसका मित्र तो केवल किसी की मदद कर रहा था। धीरे-धीरे उसका सिर झुक गया। उसने विनम्रता से कहा, मित्र, असल में मेरी सोच ही अशुद्ध थी। नीरज मुस्कुराया और बोला गलती करना मनुष्य का स्वभाव है लेकिन उससे सीख लेना ही बुद्ध का मार्ग है। दूसरों की मदद करना पाप नहीं लेकिन गलत सोच रखना सबसे बड़ा पाप

  • भीख से Gold Medal तक की कहानी | Milkha Singh Motivational Story

    खालिक को हरा दिया। रेस पूरी होने के बाद उस वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खान ने कहा, मिल्खा सिंह तुम तो सच में उड़ते हो। तुम फ्लाइंग सिख हो। और यहीं से उनका नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया। इसके बाद

    भी उन्होंने कई इंटरनेशनल कंपटीशन में इंडिया का नाम रोशन किया। उन्हें पद्मश्री अवार्ड दिया गया और इंडियन एथलेटिक्स में उन्होंने अपना एक नाम बनाया। रिटायरमेंट के बाद वह युवाओं को सिखाते कि हर दौड़ सिर्फ मैदान में नहीं होती। असली दौड़ तो जिंदगी में होती है

    और उसे जीतने के लिए जुनून और अनुशासन चाहिए होता है। मिल्खा सिंह ने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी। उन्होंने गरीबी, दर्द और असफलता हर किसी को हार दी। उन्होंने हम सबको सिखाया कि अगर इंसान अपना मन बना ले तो कोई दीवार इतनी ऊंची नहीं जो उसे रोक सके।

  • Life Changing Story – पिछले कर्मों को भूल जाओ | Motivational Story

    एक समय की बात है। भारत के एक छोटे से गांव में बिरजू नाम का आदमी रहता था। लोग उसे चोर के नाम से जानते थे। सालों तक उसने गांव और आसपास के इलाकों में चोरी की थी। खेतों से अनाज, घरों से सामान और यहां तक कि कभी-कभी मवेशी तक चुराना उसकी

    आदत बन गई थी। हर दिन वह डर और लालच के बीच जीता। चोरी करने के बाद छिपकर सोना, पुलिस और गांव वालों से बचना यही उसकी जिंदगी थी। लेकिन धीरे-धीरे उसके भीतर अपराध बोध भरने लगा। उसे समझ आने लगा कि यह रास्ता सिर्फ उसे और गहरे अंधेरे में ले जा रहा है। फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने उसकी जिंदगी बदल दी। चोरी

    करते हुए वह पकड़ा गया। गांव वालों ने उसे खूब कोसा। अपमानित किया और उसके परिवार तक को ताने दिए। उस रात उसने खुद से वादा किया। अब कभी चोरी नहीं करूंगा। क्योंकि उस रात उसके भीतर इंसानियत जाग उठी थी। उसने तय किया कि मेहनत से जीना होगा। अगले ही दिन उसने गांव के एक किसान के खेत में मजदूरी शुरू कर दी। पसीना बहा

    भूख सही लेकिन मन को पहली बार सुकून मिला। लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं हुई। हर जगह लोग उसके अतीत को उसके सामने फेंकते और उसे कहते अरे यह तो वही चोर है। सावधान रहना कहीं जेब ना काट ले। बिरजू कभी सुधर नहीं सकता है। ऐसा कई दिन तक चलता रहा। बिरजू रोज गांव वालों के ताने सुनता। इन तानों ने उसके दिल पर बोझ डाल

    दिया। भले ही उसने चोरी छोड़ दी थी पर उसका अतीत उसकी छाया बनकर उसके पीछे चलता रहा। वह अपने आप से सवाल करता क्या मैं सच में बदल सकता हूं? या मैं हमेशा चोर ही कहलाऊंगा। बिरजू हर समय उदास रहने लगा। तभी एक दिन खेत के किनारे उसे गांव का एक बुजुर्ग मिला। सफेद दाढ़ी, झुकी

    कमर और आंखों में गहरी चमक। उन्होंने बीरजू से पूछा क्यों उदास बैठा है बेटा? बीरजू ने आंसू भरकर अपनी कहानी कह दी। बाबा मैंने चोरी छोड़ दी है। अब मेहनत करता हूं लेकिन लोग मुझे मेरा अतीत बार-बार याद दिलाते हैं। मैं चाहे कितना भी बदल जाऊं मेरे पुराने कर्म मेरा पीछा नहीं छोड़ते। बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा, बेटा जब बैल खेत जोतता है तो उसके पैरों के पीछे मिट्टी बिखरती है। अगर वह बार-बार पीछे मुड़कर देखेगा तो आगे बढ़ नहीं पाएगा। जिंदगी भी ऐसी ही है। तेरे कदमों के पीछे तेरा अतीत

