
यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसे बचपन में लोग मंदबुद्धि कहते थे। जिसे उसके स्कूल से निकाल दिया गया। जो बोलना तक देर से सीखा जिसे दुनिया ने हर बार बताया कि वो पागल है। वो कुछ नहीं कर पाएगा। लेकिन उसी लड़के ने आगे चलकर दुनिया की सोच बदल
दी। यह कहानी उस इंसान की है जिसने ब्रह्मांड के नियम समझे। अल्बर्ट आइंस्टीन। अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म 14th मार्च 1879 को जर्मनी के एक शहर उल्म में हुआ था। उनका बचपन आम नहीं था। वह कम बोला करते थे और हर चीज को धीरे-धीरे सीखते थे। वे दूसरे बच्चों से हमेशा अलग रहा करते थे। घर में उनके माता-पिता यह चिंता करते क्या यह बच्चा सामान्य है? लेकिन आइंस्टीन के दिमाग में एक ऐसी दुनिया थी जिसे आम इंसान देख ही नहीं सकता था। स्कूल में तो उनका हाल और भी खराब था। उनके टीचर कहते यह बच्चा बेकार है। इससे कुछ नहीं होगा। सख्त
नियम, रटी हुई शिक्षा। आइंस्टीन को इन सब से नफरत थी। एक दिन तो उनके प्रिंसिपल ने यहां तक कह दिया तुम स्कूल की इज्जत गिराते हो। तुमसे कभी कुछ नहीं होगा। लेकिन यही वो लड़का था जो आगे चलकर फिजिक्स का चेहरा हमेशा के लिए बदल देने वाला था। 16 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और अपने
परिवार के पास स्विट्जरलैंड चले गए। वहां भी उन्हें कई रिजेक्शन मिले। यूनिवर्सिटी ने पहले उन्हें स्वीकार नहीं किया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। फिजिक्स और मैथ उनका जुनून थे और इसी जुनून ने उन्हें आगे बढ़ाया। डिग्री पूरी करने के बाद भी उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी। इतना महान दिमाग और कोई नौकरी देने को तैयार नहीं। आखिरकार उन्हें एक छोटा सा जॉब मिला। स्विस पेटेंट ऑफिस में क्लर्क की नौकरी। लेकिन यही वो जगह थी जिसने
आइंस्टीन का इतिहास हमेशा के लिए बदल दिया। स्विस पेटेंट ऑफिस में बैठकर आइंस्टीन हर किसी के आविष्कार जांचते थे। लेकिन उनके दिमाग में ब्रह्मांड के रहस्य उबल रहे थे। अपना काम पूरा करने के बाद वह देर रात तक कागजों पर समीकरण लिखा करते। समय क्या है? रोशनी कैसे चलती है? ब्रह्मांड कैसे काम करता है? हर कोई अपनी जिंदगी में खोया था। लेकिन आइंस्टीन अपनी कल्पना की दुनिया में खोए रहते थे। और फिर आया सन 1905 और यह साल विज्ञान का चमत्कार वर्ष बन गया। सिर्फ एक साल में उन्होंने ऐसी रिसर्च पब्लिश
की जो दुनिया को हिला देने वाली थी। यही वो साल था जब इंसानी इतिहास की सबसे मशहूर समीकरण जन्मी e = mc² यानी ऊर्जा और द्रव्य असल में एक ही चीज है। ये समीकरण इतनी शक्तिशाली थी कि आगे चलकर इसी के सिद्धांत पर एटम बम से लेकर न्यूक्लियर वेपन हर चीज बनी। दुनिया हैरान थी एक मामूली पेटेंट क्लर्क ने फिजिक्स का पूरा खेल ही बदल दिया। इसके बाद उन्होंने द थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी दी। एक ऐसी थ्योरी जिसने ब्रह्मांड, स्पेस और ग्रेविटी को समझकर पूरी तरह नया रूप दे दिया। आइंस्टीन कहा करते थे कल्पना ज्ञान से बड़ी होती है और उन्होंने साबित कर
दिया कि सिर्फ कल्पना से यूनिवर्स के नियम लिखे जा सकते हैं। सन 1920 में आइंस्टीन को नोबेल प्राइज दिया गया। आइंस्टीन जितने महान वैज्ञानिक थे, उतने ही अच्छे इंसान भी। वह युद्ध और हिंसा के खिलाफ थे। लेकिन जब दुनिया दूसरे विश्व युद्ध में जल रही थी तब उन्होंने अमेरिकी सरकार को चेतावनी दी कि जर्मनी एटम बम बना सकता है और उनके इस एक पत्र से मैनहटन प्रोजेक्ट शुरू हुआ जिसने दुनिया का फर्स्ट एटम बम बनाया लेकिन आगे चलकर आइंस्टीन ने इसे अपनी सबसे बड़ी गलती बताया। उनकी जिंदगी में शोहरत भी
आई और अकेलापन भी। अवार्ड भी मिले और आलोचना भी। लेकिन उन्होंने विज्ञान को जो दिया वो अनमोल है। उनका नाम आज भी जीनियस के तौर पर याद किया जाता है। और 18 अप्रैल सन 1955 को अल्बर्ट आइंस्टीन इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए। लेकिन उनकी सोच, उनका ज्ञान आज भी हमारी हर टेक्नोलॉजी में जीवित है। जीपीएस से लेकर लेजर तक सब में आइंस्टीन छिपे बैठे हैं। आइंस्टीन की जिंदगी हमें सिखाती है।
दुनिया चाहे आपको 100 बार नालायक बोले पर अगर आपके अंदर जलती हुई जिज्ञासा है, सीखने का जुनून है और हार ना मानने की हिम्मत है तो आप भी ब्रह्मांड के नियम बदल सकते हैं। कभी अपने आप को किसी से कम मत समझो। अगर एक ऐसा बच्चा जिसे बोलना तक नहीं आता वो आगे चलकर इंसानी इतिहास का सबसे महान वैज्ञानिक बन सकता है तो आप कुछ भी कर सकते हो।