    है। पर तुझे देखना आगे है। फिर उन्होंने अपनी हथेली पर थोड़ी मिट्टी उठाई और बोले, “यह देख यह मिट्टी बीते हुए कल की तरह है। अगर इसे मुट्ठी में पकड़े रहोगे, तो यह भारी लगने लगेगी। लेकिन अगर इसे छोड़ दोगे तो हाथ खाली और हल्का हो जाएगा। अपने कल को छोड़ो। तभी जीवन आसान होगा। यह शब्द बीरजू के दिल में उतर गए। उसने महसूस किया कि लोग चाहे जो कहें असली आजादी तब है

    जब इंसान खुद अपने अतीत को ढोना छोड़ दे। उस दिन के बाद बीरजू ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने पूरी लगन से खेतों में काम किया। गांव के कामों में हाथ बंटाया और धीरे-धीरे लोग भी उसे सम्मान देने लगे। कुछ सालों बाद वही लोग जो उसे चोर कहते थे अब उसे बीरजू भैया कहकर पुकारने लगे क्योंकि उसने

    अपने कल का बोझ छोड़ दिया था। अपने कल को भूल जाओ अतीत तुम्हें रोकने के लिए है। लेकिन भविष्य तुम्हें आगे बढ़ाने के लिए है। जब तक तुम अपने पुराने कर्मों का बोझ ढोते रहोगे। आज का सुख और आने वाला कल तुम्हारे हाथ से फिसल जाएगा।

  • एक खिलाडी कैसे बना God of Cricket | Sachin Tendulkar Story

    साल था 1989। इंडिया पाकिस्तान के एक मैच के दौरान जब पाकिस्तान के तेज गेंदबाजों ने मैच को इंडिया से छीन ही लिया था तब बैटिंग करने आया एक 16 साल का लड़का और शुरुआत की बॉल पर ही अपनी नाक तुड़वा बैठा। पिच पर डॉक्टर्स आए और उस बच्चे से

    कहने लगे कि चलो तुम जख्मी हो चुके हो। अब तुम्हें आराम करना होगा। लेकिन उस बच्चे ने जो कहा वो इतिहास में दर्ज हो गया। मैं खेलेगा। इतनी सी उम्र में जिसके अंदर क्रिकेट को लेकर ऐसा जज्बा हो वही बन सकता है भारतीय क्रिकेट इतिहास का सबसे अच्छा बैट्समैन

    सचिन तेंदुलकर। सचिन का जन्म 24 अप्रैल 1973 को मुंबई के एक मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता एक लेखक थे और उनकी मां एक इंश्योरेंस कंपनी में काम करती थी। सचिन बचपन से ही बहुत शरारती थे। स्कूल में पढ़ाई लिखाई से ज्यादा वो खेलकूद में दिलचस्पी

    लिया करते थे। कभी अपनी बॉल से किसी के घर का कांच तोड़ दिया तो कभी किसी की दीवार गंदी कर दी। लेकिन सचिन की जिंदगी का असली मोड़ उस वक्त आया जब उनके बड़े भाई अजीत ने उन्हें क्रिकेट खेलते देखा। शायद उन्होंने सचिन के अंदर छुपे हुनर को पहचाना

    और वह सचिन को शिवाजी पार्क ले गए। जहां कोच रमाकांत आचरेकर नेट्स लगवाया करते थे। आचरेकर ने पहली ही बार सचिन की आंखों में वह चमक देख ली। वो जुनून जो किसी भी खिलाड़ी को महान बना सकता है। उन्होंने सचिन से कहा अगर तू दिल से खेलेगा तो एक दिन देश का नाम रोशन कर सकता है।

    और उस वक्त सचिन ने मान लिया कि अब से क्रिकेट ही उनकी जिंदगी है। उस दिन से उनकी सुबह शुरू होती बल्ले से और रात खत्म होती बल्लेबाज बनने के सपने से। धूप में झुलसते, बारिश में फिसलते, क्रिकेट पिच पर गिरते लेकिन कभी रुकते नहीं। कई बार सचिन ट्रेन छूटने के डर से स्कूल का बैग तक छोड़ देते

    लेकिन कभी प्रैक्टिस मिस नहीं करते और इसी तरह सचिन की बैटिंग और बेहतरीन होती गई और उनका इंडियन टीम में सिलेक्शन हो गया और फिर आया साल 1989 जब सिर्फ 16 साल की उम्र में सचिन तेंदुलकर ने पाकिस्तान के खिलाफ अपना डेब्यू किया। उनके सामने थे वसीम अकरम, इमरान खान और वकार यूनुस जैसे गेंदबाज। हर बॉल जैसे आग उगल रही थी। लेकिन उस नन्हे से चेहरे में एक

    आत्मविश्वास था और उस मैच में बुरी तरह घायल होने के बाद भी 16 साल के बच्चे ने उस हारे हुए मैच को ड्रॉ करा कर इंडिया को बचाया। धीरे-धीरे यह बच्चा बढ़ता गया और दुनिया झुकती गई। उसका हर शॉट एक जवाब था। हर रन एक अलग कहानी थी। वो सिर्फ बल्लेबाज नहीं था। वो इंडिया के लिए एक उम्मीद बन गया था। 1990 में एक सीरीज से लौटते हुए

    एयरपोर्ट पर सचिन की मुलाकात हुई अंजलि से और यहीं से सचिन को अपनी जीवन साथी मिल गई। 1995 में सचिन ने अंजलि से शादी की। 1998 का साल आया और सचिन बन गए शारजा के रेगिस्तान का सम्राट ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी डेजर्ट स्टॉर्म इनिंग्स आज भी इतिहास में दर्ज है। रेत उड़ रही थी। आसमान से बिजली गिर रही थी। लेकिन उस वक्त सचिन की बैटिंग ने तूफान को भी मात दे दी थी।

    उन्होंने अकेले अपने दम पर इंडिया को जीत दिलाई और दुनिया ने कहा यह सिर्फ एक बैट्समैन नहीं है। यह क्रिकेट का चमत्कार है। लेकिन सचिन की जिंदगी हमेशा आसान नहीं थी। 2000 के दशक की शुरुआत में उन्हें लगातार इंजरीज होती गई। कभी बैक पेन, कभी टेनिस एल्बो। कई लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि अब उनका समय खत्म हो गया। लेकिन सचिन जानते थे कि अब उनके और

    मेहनत करने का समय आ गया है। वो लौटे और ऐसा लौटे कि इतिहास लिख दिया। 2010 में उन्होंने वो किया जो किसी ने नहीं किया था। वन डे में डबल सेंचुरी लगाने वाले फर्स्ट क्रिकेटर बने। पूरा इंडिया झूम उठा और पूरा क्रिकेट इतिहास बदल गया और फिर आया 2011 वर्ल्ड कप। हर खिलाड़ी की आंखों में एक ही सपना था। सचिन के लिए वर्ल्ड कप। मुंबई का वानखेड़े स्टेडियम सचिन के नारों से गूंज उठा।

    इंडिया ने वर्ल्ड कप जीता और सचिन की आंखों में वह आंसू थे जो एक सदी की मेहनत का प्रतीक थे। सचिन ने 24 इयर्स तक क्रिकेट खेला। 200 टेस्ट, 100 सेंचुरी, 34,000 प्लस रंस। लेकिन असली रन उन्होंने लोगों के दिलों में बनाए। जब उन्होंने वानखेड़े स्टेडियम में आखिरी बार अपना बल्ला घुमाया तो पूरा इंडिया रो पड़ा। उन्होंने अपना सिर झुका कर

    कहा, “मेरा सपना सिर्फ मेरा नहीं था। यह पूरे इंडिया का सपना था।” रिटायरमेंट के बाद भी सचिन रुके नहीं। वह आज भी युवाओं को प्रेरित करते हैं। समाज सेवा करते हैं और अपने काम से सिखाते हैं कि टैलेंट ईश्वर देता है। लेकिन महानता मेहनत से बनती है। सचिन तेंदुलकर सिर्फ एक नाम नहीं एक युग है।

    उन्होंने हमें सिखाया कद छोटा होना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन तुम्हारा सपना और तुम्हारा विश्वास बड़ा होना चाहिए।

  • प्यार में टूटा… लेकिन बना IAS ऑफिसर / UPSC Motivational Video UPSC Motivation / Study Motivation / IAS Motivational Story

    एक ऐसा लड़का जो जिंदगी से हार चुका था जो आत्महत्या करने के लिए फांसी के फंदे को गले लगाने वाला था। वो कैसे एक आईएएस ऑफिसर बना और जवाब दिया उन लोगों को जिसने उसे दर्द पहुंचाया। आइए जानते हैं अर्जुन की कहानी। दिल्ली के एक मिडिल क्लास घर में रहता था अर्जुन। पढ़ाई में वो ज्यादा अच्छा नहीं था, लेकिन अपने मां-बाप का

    लाडला था। अर्जुन के पिता एक दुकान चलाते थे और उसकी मां ग्रहणी थी। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब अर्जुन कॉलेज जाने लगा था। अर्जुन हमेशा से बस यही सोचता कि पढ़ाई करके कोई छोटी-मोटी सरकारी नौकरी मिल जाए तो जिंदगी बन जाएगी। लेकिन वो यह नहीं जानता था कि जिंदगी ने उसके लिए कुछ और ही सोच रखा है। अर्जुन को कॉलेज

    जाते हुए कई महीने बीत चुके थे और एक दिन उसकी मुलाकात हुई अनन्या से। अनन्या अर्जुन की ही क्लास में थी। लेकिन आज उसने उसे पहली बार देखा था। दोनों को साहित्य और कविताओं में बहुत ज्यादा इंटरेस्ट था। धीरे-धीरे उन दोनों के बीच बातें बढ़ने लगी और देखते ही देखते वक्त पंख लगाकर उड़ गया। एक दिन लाइब्रेरी में अनन्या ने कहा, “अर्जुन, मैं

    बचपन से आईपीएस अफसर बनने का सपना देखती आई हूं।” विवेक मुस्कुराया और बोला, वाह, बहुत ही बड़ा सपना है। अनन्या ने जवाब दिया और तुम्हारा सपना? अर्जुन ने हंसते हुए कहा, “अभी तक तो कोई नहीं है।” अनन्या बोली, तो फिर आज से तुम्हारा सपना मेरा साथ देना होगा। तुम्हें भी यूपीएससी की तैयारी करनी चाहिए। अर्जुन अनन्या ने जिस तरह

    अर्जुन को यूपीएससी की तैयारी करने के लिए बोला था, अर्जुन बिल्कुल मना नहीं कर पाया। अर्जुन को उसका आत्मविश्वास अच्छा लगा और उसने भी मन बना लिया कि अब उसका लक्ष्य यूपीएससी पास करके अफसर बनना है। लेकिन वो यह नहीं जानता था कि यूपीएससी की परीक्षा उसकी जिंदगी की सबसे मुश्किल परीक्षा होने वाली है। दोनों ने एक साथ पढ़ाई शुरू की। लाइब्रेरी में दिन रात एक कर

    दिए। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती एक अच्छे रिश्ते में बदल गई। और एक दिन अर्जुन ने हिम्मत जुटाकर अनन्या से कहा, “न्या, मुझे तुमसे प्यार हो गया है।” अनन्या मुस्कुराई। उसकी आंखों में भी वही फीलिंग्स थी जो अर्जुन की आंखों में थी। दोनों का रिश्ता अब सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उनके सपनों तक फैल गया। कॉलेज खत्म हुआ। अर्जुन और अनन्या दोनों उस कॉलेज के टॉप स्टूडेंट रहे। बस अब उनकी एक मंजिल थी यूपीएससी। उन्होंने तीनों

    एग्जाम्स, प्रीलिम्स, मेंस और इंटरव्यू की तैयारी एक साथ की। दिनरा पढ़ते, नोट्स बनाते और एक दूसरे का हौसला बढ़ाते। तीनों एग्जाम हो चुके थे। अर्जुन को पूरा विश्वास था कि अनन्या एक बार में ही यह एग्जाम क्लियर कर देगी और इसी विश्वास के बीच वो अपने आप पर विश्वास करना भूल गया था। रिजल्ट का दिन आया। दोनों के दिल जोर से धड़क रहे थे और हाथ कांप रहे थे। पर किस्मत का खेल देखिए। अनन्या ने टॉप रैंक हासिल की और अर्जुन कुछ नंबर से फेल हो गया। वो पल अर्जुन के लिए सबसे भारी था। लेकिन अनन्या ने उसका हाथ पकड़ कर कहा,

    अर्जुन एक बार की हार से कुछ नहीं होता। तुम्हें एक बात और कोशिश करनी चाहिए। मैं हूं तुम्हारे साथ। यह शब्द अर्जुन के अंदर आग की तरह उतर गए। उसने मन बना लिया कि अब उसे या तो मर जाना है या यूपीएससी क्लियर करना है। अर्जुन अपनी पढ़ाई में और डूब गया। दुनिया से यहां तक कि अनन्या से भी दूर हो गया। वह दिन रात बस किताबों में घुल

    गया। उसे नहीं पता था कि अब जिंदगी एक और इम्तिहान लेने वाली है। कुछ महीनों बाद अर्जुन ने सोचा कि अब मुझे अनन्या से मिलना चाहिए। वो उसके घर पहुंचा। दिल में खुशी थी कि अब दोनों एक साथ बैठकर आगे की तैयारी पर बात करेंगे। लेकिन अर्जुन यह नहीं जानता था कि उसकी जिंदगी कोई और मोड़ लेने वाली है। जब वो अनन्या के घर पहुंचा, वहां जो उसे पता चला वो सुनकर वह जैसे पत्थर बन गया। अनन्या के माता-पिता ने बताया कि 2 महीने

    बाद अनन्या की शादी है। अर्जुन के पैरों तले जैसे जमीन ही खिसक गई। वो भागता हुआ अनन्या के कमरे में पहुंचा। अनन्या वहीं थी। पर उसकी आंखों में अब वो चमक नहीं थी जो कभी हुआ करती थी। अर्जुन ने कांपती आवाज में उससे पूछा, “यह सब क्या है अनन्या? शादी?” अनन्या ने शांत आवाज में कहा, हां अर्जुन, मैं अरुण से शादी कर रही हूं। मैं तुम्हें अपनी शादी में जरूर बुलाऊंगी। अनन्या के चेहरे पर ना कोई शर्म थी, ना ही पछतावा। अर्जुन की आंखें नम हो चुकी थी। वो कुछ बोले बिना वहां से चला

    गया। अब तक जो सपना उसके जीने का मकसद था, वो अब उसके लिए बोझ बन चुका था। दिन भर सन्नाटा, रात भर जागना, नदी किनारे बैठकर भी वह अपने आप को घुटा हुआ महसूस कर रहा था। हर बार अपने आप से बस एक ही सवाल करता। क्यों हुआ यह मेरे साथ? एक हफ्ते तक अर्जुन ने अपने आप को कमरे में बंद रखा और फिर एक दिन उसने वो किया जो किसी को नहीं करना चाहिए। वो पंखे से रस्सी बांधकर कुर्सी पर बैठ गया। आंखों में आंसू,

    दिल में खालीपन, अर्जुन को लग रहा था कि वह हार चुका है। लेकिन जैसे ही उसने ऊपर देखा, दीवार पर टंगी अपने माता-पिता की तस्वीर दिखाई दी। उनकी मुस्कान ने जैसे उसे रोक लिया। वो तस्वीर जैसे उसे कुछ बता रही है। अर्जुन, यह जिंदगी सिर्फ तुम्हारी नहीं हमारी भी है। अर्जुन वहीं जमीन पर बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। उसने रस्सी काठ फेंकी और यह फैसला किया कि अब वह अपने माता-पिता के लिए जिएगा और उन्हें गर्व महसूस कराएगा। उस दिन से उसकी जिंदगी बदल गई। वो अब वो अर्जुन नहीं था जो पहले था। अब उसके अंदर गम नहीं

    जुनून जल रहा था। वो अपनी पढ़ाई में ऐसा डूब गया कि दिन रात एक कर दिए। हर दर्द का जवाब उसने अपनी मेहनत से दिया। दिन बीतते गए महीने गुजर गए और फिर आया वो दिन। यूपीएससी रिजल्ट का दिन। इस बार विवेक ने ना सिर्फ यूपीएससी क्लियर किया बल्कि टॉप रैंक हासिल की। वो अब एक आईएएस अफसर बन चुका था। जब उसने अपने

    माता-पिता को यह खबर दी तो उनकी आंखों में खुशी और गर्व के आंसू थे। उनकी मुस्कुराहट को देखकर अर्जुन को लगा जैसे उसने पूरी दुनिया जीत ली। आज अर्जुन एक ईमानदार आईएएस अधिकारी है। उसकी कहानी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो जिंदगी की मुश्किलों से हार मान लेते हैं। दोस्तों जब जिंदगी हमें दर्द देने पर आती है तो हमें उससे कोई रहम की

    उम्मीद नहीं करनी चाहिए। जिंदगी जब तुम्हें गिरा है तो उसे हार की तरह नहीं सबक की तरह समझो। क्योंकि असली जीत उन्हीं की होती है जो हारने के बाद भी कोशिश करना नहीं छोड़ते। और अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी है तो आपको एक बच्चे की यह कहानी भी जरूर सुननी चाहिए।